उत्पन्ना एकादशी कल: अभिजीत मुहूर्त का संयोग, विष्णु भक्ति से मिलेगा मोक्ष का मार्ग – Bikaner News h3>
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उत्पन्ना एकादशी पर्व शनिवार को मनाया जाएगा। इस एकादशी के दिन शहर के मंदिरों में भगवान विष्णु और देवी एकादशी की विशेष पूजा-अर्चना होगी। मंदिरों में विशेष सजावट की जाएगी। मंत्रों का जाप और विशेष आरती होगी। इस दिन व्रत और उपवास करने से मन निर्मल होता है। शरीर भी स्वस्थ होता है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत महत्व है। हर साल 24 एकादशियां आती हैं, लेकिन अधिकमास को मिलाकर इनकी संख्या 26 भी हो जाती है। मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष के दिन उत्पन्ना एकादशी का व्रत किया जाता है।
शास्त्रों के अनुसार अगर एकादशी का व्रत नहीं रखते हैं तो भी एकादशी के दिन चावल नहीं खाने चाहिए। इस व्रत में एक समय फलाहार कर सकते हैं। ज्योतिर्विद पं. हरिनारायण व्यास मनासा के अनुसार इस दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र, विष्कुंभयोग और अभिजीत मुहूर्त का संयोग बन रहा है। उन्होंने बताया कि शनिवार और एकादशी के योग में भगवान विष्णु-लक्ष्मी और शनिदेव की पूजा करने के लिए, पहले भगवान गणेश और फिर विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करें।
भगवान विष्णु को केसर-मिश्रित दूध से दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक कराएं, वस्त्र, फूल और मिठाई चढ़ाएं। बाद में शनिदेव की पूजा करें, जिसमें उन्हें तेल और काले तिल चढ़ाएं, मंत्र जाप करें और फिर शनिदेव को समर्पित चीजें जैसे तेल, काले तिल और जूते-चप्पल दान करें। वैज्ञानिक दृष्टि से लाभकारी एकादशी व्रत शरीर को विषमुक्त (डिटॉक्स) करने का माध्यम है। इस दिन हल्का भोजन या फलाहार करने से पाचन शक्ति मजबूत होती है और मन एकाग्र रहता है। एकादशी तिथि का प्रारंभ 14 नवंबर को देर रात 12:51बजे होगा। तिथि का समापन 15 नवंबर को देर रात 02:38 बजे होगा। एकादशी पर कर सकते हैं ये शुभ काम इस दिन भगवान विष्णु मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करना चाहिए। भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी का अभिषेक करें।
अभिषेक जल और दूध से करना चाहिए। दोनों देवी-देवताओं को पीले चमकीले वस्त्र अर्पित करें। फूलों से श्रृंगार करें। तुलसी के पत्तों के साथ मिठाई और मौसमी फलों का भोग लगाएं। पूजा में भगवान के सामने एकादशी व्रत करने का संकल्प लें। जो लोग व्रत करते हैं, उन्हें पूरे दिन निराहार रहना चाहिए, सुबह और शाम को विष्णु जी की विशेष पूजा करनी चाहिए। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर भी सुबह पूजा करें, पूजा के बाद जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं और फिर खुद भोजन ग्रहण करें। मार्गशीर्ष माह के कृष्णपक्ष की ग्यारस यानी ग्यारहवीं तिथि को भगवान विष्णु से एकादशी तिथि प्रकट यानी उत्पन्न हुई थीं। इसलिए इस दिन उत्पन्ना एकादशी का व्रत किया जाता है। इसे उत्पत्तिका, उत्पन्ना, प्राकट्य और वैतरणी एकादशी भी कहा जाता है।
पद्म पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस एका एकादशी की उत्पत्ति और इसके महत्व के बारे में बताया था। व्रतों में एकादशी को प्रधान और सब सिद्धियों को देने वाला माना गया है। ज्योतिर्विद पं. मनासा के अनुसार भगवान विष्णु से उत्पन्न हुई थी एकादशी तिथि उत्पन्ना एकादशी का व्रत करने से अश्वमेघ यज्ञ करने के बराबर पुण्य मिलता है। इस व्रत में व्रती को बुरे कर्म करने वाले, पापी, दुष्ट लोगों की संगत से बचना चाहिए।
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एकादशी व्रत में अन्न का सेवन करने से पुण्य का नाश होता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत का फल हजारों यज्ञों से भी अधिक है। शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाएं। बिल्व पत्र, हार-फूल, चंदन से श्रृंगार करें। किसी मंदिर में शिवलिंग के पास दीपक जलाएं और ऊँ नमः शिवाय मंत्र का जप करें।
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उत्पन्ना एकादशी पर्व शनिवार को मनाया जाएगा। इस एकादशी के दिन शहर के मंदिरों में भगवान विष्णु और देवी एकादशी की विशेष पूजा-अर्चना होगी। मंदिरों में विशेष सजावट की जाएगी। मंत्रों का जाप और विशेष आरती होगी। इस दिन व्रत और उपवास करने से मन निर्मल होता है। शरीर भी स्वस्थ होता है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत महत्व है। हर साल 24 एकादशियां आती हैं, लेकिन अधिकमास को मिलाकर इनकी संख्या 26 भी हो जाती है। मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष के दिन उत्पन्ना एकादशी का व्रत किया जाता है।
शास्त्रों के अनुसार अगर एकादशी का व्रत नहीं रखते हैं तो भी एकादशी के दिन चावल नहीं खाने चाहिए। इस व्रत में एक समय फलाहार कर सकते हैं। ज्योतिर्विद पं. हरिनारायण व्यास मनासा के अनुसार इस दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र, विष्कुंभयोग और अभिजीत मुहूर्त का संयोग बन रहा है। उन्होंने बताया कि शनिवार और एकादशी के योग में भगवान विष्णु-लक्ष्मी और शनिदेव की पूजा करने के लिए, पहले भगवान गणेश और फिर विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करें।
भगवान विष्णु को केसर-मिश्रित दूध से दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक कराएं, वस्त्र, फूल और मिठाई चढ़ाएं। बाद में शनिदेव की पूजा करें, जिसमें उन्हें तेल और काले तिल चढ़ाएं, मंत्र जाप करें और फिर शनिदेव को समर्पित चीजें जैसे तेल, काले तिल और जूते-चप्पल दान करें। वैज्ञानिक दृष्टि से लाभकारी एकादशी व्रत शरीर को विषमुक्त (डिटॉक्स) करने का माध्यम है। इस दिन हल्का भोजन या फलाहार करने से पाचन शक्ति मजबूत होती है और मन एकाग्र रहता है। एकादशी तिथि का प्रारंभ 14 नवंबर को देर रात 12:51बजे होगा। तिथि का समापन 15 नवंबर को देर रात 02:38 बजे होगा। एकादशी पर कर सकते हैं ये शुभ काम इस दिन भगवान विष्णु मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करना चाहिए। भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी का अभिषेक करें।
अभिषेक जल और दूध से करना चाहिए। दोनों देवी-देवताओं को पीले चमकीले वस्त्र अर्पित करें। फूलों से श्रृंगार करें। तुलसी के पत्तों के साथ मिठाई और मौसमी फलों का भोग लगाएं। पूजा में भगवान के सामने एकादशी व्रत करने का संकल्प लें। जो लोग व्रत करते हैं, उन्हें पूरे दिन निराहार रहना चाहिए, सुबह और शाम को विष्णु जी की विशेष पूजा करनी चाहिए। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर भी सुबह पूजा करें, पूजा के बाद जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं और फिर खुद भोजन ग्रहण करें। मार्गशीर्ष माह के कृष्णपक्ष की ग्यारस यानी ग्यारहवीं तिथि को भगवान विष्णु से एकादशी तिथि प्रकट यानी उत्पन्न हुई थीं। इसलिए इस दिन उत्पन्ना एकादशी का व्रत किया जाता है। इसे उत्पत्तिका, उत्पन्ना, प्राकट्य और वैतरणी एकादशी भी कहा जाता है।
पद्म पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस एका एकादशी की उत्पत्ति और इसके महत्व के बारे में बताया था। व्रतों में एकादशी को प्रधान और सब सिद्धियों को देने वाला माना गया है। ज्योतिर्विद पं. मनासा के अनुसार भगवान विष्णु से उत्पन्न हुई थी एकादशी तिथि उत्पन्ना एकादशी का व्रत करने से अश्वमेघ यज्ञ करने के बराबर पुण्य मिलता है। इस व्रत में व्रती को बुरे कर्म करने वाले, पापी, दुष्ट लोगों की संगत से बचना चाहिए।
एकादशी व्रत में अन्न का सेवन करने से पुण्य का नाश होता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत का फल हजारों यज्ञों से भी अधिक है। शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाएं। बिल्व पत्र, हार-फूल, चंदन से श्रृंगार करें। किसी मंदिर में शिवलिंग के पास दीपक जलाएं और ऊँ नमः शिवाय मंत्र का जप करें।




