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डेरोन एस्मोगलु का कॉलम: क्यों न एआई अपना काम करे और हम मनुष्य अपना!

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डेरोन एस्मोगलु का कॉलम:  क्यों न एआई अपना काम करे और हम मनुष्य अपना!

डेरोन एस्मोगलु का कॉलम: क्यों न एआई अपना काम करे और हम मनुष्य अपना!


एआई को लेकर दुनिया में चल रही बातचीत अभी तक लैब्स के बीच प्रतिस्पर्धा या टेक्नोलॉजी की क्षमताओं के बारे में अमूर्त बहसों तक ही सीमित है। लगभग कोई भी यह नहीं पूछ रहा है कि एआई को किस उद्देश्य की पूर्ति करनी चाहिए? या क्या हमारे वर्तमान संस्थान और नियंत्रण-तंत्र इस टेक्नोलॉजी को मनुष्यता के कल्याण की दिशा में ले जाने में सक्षम हैं? हाल ही में पोप लियो ने एआई को मानवीय गरिमा के लिए एक गहरा खतरा बताया। एक ऐसे अर्थशास्त्री के रूप में- जो लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि टेक्नोलॉजी से मिलने वाले परिणाम हमारी नियति नहीं, बल्कि हमारी पसंद का मामला होने चाहिए- मैं पोप के हस्तक्षेप का स्वागत करता हूं। अधिकांश विश्लेषक यह समझ नहीं पाते हैं कि टेक्नोलॉजी कभी भी तटस्थ नहीं होती है, यह उन लोगों की विशेषताओं को अपना लेती है, जो उसे रचते हैं, उसकी फंडिंग करते हैं और जो उसे नियंत्रित करते हैं। ऐसे में हमारे सामने आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि एआई को क्या करने के लिए डिजाइन किया जाना चाहिए? एआई जैसी तकनीक कई रास्ते अपना सकती है, और इनमें से हरेक का समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, जो कुछ साल पहले तक वर्जित था- एआई-संचालित बड़े पैमाने पर निगरानी (मास-सर्विलांस) या हत्या के लिए टारगेट चुनने वाले एल्गोरिदम- वह अब आम हो गया है। सिलिकॉन वैली में कई लोग अब यह आग्रह कर रहे हैं कि अमेरिका एक नए सैन्य-एल्गोरिदम कॉम्प्लेक्स के माध्यम से अपनी हार्ड-पावर को पुख्ता बनाए। लेकिन हर वो तकनीक जो मनुष्यों के चेहरों को देखे बिना हमलों को सुगम बनाती है, संघर्ष की नैतिक-सीमा को कम कर देती है। एआई का निरस्त्रीकरण जरूरी है ताकि इसे सशस्त्र प्रतिस्पर्धा की मानसिकता से मुक्त किया जा सके। यह आज केवल सैन्य-संदर्भ तक सीमित नहीं है, बल्कि एक आर्थिक और संज्ञानात्मक घटना भी है। हमें मालूम होना चाहिए कि तकनीकी प्रगति अनिवार्य रूप से नैतिक प्रगति नहीं है। अगर कोई चीज तकनीकी रूप से सम्भव है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह मानवता के लिए अनिवार्य रूप से अच्छी ही होगी। कोई तकनीक वांछनीय है या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि उसका नियंत्रण किसके पास है और उसे कौन-सी विचारधारा और हित प्रेरित करते हैं। जहां एआई रोजमर्रा के कामों की जिम्मेदारी अपने हाथों में लेकर हमारी उत्पादकता बढ़ाता है, वहीं यह कर्मचारियों को मशीनों की गति और मांगों के अनुकूल ढलने के लिए भी मजबूर करता है। जबकि होना यह चाहिए कि मशीनों को कामगारों के साथ काम करने के लिए डिजाइन किया जाए। पूरे एआई उद्योग का दृष्टिकोण मानवीय क्षमताओं की नकल करने और मनुष्य के द्वारा किए जाने वाले कार्यों के ऑटोमेशन पर केंद्रित है, जिसका लक्ष्य एक ऐसी एजीआई (आर्टिफिशियल जनरल इंटलिजेंस) बनाना है, जो हर वो चीज कर सके, जो एक व्यक्ति कर सकता है। यह फलसफा इस गलत धारणा पर आधारित है कि मशीनी बुद्धिमत्ता और मानवीय बुद्धिमत्ता मौलिक रूप से समान हैं। मनुष्य एक बार में सीखने वाले (वन-शॉट लर्नर्स) होते हैं। हम कुछ उदाहरणों से परिकल्पनाएं बनाते हैं, अपने मन में सम्भावनाओं का अनुकरण करते हैं और ट्रायल एंड एरर की सामाजिक प्रक्रिया के माध्यम से अपनी समझ को परिष्कृत करते हैं। बच्चे इसी तरह से भाषा सीखते हैं। हम व्यापक पैमाने पर सूचनाओं को ग्रहण करने या प्रासंगिक पैटर्नों के लिए बेतरतीब डेटा को आत्मसात करने में बहुत अच्छे नहीं हैं। इसके विपरीत, एआई मॉडल विशाल प्रशिक्षण सेट्स पर ही फलते-फूलते हैं और बड़े पैमाने पर पैटर्नों को पहचानने में महारत हासिल करते हैं। लेकिन उन्होंने अभी तक वास्तविक रचनात्मकता का प्रदर्शन नहीं किया है। उन्हें वास्तविक दुनिया का कोई अनुभव नहीं है, न ही भौतिक और सामाजिक दुनिया के साथ बातचीत के माध्यम से सीखने की उन्होंने वैसी कोई क्षमता दिखाई है, जैसी हम मनुष्यों में है। जब दो चीजें इतनी अलग होती हैं, तो आपको एक का उपयोग दूसरे की नकल करने के लिए नहीं करना चाहिए- और आमतौर पर आप ऐसा कर भी नहीं सकते। एआई का उपयोग उन कामों के लिए करना कहीं ज्यादा प्रोडक्टिव होगा, जो मनुष्य नहीं कर सकते। ताकि मनुष्य अपने कामों का विस्तार कर सकें। विकासशील दुनिया के अरबों लोगों के लिए- जहां अच्छी नौकरी ही गरीबी से बाहर निकलने का एकमात्र विश्वसनीय रास्ता है- एक ऑटोमेशन-केंद्रित एआई एजेंडा तो तबाही का नुस्खा ही कहलाएगा। एआई का उपयोग उन कामों के लिए करना कहीं ज्यादा प्रोडक्टिव होगा, जो मनुष्य नहीं कर सकते। विकासशील दुनिया के अरबों लोगों के लिए ऑटोमेशन- केंद्रित एआई एजेंडा तो तबाही का नुस्खा ही कहलाएगा।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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