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शेखर गुप्ता का कॉलम: क्या अब राजनीति में मुसलमान हाशिये पर हैं?

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शेखर गुप्ता का कॉलम:  क्या अब राजनीति में मुसलमान हाशिये पर हैं?

शेखर गुप्ता का कॉलम: क्या अब राजनीति में मुसलमान हाशिये पर हैं?


करीब सात साल पहले मैंने एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था : ‘क्या मुसलमान भाजपा के लिए कोई अहमियत रखते हैं?’ हाल के राज्यों के चुनाव नतीजे- खासकर बंगाल और असम के- जहां मुस्लिम वोटरों की आबादी 30% से ज्यादा है- दिखाते हैं कि यह मुद्दा अब और बड़ा हो गया है। राजनीतिक तौर पर तो निष्कर्ष यही निकलता है कि मुसलमान आज भाजपा के लिए 2019 के मुकाबले काफी कम मायने रखते हैं। बंगाल और असम में भाजपा ने इस बार एक भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारे बिना दो-तिहाई सीटें जीत लीं। दूसरी तरफ, असम में विपक्ष के जीते 24 उम्मीदवारों में से 22 मुस्लिम हैं। इनमें भी कांग्रेस के 19 जीते उम्मीदवारों में से 18 मुस्लिम हैं। बंगाल में 293 नए विधायकों में 40 मुस्लिम हैं, जिनमें से 34 टीएमसी के हैं। यानी टीएमसी के कुल 80 जीते उम्मीदवारों में से 45 फीसदी मुस्लिम हैं। इसका मतलब यह है कि जिन दो राज्यों में मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है (जम्मू-कश्मीर अब राज्य नहीं है), वहां मुसलमान सत्ता से बाहर हो चुके हैं। भाजपा और सेकुलर पार्टियों के बीच हिंदू-मुस्लिम आधार पर बंटवारा साफ हो गया है। केरल में यूडीएफ के 102 नए विधायकों में 30 मुस्लिम और 29 ईसाई हैं। सेकुलर खेमे को इस बात से राहत हो सकती है कि कम से कम केरल में मुसलमान सत्ता में शामिल हैं, लेकिन यह राहत इस डर से कम हो जाती है कि भाजपा अब इसे अल्पसंख्यकों की सरकार बताकर हिंदू वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश करेगी। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 18वीं लोकसभा में कुल 24 मुस्लिम सांसद हैं, यानी सिर्फ 4.42 फीसदी, जबकि देश में मुस्लिम वोटरों की आबादी 15 फीसदी से ज्यादा है। 16वीं लोकसभा में 22 और 17वीं लोकसभा में 27 मुस्लिम सांसद थे। जबकि 1980 में 49 और 1984 में 45 मुस्लिम सांसद चुने गए थे। तब उनका प्रतिशत क्रमशः 9 और 8.3 था। लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या अकसर 5 फीसदी के आसपास रही है, लेकिन केंद्र में उन्हें हमेशा अच्छा प्रतिनिधित्व मिलता रहा। यहां तक कि वाजपेयी सरकार में सिकंदर बख्त मंत्री थे। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा उपसभापति जैसे पदों से लेकर सेना और खुफिया एजेंसियों के प्रमुख पदों तक मुसलमान पहुंच चुके हैं, लेकिन आज वे किसी भी ऐसे पद पर नहीं हैं। आज कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री नहीं है। जम्मू-कश्मीर अब केंद्र शासित प्रदेश है। सिर्फ एक मुस्लिम राज्यपाल हैं- बिहार में सैयद अता हसनैन। केंद्र सरकार के करीब 100 सचिवों में सिर्फ एक मुस्लिम हैं- कामरान रिजवी- जो हैवी इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के सचिव हैं। सुप्रीम कोर्ट के 32 जजों में भी सिर्फ एक मुस्लिम जज हैं- जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह। भारत के आखिरी मुस्लिम मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एएम अहमदी थे, जो 24 मार्च 1997 को रिटायर हुए थे। यह सब देखकर ऐसा लग सकता है कि भारतीय मुसलमानों को किनारे कर दिया गया है, लेकिन इस सोच पर फिर से विचार करने की जरूरत है। डॉक्टरी, कानून, शिक्षा, विज्ञान, सॉफ्टवेयर, बैंकिंग, मनोरंजन और मीडिया जैसे क्षेत्रों में मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है। सिविल सेवा और सेना में भी उनका चयन बढ़ा है। इसलिए समस्या यह नहीं है कि मुसलमान हर क्षेत्र से बाहर हो रहे हैं। असली समस्या यह है कि राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व लगातार कम हो रहा है। 1996 में वाजपेयी सरकार 13 दिन चली थी और 1999 में एक वोट से गिर गई थी। तब भाजपा नेता बलबीर पुंज इस बात से नाराज थे कि मुस्लिम वोटों पर निर्भर पार्टियां भाजपा को स्वीकार नहीं कर रही थीं। उनका मानना था कि मुसलमान तय कर रहे थे भारत पर कौन राज करेगा और कौन नहीं, लेकिन अब यह स्थिति बदल गई है। ये तथ्य तीन बड़े निष्कर्षों की ओर इशारा करते हैं। एक, भाजपा की विरोधी या सेकुलर पार्टियों को भाजपा अब मुस्लिम पार्टियों की तरह पेश करना चाहती है, जबकि उनके नेता हिंदू हैं। इससे हिंदू बनाम बाकी सब वाला माहौल बनता है, जो 80 फीसदी बनाम 20 फीसदी की राजनीति में बदल जाता है। यह भाजपा के लिए सबसे फायदेमंद स्थिति है। भाजपा चुनिंदा इलाकों में ईसाइयों के बीच भी काम करती है। गोवा और केरल में उसे इसका मौका मिला है। भाजपा के पास धैर्य भी है और समय भी। उत्तर-पूर्व में उसने ईसाई जनजातियों के साथ सुविधाजनक रिश्ता बना लिया है। वहां उसने कभी गोमांस पर प्रतिबंध की मांग नहीं की। अब भी कुछ सेकुलर पार्टियां मुस्लिम वोटों पर निर्भर हैं, लेकिन वे इतनी सतर्क हो गई हैं कि मुसलमानों के समर्थन में खुलकर बोलने से भी बचती हैं। जैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार ने शाहीन बाग आंदोलन और उसके बाद हुए दंगों के दौरान चुप्पी बनाए रखी। इससे धर्मनिरपेक्षता बचाने की जिम्मेदारी मुसलमानों पर आ गई है। यह न सिर्फ मुश्किल और अव्यावहारिक है, बल्कि गलत भी है। आज मुसलमानों से कहा जाता है कि वे उसी उम्मीदवार को वोट दें, जो भाजपा को हरा सके। इसके पीछे यह उम्मीद होती है कि इससे उन्हें सुरक्षा मिलेगी। एक मजबूत धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के लिए यह बहुत कमजोर सोच है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट भी बताती है कि इससे मुसलमानों को फायदा नहीं हुआ। अब सेकुलर दलों को हिंदुओं के साथ इतना बड़ा गठबंधन बनाना होगा, जो जीत दिलाने वाला वोट प्रतिशत जुटा सके। पहले हिंदी पट्टी की पार्टियां जाति के आधार पर हिंदुओं को बांटकर जीत हासिल करती थीं, लेकिन भाजपा ने उस राजनीति को तोड़ दिया है। अगर मुसलमान अपनी अलग पार्टी बनाएंगे, तो उससे भाजपा को ही फायदा होगा और उसकी ताकत बढ़ेगी। जिन्ना के बाद भारत के मुसलमानों ने कभी किसी मुस्लिम नेता को अपना सबसे भरोसेमंद नेता नहीं माना। वे नेहरू-गांधी परिवार, यूपी-बिहार के यादव नेताओं, ममता बनर्जी और कई जगहों पर वाम दलों के हिंदू नेताओं पर भरोसा करते रहे हैं। लेकिन वे पहले कभी इस तरह सत्ता से बाहर नहीं हुए थे, जैसे आज हैं। इसे ठीक करने का एक ही तरीका है- ऐसा नेतृत्व उभरे, जो बड़ी संख्या में हिंदुओं को साथ लेकर नया गठबंधन बनाए। भारत के हिंदुओं ने ही संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को चुना था, इसलिए उसे बचाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है। भाजपा को वही चुनौती दे पाएगा, जो हिंदुओं के साथ भरोसे का रिश्ता बना सके। पार्टियों में हिंदू-मुस्लिम बंटवारा अब और स्पष्ट है…
भाजपा के लिए मुस्लिम वोटर्स अब जरूरी नहीं रह गए हैं। ऐसे में क्या कोई हिंदू-नेतृत्व वाला राजनीतिक गठबंधन ही उसे चुनावों में चुनौती दे सकता है? क्योंकि यह तो साफ है कि भाजपा और सेकुलर पार्टियों के बीच हिंदू-मुस्लिम बंटवारा अब और मजबूत हो गया है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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