कैनाल मैन 71 साल की उम्र में करेंगे दूसरी शादी: पहली पत्नी की याद में बना रहे तालाब; लौंगी भुइयां बोले- शादी के लिए केंद्रीय मंत्री से लेंगे परमिशन – Gaya News h3>
गया के कैनाल मैन लौंगी भुइयां 71 साल की उम्र में दूसरी शादी करने का विचार कर रहे हैं। पहली पत्नी रामरती देवी की मौत के बाद उनकी याद में जंगल के बीचों बीच 2 बड़े तालाब खोद रहे हैं। उनका मानना है कि जीवन के आखिरी पड़ाव में एक हमसफर की जरूरत है। जो मेरा
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71 की उम्र में दूल्हा बनने की तैयारी
लौंगी भुइयां ने बताया, ‘बुढ़ापे में सेवा करने वाला कोई नहीं है। इसलिए दूसरी शादी का विचार किया है। अगुवा (मीडिएटर) एक रिश्ता भी लेकर आया है। रानीगंज की एक महिला तैयार भी है। इसके लिए अपने ‘गार्जियन’ केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी से परमिशन लेंगे। परमिशन मिलने के बाद ही शादी करेंगे। हम मांझी जी से कहेंगे कि शादी के लिए 60-70 हजार की मदद करें।’
रामरती देवी की मौत के बाद अकेला पड़ गया हूं। घर में 4 बेटे और बहु हैं। बहु समय पर खाना देती हैं। समय पर घर नहीं पहुंचता हूं तो सभी परेशान हो जाते हैं। इसलिए सत्तू लेकर जंगल जाता है। भूख लगने पर घोलकर पी लेता हूं। कभी बेल खा लेता हूं। थक जाने पर खुद ही अपने शरीर पर तेल लगा लेता हूं।
कैनाल मैन लौंगी भुइयां
पत्नी की याद में तालाब का निर्माण
कैनाल मैन का पहला मिशन गांव को पानी देना था। 30 साल की मेहनत से अकेले ही 3 किलोमीटर लंबी नहर खोद डाली। दूसरा मिशन बरसाती पानी को संरक्षित करने के लिए पहाड़ी के नीचे तालाब बनाना था। अब तीसरा मिशन है पत्नी की याद में तालाब और खुद के लिए जीवन संगिनी की तलाश करना।
पत्नी के नाम पर बनेगा ‘पानी वाला स्मारक’ गया के खजरहा जंगल में लौंगी भुइयां लगभग 100 फीट चौड़े और 12 फीट ऊंचे दो तालाब की खुदाई कर रहे हैं। इसमें मछली पालन की योजना है। यहां बसाती पानी को संरक्षित किया जाएगा। पानी की निकासी के लिए सिस्टम भी तैयार किया है। ताकि पानी पहाड़ के नीचे पहले से बनी पइन (नहर) में पहुंच सके।
आज भी मिट्टी के घर में रहते हैं। बिजली का बल्ब घर में जलता है। लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनता है। घर में एक हैंडपंप लगा है। उज्ज्वला योजना, नलजल योजना और इंदिरा आवास योजना का लाभ अब तक नहीं मिला है।
तालाब खोदते हुए लौंगी भुइयां।
ट्रैक्टर से 10 हजार की आमदनी
चार साल पहले आनंद महिंद्रा ने उन्हें ट्रैक्टर गिफ्ट किया था। जो ईंट भट्ठे पर चलता है। हर महीने 10 हजार की आमदनी होती है, लेकिन इतने कम पैसे में घर नहीं चलता। परिवार की जरूरतें पूरा नहीं हो पाती है।
गांव के लोग लौंगी भुइयां को ‘दूसरे दशरथ मांझी’ भी कहते हैं। फर्क बस इतना है कि दशरथ मांझी ने पहाड़ काटकर रास्ता बनाया था, जबकि लौंगी भुइयां ने पहाड़ काटकर पानी का रास्ता खोला था। दोनों ने समाज के लिए संघर्ष किया। लेकिन सरकारी व्यवस्था से दोनों ही उपेक्षित रहे।



