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76 CRPF जवानों को मारने वाले नक्सली का इंटरव्यू: 18 साल बसवाराजू-हिड़मा के साथ जंगलों में रहा, नक्सलियों का दुश्मन बना तो पत्नी ने छोड़ा

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76 CRPF जवानों को मारने वाले नक्सली का इंटरव्यू:  18 साल बसवाराजू-हिड़मा के साथ जंगलों में रहा, नक्सलियों का दुश्मन बना तो पत्नी ने छोड़ा

76 CRPF जवानों को मारने वाले नक्सली का इंटरव्यू: 18 साल बसवाराजू-हिड़मा के साथ जंगलों में रहा, नक्सलियों का दुश्मन बना तो पत्नी ने छोड़ा

दुबला-पतला शरीर, आंखों में डर, लेकिन चेहरे पर मुस्कुराहट और जुबान पर नक्सलियों के किस्से, ये 34 साल के अरब हैं। 18 साल नक्सली रहे। 2006 में पहली बार बंदूक उठाई, तब 16 साल उम्र थी। उस वक्त छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम आंदोलन चल रहा था। इसमें अरब का घर जला

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शुरुआत में पोस्टर और बैनर लिखने का काम मिला। धीरे-धीरे ओहदा बढ़ा और डिवीजन कमेटी मेंबर जैसा अहम पद मिला। जंगलों में ही नक्सली महिला से शादी कर ली। हिड़मा और बसवाराजू जैसे बड़े नक्सल लीडर्स तक पहुंच हो गई। 2010 में छत्तीसगढ़ में 76 जवानों की हत्या हुई। इस साजिश में अरब भी हिड़मा के साथ शामिल थे।

18 साल जंगलों में रहने के बाद लगा कि नक्सल आंदोलन भटक गया है। इसलिए जनवरी 2025 में सरेंडर कर दिया। सरेंडर करने पर पत्नी ने छोड़ दिया। 21 मई को सिक्योरिटी फोर्स ने अबूझमाड़ के जंगलों में बसवाराजू को मार गिराया। हिड़मा की तलाश जारी है।

दैनिक NEWS4SOCIALने दोनों के साथ काम कर चुके और माड़ डिवीजन के नेलनार एरिया कमेटी के सेक्रेटरी रहे अरब से बात की। उन्हें जान का खतरा है, इसलिए वे नारायणपुर में कहीं छिपकर रहते हैं।

पहले नक्सली रहे अरब अब नक्सलियों के खिलाफ लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड के लिए उनकी ट्रेनिंग चल रही है।

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पुलिस की परमिशन के बाद अरब से मुलाकात, पहले तीन बार जांच नक्सली कमांडर, जिसने दो दशक जंगलों में बिताए हों, जिसे जान का खतरा हो, उससे मिलना आसान नहीं था। पुलिस से कई बार बात करने के बाद हमें अरब से बातचीत का वक्त मिला। तीन जगह हमारे आई-कार्ड और डॉक्यूमेंट चेक किए गए। इसके बाद हम अरब तक पहुंच पाए। सरेंडर के बाद अरब को नया नाम मिल गया है। सुरक्षा कारणों की वजह से हम ये नाम नहीं दे रहे हैं। पढ़िए पूरा इंटरव्यू…

सवाल: नक्सलियों के साथ कब और कैसे जुड़े? जवाब: 2006 में पार्टी में भर्ती हुआ था। तब 16-17 साल का था। सलवा जुडूम का आतंक था। गांव जलाए जा रहे थे। डर की वजह से गांव के लोग बंट गए। कुछ जंगल में भाग गए और कुछ तेलंगाना चले गए।। मैं 2003-04 से माओवादियों की स्टूडेंट विंग के कॉन्टैक्ट में था। मुझे उनकी ‘जल-जंगल-जमीन’ की बातें अच्छी लगती थीं। डर और उस वक्त के माहौल की वजह से मैंने भी बंदूक उठा ली।

सवाल: संगठन में आपका काम क्या था? जवाब: मेरा काम सिर्फ बंदूक चलाना नहीं था। मैं पढ़ा-लिखा था, इसलिए जल्द ही बड़ी जिम्मेदारी मिलने लगी। हिड़मा, गणपति और बसवाराजू जैसे बड़े लीडर के साथ मीटिंग में शामिल होने लगा। शुरुआत में मेरा काम पोस्टर और बैनर लिखना था। फिर साउथ बस्तर डिवीजन में ‘पितुरी’ नाम की मैगजीन निकालने की जिम्मेदारी दी गई।

2015 के बाद मैंने माड़ डिवीजन में ‘भूमकाल पत्रिका’ का काम संभाला। पब्लिशिंग से जुड़े फैसले डिवीजन कमेटी लेती है। ज्यादातर सेक्रेटरी इसे डील करता है। इस तरह धीरे-धीरे संगठन में जगह बनाता गया और डिवीजन कमेटी मेंबर के पद तक पहुंच गया। मैं संगठन में था, तब डिवीजन में 150 सदस्य थे।

ये पुलिस का रिकॉर्ड है, जिसमें अरब का नाम नेलनार एरिया कमेटी के सेक्रेटरी के तौर पर दर्ज है। ये रिकॉर्ड अरब के सरेंडर से पहले का है।

सवाल: नक्सली कैसे काम करते हैं? जवाब: संगठन की शुरुआत गांव से होती है। यहां ‘जन संगठन’ या जनता सरकार होती है। ये गांव में गोलबंदी करते हैं। इनमें क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन और किसान मजदूर संगठन शामिल हैं। ये लोगों को खासकर महिलाओं और किसानों को पार्टी की विचारधारा से जोड़ते हैं और उन्हें पार्टी के कार्यक्रमों में लाते हैं।

क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन गांव-गांव में महिलाओं से मिलता है। महिला कैडर की भर्ती करता है और सपोर्ट जुटाता है। जन संगठन से ऊपर कमेटियां होती हैं।

एरिया कमेटी: ये कमेटी 70 से 80 गांव में काम करती है। ये उस पूरे एरिया में संगठन चलाती है। इसके मेंबर लोगों के सुख-दुख में शामिल होते हैं। कोई झगड़ा या कोई परेशानी होती है, तो उसे कमेटी में मीटिंग करके सुलझाते हैं।

डिवीजन कमेटी: तीन से चार एरिया कमेटी मिलाकर एक डिवीजन कमेटी बनती हैं। ये कमेटी देखती है कि इन एरिया में क्या हो रहा है, गांवों में संगठन कैसे चल रहा है, कैसे उसे बढ़ाया जाए, क्या दिक्कतें आ रही हैं, भर्ती कैसे होगी।

डिवीजन कमेटी के ऊपर ब्यूरो होता है। दंडकारण्य को तीन ब्यूरो में बांटा गया है। एक ब्यूरो में तीन-चार डिवीजन आते हैं। फिर जोन कमेटी होती है। जोन कमेटी स्टेट यूनिट की तरह होती है। छत्तीसगढ़ में एक जोन कमेटी है। उसके बाद रीजनल ब्यूरो होता है। सबसे ऊपर सेंट्रल कमेटी और पोलित ब्यूरो होता है। सेंट्रल कमेटी और पोलित ब्यूरो ही संगठन की दिशा और रणनीति तय करते हैं।

देश को भी तीन हिस्से में बांटा गया है। मध्य रीजनल, पूर्वी रीजनल और पश्चिम जोन। पश्चिम जोन में कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल हैं। इसे ट्राइजंक्शन जोन बोलते हैं। मध्य रीजनल में दंडकारण्य और ओडिशा जैसे जोन आते हैं। पूर्वी रीजनल में पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड है।

सवाल: संगठन का स्ट्रक्चर क्या है? जवाब: इसके दो हिस्से होते हैं। मिलिट्री वर्क और मास वर्क। मिलिट्री वर्क में आता है जवानों पर हमला करना। मास वर्क मतलब गांव का संगठन। इसमें जनता को गोलबंद करना, संगठनों की मीटिंग और एजुकेशन का काम होता है। मास वर्क में शामिल लोग भी मिलिशिया हैं। वे लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। लड़ने के लिए बनी कंपनी और प्लाटून मास वर्क में शामिल नहीं होते।

सवाल: क्या नक्सलियों में आत्मघाती दस्ते होते हैं? जवाब: नहीं, मेरी जानकारी में तो नहीं है। ऐसी ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती।

सवाल: नक्सलियों के नेता कैसे चुने जाते हैं? जवाब: नक्सली भारत सरकार के नक्शे को नहीं मानते। छत्तीसगढ़ का उनका अपना नक्शा है, जिसमें छत्तीसगढ़, तेलंगाना, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और ओडिशा के इलाके आते हैं। इनके हिसाब से चुनाव होता है।

कंपनी में अधिवेशन होते हैं। इसमें कंपनी मेंबर चुने जाते हैं। अधिवेशन में सभी प्रतिनिधि आते हैं। इसमें वोटिंग नहीं होती। लीडर एक नाम पुकारता है, जिसके नाम पर सबसे ज्यादा हाथ उठते हैं, उसे मेंबर चुन लिया जाता है। सब मेजॉरिटी से तय होता है।

सवाल: अभी नक्सलियों के सबसे बड़े नेता कौन हैं? जवाब: सेंट्रल कमेटी और पोलित ब्यूरो सबसे ऊपर हैं। बसवाराजू सेंट्रल कमेटी मेंबर था। सेंट्रल कमेटी में टॉप लीडर होते हैं। सरकार में जैसे कैबिनेट होती है, वैसे पोलित ब्यूरो है। पोलित ब्यूरो में हिड़मा, गणपति, देवुजी और सोनू मेरी जानकारी में हैं। इनसे सिर्फ भरोसेमंद लोग ही मिल सकते हैं। हालांकि, ये लोग गांवों में जाते हैं, तब कोई भी उनसे मिल सकता है।

सवाल: आप हिड़मा और बसवाराजू से कब मिले थे? जवाब: मैं हिड़मा के साथ 2007 से 2014-15 तक रहा। मैं 2010 में उसके साथ था, जब छत्तीसगढ़ में 76 जवानों की हत्या हुई थी। यह नक्सल इतिहास का सबसे बड़ा हमला था। उस हमले का मास्टरमाइंड हिड़मा ही था। मैंने तभी बसवाराजू को देखा था। वो हमले के लिए बनी रणनीति की मीटिंग में शामिल हुआ था। हमले की प्लानिंग उसी ने की थी।

सवाल: बसवाराजू की तो मौत हो गई, हिड़मा अभी कहां है? जवाब: इसका आइडिया नहीं है कि वो कहां है। ये पता है कि वो अब भी आराम से रहता है। चल-फिर सकता है। उसके पास अपनी सुरक्षा की पूरी व्यवस्था है। पार्टी में और भी कई नेता हैं, लेकिन संगठन की हालत ऐसी नहीं है कि कोई एक व्यक्ति आसानी से नेतृत्व संभाल सके। देवुजी और सोनू जैसे नेता बसवाराजू की जगह ले सकते हैं।

सवाल: नक्सली आपस में कम्युनिकेशन कैसे करते हैं? जवाब: बात करने के लिए वॉकी-टॉकी होता है। सिर्फ बड़े लीडर मोबाइल रखते हैं। उन्हें ही इसकी परमिशन है। इसके अलावा टैबलेट-कम्प्यूटर मिलता है।

सवाल: क्या कैडर को सैलरी मिलती है? जवाब: नहीं, किसी मेंबर को सैलरी नहीं मिलती। हर यूनिट को पूरे साल का बजट मिलता है। ये कितना होगा, ऊपर से तय होता है। वे पूछ लेते हैं कि आपको कितने पैसों की जरूरत पड़ेगी। उसी हिसाब से देते हैं। इसके अलावा गांववालों से टैक्स के नाम पर साल में एक दिन की मजदूरी ली जाती है। चाहे वो चावल दें या पैसे, जो उनके घर में है, वही ले लेते हैं।

सवाल: नक्सली कहां रहते हैं, जंगलों में या गांवों में? जवाब: ज्यादातर जंगलों में ही रहते हैं। अगर 10 दिन हैं, तो 8 दिन जंगल में और 2 दिन किसी दूरदराज के गांव में डेरा डालते हैं। एक जगह पर कितने दिन रुकना है, ये काम और सुरक्षा के लिहाज से तय करते हैं। पहले एक जगह पर 10-15 दिन भी रह लेते थे, लेकिन फोर्स के ऑपरेशन बढ़ने से अब ऐसा मुमकिन नहीं है।

बोटेर और गुंडेकोट जैसी जगहों पर महीनों रुक जाते थे। अब तो सुबह का खाना एक जगह और शाम का खाना दूसरी जगह बनाना पड़ जाता है। बसवाराजू गुंडेकोट में ही छिपा हुआ था, जहां सिक्योरिटी फोर्स ने उसे मार गिराया।

सवाल: महिला और पुरुष नक्सली के बीच शादी की खबरें आती हैं, ये कितनी सच हैं? जवाब: शादी हो सकती है, लेकिन उसके लिए परमिशन लेनी पड़ती है। कंपनी को बताना पड़ता है। कमांडर मान जाते हैं, तो शादी हो सकती है। हालांकि, निजी रिश्ते बनाना सख्त मना है। अगर कोई ऐसा करता है, तो उसे पार्टी से निकाल देते हैं। अगर दोनों मर्जी से भी रिश्ता बनाते हैं, तो ये भी पार्टी के नियमों के खिलाफ है। सिर्फ शादीशुदा जोड़े साथ रह सकते हैं।

मुझे भी संगठन में रहते हुए प्यार हुआ। उससे शादी भी की। शादी से पहले पुरुष नक्सली को नसबंदी करानी पड़ती है। इसके लिए वहां डॉक्टर होते हैं। मेरी भी नसबंदी हुई है।

मैं और मेरी पत्नी अलग डिवीजन में थे। मैं संगठन छोड़ चुका हूं, लेकिन पत्नी अब भी नक्सलियों के साथ है। मैंने उसे कई बार खत लिखा, लेकिन उसने अपने पिता को लेटर भेजकर आने से इनकार कर दिया।

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सवाल: नियम तोड़ने पर क्या सजा मिलती है? जवाब: कोई गलती करता है तो उसे पद से हटा दिया जाता है या संगठन से निकाल देते हैं। एक नक्सली था। उसने गलती से बम ब्लास्ट कर दिया। एक लड़का मर गया था, इसलिए नक्सली को पद से हटा दिया। ज्यादा गंभीर मामला हो तो गलती करने वाले को घर भेज देते हैं। गलती करने वाला कोई भी हो, उसे सजा मिलती है।

संगठन की अपनी जेल नहीं है। जो नक्सली संगठन छोड़ देते हैं, उसे ‘गद्दार’ करार दिया जाता है। उसे देखते ही जान से मारने का आदेश दिया जाता है। उसका परिवार भी इसकी कीमत चुकाता है। परिवार से कहा जाता है कि उससे रिश्ता न रखें।

सवाल: संगठन में आप किस पोजिशन पर थे और सरेंडर करने का ख्याल क्यों आया? जवाब: मैं डिवीजन कमेटी का मेंबर था। एक एरिया कमेटी का इंचार्ज था। तब मेरे साथ 15 से 18 लोग रहते थे। 4 अक्टूबर, 2024 को थुलथुली में एनकाउंटर हुआ था। हमारे 35 साथी मारे गए। तब मुझे लगा कि संगठन अब कमजोर हो गया है। पार्टी सिकुड़ रही थी। बहुत नुकसान हो रहा है।

पार्टी अब जीतने वाली नहीं है। रास्ते से भटक गई है। जल-जंगल-जमीन की आजादी की बात करने वाला संगठन अब झूठे आरोप लगाकर बेगुनाह लोगों को मार रहा है। लोगों की आजादी छीन रहा है। तभी मैंने सरेंडर करने का फैसला लिया।

सवाल: सरेंडर से पहले आपको डर नहीं लगा? जवाब: शुरू में बहुत डर लगा था। मेरे खिलाफ वारंट था। मुझे लगता था कि पुलिस मुझे गोली मार देगी। फिर भी हिम्मत करके उनसे बात की। अफसरों का बर्ताव मेरी उम्मीद से कहीं बेहतर था। उन्होंने मेरा स्वागत किया और कहा- अच्छी जिंदगी जियो। मैंने संगठन की सारी जानकारी ईमानदारी से दी। इससे उन्हें मुझ पर भरोसा हो गया।

सवाल: क्या आपको लगता है कि आपने गलत रास्ता चुन लिया था? जवाब: हां, अब लगता है कि मैंने गलत रास्ता चुना था। 18-19 साल बर्बाद कर दिए। संगठन में कहा कुछ जाता है और करते कुछ और हैं। हम जिस मकसद के लिए लड़ रहे थे, उस पर कोई काम नहीं हो रहा था। मेरे दो भाई हैं। मैं गांव गया और उनसे कह दिया है कि वे मुझसे रिश्ता न रखें।

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पता चला है कि मेरे परिवार पर दबाव डाला जा रहा है। इसलिए मैं घर पर फोन भी नहीं करता। अब मैं डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड में शामिल होने वाला हूं। मेरी ट्रेनिंग शुरू हो चुकी है।

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सवाल: नक्सलियों के लिए आपका क्या मैसेज है? जवाब: मेरा यही मैसेज है कि वे संगठन छोड़ दें। पार्टी में अब कोई नेतृत्व नहीं है। संगठन अपने मकसद से भटक गया है। यह आंदोलन अब जनता का भला नहीं कर रहा। सरकार सरेंडर करने वालों को अच्छा मौका दे रही है। उन्हें सरेंडर करके मुख्यधारा में शामिल होना चाहिए और परिवार के साथ अच्छा जीवन जीना चाहिए।

सवाल: सरकार कह रही है कि 2026 तक नक्सलवाद खत्म कर देगी। ऐसा हो पाएगा? जवाब: हथियारों वाला संगठन शायद न रहे, लेकिन विचारधारा बची रह सकती है। 2026 तक इसे पूरी तरह खत्म करना असंभव लगता है। सब बुनियाद से जुड़े हैं। इसे खत्म करना इतना आसान नहीं है। (इस सवाल पर साथ खड़े सिक्योरिटी फोर्स के अधिकारी ने कहा कि ये सवाल मत लीजिए)

अगली स्टोरी में 19 जून को पढ़िए नक्सलियों के ट्रेनिंग सेंटर रहे चांदामेटा से ग्राउंड रिपोर्ट ………………………………………. कैमरामैन: अजित रेडेकर ………………………………………..

‘नक्सलगढ़ से भास्कर’ सीरीज की स्टोरी यहां पढ़िए

1.जहां नक्सली बसवाराजू मारा, वहां न रास्ते, न नेटवर्क; ऑपरेशन ‘अबूझ’ के निशान बाकी

अबूझमाड़ का कलेकोट पहाड़ करीब 10 किलोमीटर में फैला है। 1300 मीटर से ज्यादा ऊंचा है। यहीं नक्सलियों का टॉप लीडर नंबला केशव राव उर्फ बसवाराजू मारा गया। ये घने जंगल वाला एरिया है। न रास्ता, न मोबाइल नेटवर्क। यहां पेड़ों पर गोलियों के अनगिनत निशान बने हैं। ये गोलियां बसवाराजू के एनकाउंटर के वक्त चली थीं। पढ़िए पूरी खबर…

2. कंपनी नंबर-7 की ‘गद्दारी’ से मारा गया बसवाराजू, फेक एनकाउंटर का दावा कितना सच

18 मई, 2025, डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड के जवानों ने नारायणपुर जिले में अबूझमाड़ के जंगलों में तीन तरफ से घुसना शुरू किया। उन्हें एक करोड़ के इनामी नक्सली लीडर बसवाराजू का ठिकाना पता चल गया था। बसवाराजू के साथ उसकी सुरक्षा करने वाली कंपनी नंबर-7 के लोगों ने ही गद्दारी की थी। 40 साल से इन जंगलों में छिपा हुआ बसवाराजू 21 मई को कलेकोट की पहाड़ी पर मारा गया। पढ़िए पूरी खबर

3. अबूझमाड़ के लोग बोले- पुलिस ने पीटा, नक्सली राशन ले जाते हैं, हम दोनों तरफ से पिस रहे

‘नक्सली गांव में आते हैं। हमसे चावल या जो भी मांगते हैं, हमें देना पड़ता है। उस दिन (19 मई को) पुलिस आई, तो हमने पुलिस को भी सब कुछ दिया। पुलिसवाले यहीं रुके थे, नशा किया और हमें पीटा भी। फिर तीन-चार मुर्गे भी ले गए। हम तो दोनों तरफ से ही पिस रहे हैं।’ ये कहना है गुंडेकोट गांव के रहने वाले मनकू राम मंडावी का। इसी गांव के पास 21 मई को बसवाराजू मारा गया। पढ़िए पूरी खबर..

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