4×4 ट्रैक्टर भी हुआ फेल पंधेर हाथ खड़े कर लौटे – Amritsar News h3>
विक्रमजीत शर्मा | अमृतसर/ अजनाला
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रमदास और उसके आसपास के गांवों में शनिवार दोपहर तक लोगों ने पहली बार राहत महसूस की। रावी दरिया का पानी करीब ढाई से तीन फीट उतर चुका था, खेतों में फसलें दिखने लगी थी, और छतों पर फंसे परिवार नीचे उतरकर नुकसान का अंदाजा लगाने लगे। लेकिन घड़ी ने जैसे ही ढाई बजाए, आसमान फिर से टूट पड़ा। तेज बरसात ने राहत की सांस को फिर डर में बदल दिया–गलियों में दोबारा पानी चढ़ा, और जिन घरों की दीवारें सूखने लगी थीं, वे फिर दलदल में धंसती नजर आईं।
रमदास में दिनभर जहां कुछ राहत दिखी, वहीं पानी ने अजनाला ने तबाही मचा रखी हैं। यहां के 10 और गांव बाढ़ की जद में आ गए। इसी के साथ लोपोके में बाढ़ की एंट्री हो गई है।यहां के करियाला, छीना कर्म सिंह और जस्तरवाल की गलियों में सकी नाले का उफान सीधे घरों में घुस आया। प्रशासन ने बचाव का फोकस इन इलाकों पर कर लिया है।
उधर, तीन दिन से लापता पैड़ेवाल गांव के 18 वर्षीय युवक गुरजोत की लाश रावी नदी के किनारे मिली। वह 28 अगस्त को पानी में गिर गया था, जिसके बाद उसकी तलाश जारी थी। रावी का पानी कम होने पर नुकसान का असली मंजर खुला। रमदास के खेतों में चारे की फसल लगभग पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
धान लेट गया है–किसानों को उम्मीद है कि बासमती अभी अंकुर पर है, कुछ हिस्सा फिर खड़ा हो सकता है, मगर कटाई के समय सबसे ज़्यादा दिक्कत आएगी। गन्ने में सिल्ट भर गई है। घरों के फर्श धंस गए, दीवारों में दरारें और छतों में छेद पड़ गए। लिंक सड़कों के किनारे हर सौ–दो सौ मीटर पर धंसान है; यही वजह है कि राहत पहुंचाने आई ट्रॉलियों को भी गांव–गांव में धक्के खाने पड़े।
पशियां गांव के दलजीत सिंह ने चार दिन बाद जमीन देखी– ‘चारों तरफ बस पानी ही पानी था। अब भी पता नहीं, यह बाढ़ कितने दिन रहेगी; जो मिल रहा है, उसे संभालकर रख रहे हैं।’ गांववाले बताते हैं कि दवाएं-गैस, बीपी, शुगर, एलर्जी और बुखार-फौरन चाहिए। एलपीजी सिलेंडर खत्म होने को हैं, अतिरिक्त सिलेंडर मिले तो राहत मिले। बच्चों के लिए दूध और मवेशियों के लिए स्थायी चारे की सप्लाई अगले हफ्ते तक सुनिश्चित हो, तभी रसोई और खलिहान दोनों चल पाएंगे।
खाने–पीने की चीजें फिलहाल पहुंच रही हैं, लेकिन सबसे बड़ी कमी दवाओं और एलपीजी सिलेंडर की है। मजीठा के भोमा रोडे से दवाएं लेकर आए प्रीतम सिंह बताते हैं–गैस, बीपी, शुगर, एलर्जी और फीवर की दवाओं की मांग सबसे ज्यादा है; हालात की टेंशन से बीपी बढ़ रहा है और खाली पेट रहने से गैस की दिक्कत भी। जट्टा गांव के जसविंदर सिंह के घर में छह लोग हैं–एक सिलेंडर 15 दिन चलता है, पर अतिरिक्त भरा सिलेंडर नहीं है; 10 मवेशियों के लिए रोज चारे की जुगत अलग।
कोट गुरबख्श, सिंहपुरा, तालिबुर, शहजादा, कोटली शाहपीर, सिंघोके, निसोके, वहला विला, शामपुरा, घोनेवाल, मच्छीवाल… ज्यादातर गांवों में यही चिंता है–बच्चों का दूध, बुजुर्गों की दवा और गैस कब तक चलेगी। रमदास के गांव शाहपुर कोटली की सरपंच सुरजीत कौर बताती हैं–गांव में साठ–सत्तर घर हैं और ऐसा कोई नहीं जिसे नुकसान न पहुंचा हो। ‘चार दिन बाद जब पानी उतरा तो टूटी दीवारें, धंसे फर्श और दलदल में तब्दील आंगने देखकर आंखें भर आईं।’
ऊपर से बिजली चार दिन से गुल है; जिन घरों में इनवर्टर या जनरेटर थे, वे भी जवाब दे चुके हैं। तालिबपुर के सरबजीत सिंह ने बताया कि वह अपने परिवार के साथ घर से 10 किलोमीटर दूर ऊंच इलाके में रिश्तेदार के घर रह रहे हैं, मगर उनके पिता घर छोड़ने को तैयार नहीं। इसलिए उन्हें रोजाना उनकी खाने और दवा का प्रबंध करने के लिए गांव आना पड़ता है। पिता का दिल का इलाज चल रहा है।
अजनाला की गौशाला में पानी पहुंचते ही मवेशियों को रातों–रात भक्खा तारा सिंह के सरकारी एलिमेंट्री स्कूल में शिफ्ट किया गया। सुबह तक यहां से बारह दुधारू गाय चोरी हो गईं। सूरेपुर के एक घर में चोरी हुई। बॉर्डर पर पंजग्राईं पोस्ट की तरफ़ से फंसे बीएसएफ के जवानों को रेस्क्यू कराया गया है। सकी पुल कमजोर होने पर पुलिस ने बेवजह घूमने वालों को आने जाने से रोक रही है। अजनाला और आसपास के संवेदनशील हिस्सों की बिजली काटी दी ई है।
नाले का पानी बिजली घर की दीवार तक पहुंच चुका है, जिसे बचाने के लिए जेसीबी से मिट्टी टिकाई जा रही है । अजनाला के गांव हरड़ खुर्द में किसान नेता पंधेरा का 4×4 का ट्रैक्टर पूरी तरह से पानी में चला गया। इसके बाद उन्होंने वीडियो शेयर कहा कि इससे आगे वह भी नहीं जा पाएंगे। राहत के बीच सबसे पहले नज़र आती हैं सेवा में डूबी ट्रैक्टर–ट्रॉलियां। जालंधर, लुधियाना और मजीठा की तरफ़ से जत्थेबंदियां ब्रेड–पकौड़े, बिस्किट, पानी, दवाएं और भूसा लेकर पहुंचीं तो गांवों की तंग लिंक सड़कों पर जाम लग गया–कहीं कोई बांटकर लौट रहा था, तो कोई आगे बांटने को निकल रहा था। दसूहा से आए परमदीप सिंह की 10 सदस्यीय टीम सुबह से ही चारा बांट रही थी।
उनके ट्रैक्टर पर एक–एक क्विंटल की सत्तर गांठें थीं, जिन्हें वे संघोके की तरफ बांटते चले जा रहे थे। सेवा के बीच उनके मुंह से दर्द भी निकला- श कोई न आवे तां दुख नहीं, पंजाब नूं मां दे पुत्त बथेरे। जब दूसरे सूबों में आफत आती है, पंजाब दिल खोलकर खड़ा होता है; पर पंजाब डूब रहा है तो बाहर से कोई नहीं आया। फिर भी यहां किसी और की जरूरत नहीं–अपने नौजवान दिन–रात सेवा में लगे हैं।’



