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आज का एक्सप्लेनर: क्या अमेरिका के बिना टिक पाएगा इजराइल, ट्रम्प के रोकने के बावजूद ईरान से भिड़ा; दोबारा जंग से भारत चिंता में क्यों

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आज का एक्सप्लेनर:  क्या अमेरिका के बिना टिक पाएगा इजराइल, ट्रम्प के रोकने के बावजूद ईरान से भिड़ा; दोबारा जंग से भारत चिंता में क्यों

आज का एक्सप्लेनर: क्या अमेरिका के बिना टिक पाएगा इजराइल, ट्रम्प के रोकने के बावजूद ईरान से भिड़ा; दोबारा जंग से भारत चिंता में क्यों

जंग शुरू होने के 100वें दिन, यानी 7 जून को ईरान और इजराइल फिर भिड़ गए। ईरान के तेहरान, तबरीज और इस्फहान में धमाके गूंजे। इजराइल पर भी ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों से हमले किए हैं। इस बीच डोनाल्ड ट्रम्प दोनों पक्षों से शांति की गुहार लगा रहे हैं।

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आखिर 2 महीने से जारी सीजफायर अचानक क्यों टूटा, क्या अमेरिका के बिना इजराइल लड़ पाएगा और दोबारा जंग से भारत पर कितना असर पड़ेगा; आज के एक्सप्लेनर में 5 जरूरी सवालों के जवाब…

सवाल-1: क्या वाकई ईरान और इजराइल में दोबारा जंग शुरू हो चुकी है?

जवाब: 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया था। 5 हफ्ते जंग चलती रही। ईरान हार मानने को तैयार नहीं था। पाकिस्तान की कोशिशों के बाद 8 अप्रैल को डोनाल्ड ट्रम्प ने सीजफायर की घोषणा कर दी।

तब से दोनों पक्षों में कोई सीधा बड़ा हमला नहीं हुआ था, लेकिन करीब 2 महीने बाद ये शांति वापस भंग हो गई…

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  • 7 जून को इजराइल ने लेबनान की राजधानी बेरूत पर हमला कर दिया। इसमें 2 लोगों की जान गई और 20 घायल हुए।
  • कुछ ही घंटे के भीतर ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों से इजराइल के रमत डेविड एयरबेस को निशाना बनाया। ईरान के मुताबिक इसी एयरबेस से लेबनान पर हमले किए गए थे।
  • इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स यानी IRGC ने कहा कि अमेरिका से सीजफायर इस शर्त पर हुआ था कि जंग के सभी मोर्चों पर शांति होगी। लेबनान पर हमले करके इजराइल शर्त तोड़ रहा है।
  • इजराइल ने भी पलटवार करते हुए 8 जून की सुबह ईरान पर हमले किए। तेहरान, तबरीज और इस्फहान शहर में धमाके सुनाई दिए। खुजेस्तान शहर के एक पेट्रोकेमिकल प्लांट को भी निशाना बनाया गया।
  • IRGC ने धमकी दी है, ‘आज का हमला तो सिर्फ चेतावनी है। अगर हमले जारी रहे तो जवाब और बड़ा होगा।’

ईरान ने इजराइल पर बैलेस्टिक मिसाइल से हमले का वीडियो भी जारी किया है। उन्होंने इसे लेबनान पर हमले का बदला बताया है।

ईरान की FARS न्यूज एजेंसी ने 8 जून को दावा किया कि अब ईरान हमले रोक रहा है। इजराइल की तरफ से ऐसा कोई संकेत फिलहाल नहीं मिला है।

सवाल-2: क्या अमेरिका भी इजराइल के साथ इन हमलों में शामिल है?

जवाब: इजराइल के ताजा हमलों में अमेरिका सीधे शामिल नहीं है। उल्टा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं।

अमेरिकी न्यूज वेबसाइट Axios के मुताबिक, ईरान के हमलों के बावजूद ट्रम्प नेतन्याहू को फोन करना चाहते थे कि पलटवार न करें। लेकिन इजराइल ने हमला कर दिया।

ट्रम्प इजराइल के बेरूत पर हमले से भी बिल्कुल खुश नहीं थे। उन्होंने अमेरिकी मीडिया से कहा भी कि इन हमलों से शांति समझौते के इरादे पर कोई असर नहीं पड़ा है। नेतन्याहू के पास भी इसे स्वीकार करने के अलावा ‘कोई विकल्प’ नहीं है। फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा, ‘सारे फैसले मैं लेता हूं, नेतन्याहू नहीं।’

इससे पहले जब 2 जून को इजराइल ने लेबनान पर हमला किया था। तब भी ट्रम्प ने नेतन्याहू को फटकार लगाई थी। Axios ने सूत्रों के हवाले से बताया कि ट्रम्प ने फोन पर नेतन्याहू को गालियां दीं और कहा कि वो शांति वार्ता को बर्बाद कर रहे हैं।

सवाल-3: क्या अमेरिका के बगैर ईरान का मुकाबला कर पाएगा इजराइल?

जवाबः इजराइल और ईरान जमीन से जुड़े हुए नहीं हैं, यानी किसी भी तरह से सीमा साझा नहीं करते हैं। इसलिए जंग हवा या पानी में ही हो सकती है। इसके लिए इजराइल को अमेरिका की मदद चाहिए। मिलिट्री पावर रैंकिंग में इजराइल दुनिया में १५वें नंबर पर है और ईरान १६वें। ऐसे में ईरान से निपटने के लिए इन 4 वजहों से इजराइल को अमेरिका की सख्त जरूरत है…

1. लंबी दूरी की उड़ान के लिए रीफ्यूलर्स की कमी

  • इजराइल से ईरान की दूरी लगभग 1500 किमी है। इतनी दूर तक हमला करने के लिए इजराइल के पास F-15, F-16 और F-35 जैसे फाइटर जेट हैं। लेकिन इन्हें इतने दूर ले जाने के लिए हवा में रिफ्यूलिंग करनी पड़ती है।
  • इजराइल के पास अभी इसके लिए एक बोइंग 707 विमान है, जो 50 साल पुराना है। इसके अलावा अमेरिका से मिलने वाले 6 KC-46A रिफ्यूलर में से अभी सिर्फ एक ही मिला है। इसलिए इजराइल को अमेरिकी रिफ्यूलर्स की जरूरत पड़ती है।
  • इसके अलावा इजराइल, तोप के गोलों और बमों के लिए भी अमेरिका पर निर्भर है। इसमें 450 किलो के MK-83 और 900 किलो के MK-84 बम शामिल है, जिन्होंने ईरान में भारी तबाही मचाई। पिछले साल ही इनकी एक बड़ी खेप इजराइल पहुंची थी। अमेरिका 2000 किलो वाले GBU-28 बंकर बस्टर बम भी इजराइल को देता है।

2. हवाई हमला रोकने वाले इंटरसेप्टर्स की कमी

  • ईरान के मिसाइल हमले रोकने के लिए इजराइल खास एयर डिफेंस सिस्टम इस्तेमाल करता है। शॉर्ट रेंज मिसाइलों के लिए आयरन डोम, मिडियम रेंज और क्रूज मिसाइल के लिए डेविड्स स्लिंग और बैलिस्टिक मिसाइल के लिए एरो-1 और एरो-2 सिस्टम।
  • इन एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इंटरसेप्टर चाहिए, यानी वो हथियार जो दुश्मन की मिसाइल हमलों को हवा में ही निष्क्रिय कर देते हैं।
  • गाजा युद्ध, जून 2024 में ईरान से 12 दिन की जंग और अब 28 फरवरी से फिर जंग। ब्लूमबर्ग ने दावा है कि इजराइल के पास इंटरसेप्टर्स की भारी कमी है। ये इंटरसेप्टर अमेरिकी कंपनियों की मदद से बनते हैं।
  • भारतीय थिंकटैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटजिक स्टडीज प्रोग्राम के डिप्टी डायरेक्टर विवेक मिश्र बताते हैं, ‘यह सिस्टम लेबनान और यमन से आने वाली मिसाइलों को तो रोक सकते हैं, लेकिन ईरान से आने वाली लंबी दूरी की मिसाइलों को नहीं। जंग में अब तक अमेरिकी डिफेंस सिस्टम ही इजराइल के काम आ रहे थे।’

अमेरिका का THAAD डिफेंस सिस्टम 150-200 किमी की रेंज में मिसाइलों को मार गिरा सकता है। इसकी तुलना में इजराइल का आयरन डोम की रेंज 70 किमी ही है।

3. इजराइल के पास जमीन और लोगों की कमी

  • इजराइल के पास करीब 22 हजार वर्ग किमी जमीन है, जबकि ईरान के पास उससे 73 गुना ज्यादा 16 लाख वर्ग किमी जमीन है। इजराइल के पास 1.69 सक्रिय सैनिक हैं और ईरान के पास साढ़े तीन गुना ज्यादा, यानी 6.1 लाख सक्रिय सैनिक।
  • ऊपर से इजराइल, ईरान के प्रॉक्सी संगठनों से घिरा हुआ है। लेबनान में हिजबुल्ला, यमन में हूती और गाजा में हमास। ये भले ही कमजोर पड़ गए हैं, लेकिन नुकसान कर सकते हैं।
  • अभी भी हूती हमलों से अमेरिका का डिफेंस सिस्टम ही इजराइल की रक्षा करता है। लाल सागर या उसके आस-पास अमेरिकी नौसेना का बेड़ा हमेशा तैनात रहता है। सऊदी अरब और UAE में भी THAAD और पैट्रिअट मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात रहते हैं।

ईरान के प्रॉक्सी गुटों से घिरा इजराइल

4. इतनी महंगी जंग का खर्च कौन उठाएगा

  • इजराइल करीब 3 साल से लगातार जंग में उलझा हुआ है। पहले गाजा और अब ईरान। 2026 में इजराइल सरकार ने 112 बिलियन इजरायली शेकेल का रक्षा बजट मंजूर किया था। ईरान जंग शुरू होने के बाद इसे बढ़ाकर 144 बिलियन शेकेल कर दिया। लेकिन अब रक्षा मंत्रालय और सेना और 40 बिलियन इजरायली शेकेल की मांग कर रहे हैं।
  • इजराइल के रक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर यह फंड पारित नहीं हुआ, तो हथियारों के प्रोडक्शन में परेशानी आ सकती है। दो महीने के अंदर तोप और टैंक के गोलों का उत्पादन रुक सकता है।

विवेक मिश्र के मुताबिक, ‘अमेरिकी मदद के बिना इजराइल 10-15 दिन ईरान का मुकाबला कर सकता है। इसके बाद उसे अमेरिका का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा।’

दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया में रिसर्च एसोसिएट और ईरानी मामलों के जानकार यासिर अली मिर्जा कहते हैं, ‘ट्रम्प भले ही इस जंग से ऊब चुके हैं, लेकिन वो चाहकर भी इजराइल को जंग में सपोर्ट करना बंद नहीं कर सकते, क्योंकि इजराइली लॉबी का अमेरिका की विदेश नीति में दखल है। ये लॉबी अमेरिकी सांसदों और पॉलिसी मेकर्स को फंड भी करती है।’

सवाल-4: आखिर ट्रम्प की बात क्यों नहीं मान रहे नेतन्याहू?

जवाबः एक्सपर्ट्स इसके पीछे दो बड़ी वजहें मानते हैं…

नेतन्याहू का करप्शन केस से बचने और सत्ता में बने रहने की कोशिश

  • नेतन्याहू पर इजराइल में भ्रष्टाचार के 3 मामले दर्ज हैं। वो जंग के नाजुक हालातों का हवाला देकर, कोर्ट में पेशी से बच रहे हैं। जंग रुकने से उन पर कानूनी कार्यवाही शुरू होगी और जेल भी जाना पड़ सकता है।
  • अक्टूबर में इजराइल में आम चुनाव भी होने हैं। विवेक मिश्र कहते हैं, ‘अगर जंग खत्म होगी, तो इजराइल में लागू स्टेट इमरजेंसी खत्म हो जाएगी। इससे इजराइल की अदालतों और लोगों का ध्यान नेतन्याहू पर लगे आरोपों पर जाएगा। ऐसे में उनके दक्षिणपंथी अलायंस साथ छोड़ सकते हैं।’
  • बीते दिनों इजराइल की हिब्रू यूनिवर्सिटी ने उत्तरी इजराइल में एक सर्वे किया था, जो लेबनान से जुड़ा है। इसके मुताबिक यहां के लोगों का नेतन्याहू को समर्थन कम हो रहा है। ये लोग ऐसी सरकार चाहते हैं, जो लेबनान की समस्या सुलझाने के लिए कड़ी कार्रवाई करे और जंग खत्म करने के अमेरिकी दबाव में न आए।

दुश्मन को खत्म करने का आखिरी बड़ा मौका

  • नेतन्याहू का इरादा हमेशा से ईरान में सत्ता बदलना था। वो कई बार कह चुके हैं कि ईरान में सत्ता बदलने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे। वो इसे इजराइल के भविष्य के लिए जरूरी बताते हैं।
  • नेतन्याहू ईरान और उसके प्रॉक्सी संगठनों को इजराइल के लिए खतरा मानते हैं। वो हिजबुल्लाह को खत्म करने का दावा कर चुके हैं। यही वजह रही कि सीजफायर के बावजूद भी उन्होंने लेबनान पर हमले नहीं रोके।
  • विवेक मिश्र के बताते हैं कि ‘ नेतन्याहू लेबनान और हिजबुल्लाह के मुद्दे को सीजफायर से अलग रखना चाहते हैं। वो ईरानी प्रॉक्सी संगठनों को राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय दबदबे से जुड़ा मुद्दा मानते हैं। जबकि ईरान लेबनान पर हमले जारी रहते हुए किसी भी सूरत में सीजफायर नही करेगा।’

सवाल-5: मिडिल ईस्ट में दोबारा जंग शुरू होने से भारत की चिंता क्यों बढ़ गई? जवाबः 100 दिन की ईरान जंग में दुनिया की जीडीपी को 339 लाख करोड़ रुपए के नुकसान होने का अनुमान है। भारत भी इससे असर से अछूता नहीं है…

  • 28 फरवरी को जंग शुरू होने के बाद कच्चे तेल के दाम में 50% से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है। 7 जून को दोबारा हमले शुरू होने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 3.20 डॉलर बढ़कर 96.24 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया।
  • भारत में पहले ही ईरान जंग के चलते पेट्रोल-डीजल के दाम 7.5 रुपए तक बढ़े हैं। सीजफायर और पेट्रोल की कीमतें बढ़ने से भारतीय तेल कंपनियों को रोजाना 1100 से 1300 करोड़ रुपए का घाटा हो रहा था। यह घटकर 900 करोड़ रुपए हो गया है। अगर जंग के कारण तेल की कीमत फिर बढ़ती है, तो कंपनियों का घटा बढ़ेगा, जिसका असर पेट्रोल के दाम पर होगा।
  • जंग शुरू होने के बाद से घरेलू LPG की कीमत 74.2 रुपए, जबकि कमर्शियल LPG की 1,422 रुपए बढ़ी है।
  • ईंधन की कीमत बढ़ने का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इससे माल ढुलाई महंगी होती है। धीर-धीरे जरूरत की हर चीज- सब्जी, फल, दूध, पब्लिक ट्रांस्पोर्ट, बाहर खाना-पीना, घूमना सब पर असर पड़ता है।
  • भारत का इम्पोर्ट बिल का करीब 22% हिस्सा कच्चे तेल पर खर्च होता है। यानी तेल की कीमतें बढ़ने से पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
  • जंग शुरू होने के बाद से भारतीय रुपए में डॉलर के मुकाबले 5% की गिरावट दर्ज की गई है। 28 फरवरी को 1 डॉलर की कीमत 91.08 रुपए थी, जो 8 जून को 95.63 पहुंच चुकी है।
  • विवेक मिश्र के मुताबिक, ‘जंग जारी रहने से भारतीय तेल कंपनियों का रोजाना घाटा कई गुना बढ़ सकता है। मई में जंग खत्म के होने और होर्मुज खुलने की अटकलें लगाई जा रहीं थीं, इससे मार्केट में थोड़ी रिकवरी हुई थी, लेकिन अगर हमले नहीं रुकते हैं, तो होर्मुज का मुद्दा टल जाएगा, जिसका सीधा असर शेयर बाजार पर दिखेगा, जो कुछ हद तक दिखना शुरू भी हो गया है।’

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