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जन्माष्टमी में मनोकामना पूरी करने के लिए कैसे रखे व्रत?

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जन्माष्टमी का पवन त्योहार सृष्टि को बनने वाले इसको सुचारु रूप से चलाने वाले विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। प्राचीन ग्रंथों के मुताबिक श्रीकृष्ण का जन्म का जन्म भाद्रपद म स के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय हुआ था। मन जाता है की जो भगवान कृष्ण की असीम कृपा प्राप्त करना चाहता है अगर वो इस पावन अवसर पर श्रीकृष्ण की आराधना करें और व्रत रखें तो श्रीकृष्ण अपने भक्तों की सच्ची भक्ति देख जरूर खुश होते है और उनके सारी मनोकामना पूर्ण करते है।

आपको बता दे इस त्यौहार को बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। भाद्रपद माह के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी तिथि को जन्‍माष्‍टमी मनाई जाती हैं। भक्‍त मध्‍यरात्रि में कन्‍हैया का श्रृंगार करते हैं, उन्‍हें भोग लगाते हैं और पूजा-आराधना करते हैं। इसी के साथ मुरलीधर के जन्‍म की कथा सुनते हैं। मान्‍यता है कि श्रीकृष्‍ण जन्‍म की यह अद्भुत कथा सुनने मात्र से ही समस्‍त पाप नष्ट हो जाते है। और श्रीकृष्ण अपने भक्तों पर असीम कृपा बरसाते है।

भगवान विष्णु ने धरती पर श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित होने पीछे सबसे बड़ा कारण था की धरती पर पाप बहुत अधिक बढ़ गया था और कंस ने धरती पर आतंक मचा रखा था , उसके पाप का घड़ा कफी अधिक बढ़ गया था , उसका नाश कर, मथुरावासियों को उसके अत्याचार से मुक्त करवाना था। इतना ही नहीं महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थपना करने में एक एहम भूमिका निभाई।

अगर जन्माष्टमी पर्व तिथि व मुहूर्त के बारें में बात करें तो 11 अगस्त को यह भव्य आयोजनआयोजित होगा। पूजन का शुभ मुहूर्त: रात 12:04 बजे से रात 12:48 करीब 44 मिनट का शुभ मुहूर्त है। व्रत पारण– 11:15 (12 अगस्त) के बाद रोहिणी समाप्त- रोहिणी नक्षत्र रहित जन्माष्टमी अष्टमी तिथि आरंभ – 09:06 (11 अगस्त) अष्टमी तिथि समाप्त – 11:15 (12 अगस्त)

इस दिन देश के समस्त मंदिरोंमें श्रीकृष्ण के बाल रूप और श्रीकृष्ण , राधा की मूर्ति का श्रृंगार किया जाता है। इतना ही नहीं कई शहरों में झाकिया भी निकाली जाती है।

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