नेहरू ने कश्मीर पर की थी एक आखिरी कोशिश: अंतिम दिनों में घंटों कपूर के नीचे बैठे रहते; निधन पर पाकिस्तान ने भी झुकाया अपना झंडा h3>
27 मई, 1964 को संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कश्मीर मुद्दे पर कुछ सवालों के जवाब देने वाले थे। नेहरू जब दोपहर तक सदन नहीं पहुंचे, तो सांसद सवाल उठाने लगे। उन्हें बताया गया कि प्रधानमंत्री की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। थ
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उस रोज दोपहर 1:44 बजे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आखिरी सांस ली थी। आज इस घटना को 61 साल पूरे हो रहे हैं। जानिए कैसे रहे नेहरू की जिंदगी के आखिरी दिन…
निधन से 11 महीने पहलेः चीन से मिली हार के बाद कंधे झुक गए, बेटी-पोतों के साथ पहलगाम गए नेहरू
भारत और चीन के बीच लद्दाख में अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश में तवांग के इलाके को लेकर विवाद था। 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया। प्रधानमंत्री नेहरू, उनके सलाहकारों और रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन को चीन से किसी हमले की उम्मीद ही नहीं थी।
एक महीने चले युद्ध में भारत, चीन के सामने सैन्य संख्या, तैयारियों, हथियारों हर मायने में कम था, जिसका उसे नुकसान उठाना पड़ा। चीन ने 20 नवंबर 1962 को एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की और कहा कि वह 1 जनवरी 1959 की स्थिति तक पीछे हट जाएगा। लेकिन अक्साई चिन पर चीन का कब्जा बना रहा और आज तक जारी है।
नेहरू को इस हार के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगा। बीच युद्ध में ही 31 अक्टूबर 1962 को रक्षा मंत्री मेनन को इस्तीफा देना पड़ा। देश भर से मिलती आलोचनाओं ने नेहरू को कमजोर कर दिया था।
रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं, ‘नेहरू के कंधे झुक गए थे। उनके चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी। कमर में अलग तरह का उभार दिखाई दे रहा था।’
बिगड़ती तबीयत के बीच नेहरू 18 जून, 1963 को कश्मीर गए। उनके साथ इंदिरा गांधी और दोनों पोते राजीव और संजय भी थे। यहां उन्होंने जम्मू-कश्मीर विधानसभा के मंत्रियों, स्पीकर, डिप्टी स्पीकर और विधान परिषद के चेयरमैन की मीटिंग ली।
जून 1963 में कश्मीर यात्रा के दौरान जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी।
श्रीनगर में कुछ और ऑफिशियल काम निपटाकर, नेहरू पहलगाम के लिए निकले। यहां वे राजनीति से दूर कुछ समय बिताना चाहते थे। इंदिरा और बच्चों के साथ वे आरू वैली और कोलाहोई ग्लेशियर घूमने गए और तस्वीरें खिंचाई। पहलगाम में 24 जून 1963 को उन्होंने उड़ीसा के मुख्यमंत्री बिजू पटनायक के साथ भी मीटिंग की। करीब 10 दिन कश्मीर में परिवार के साथ बिताकर 28 जून को नेहरू वापस दिल्ली लौट गए।
निधन से 9 महीने पहलेः नेहरू के खिलाफ आजाद भारत का पहला अविश्वास प्रस्ताव आया
युद्ध के बाद नेहरू की लोकप्रियता पर बड़ी चोट पड़ी। 1963 में कांग्रेस तीन लोकसभा सीटों पर उपचुनाव भी हार गई। यह हार कांग्रेस के कम होते प्रभाव की ओर ही इशारा कर रही थी। इस बीच संसद के मानसून सत्र में 19 अगस्त को विपक्ष की ओर से जे. बी. कृपलानी ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला दिया। यह आजाद भारत का पहला अविश्वास प्रस्ताव था।
चार दिन चले डिबेट में नेहरू हर दिन मौजूद रहे। कृपलानी ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा- ‘भारत को चीन से समझौता करने की कोई जरूरत नहीं थी। हमें शारीरिक और मानसिक रूप से चीनियों को अपनी सीमा से बाहर निकाल फेंकने के लिए तैयार रहना चाहिए था।’
नेहरू पर गलत नीतियां अपनाने, मिलिट्री तैयार न रखने जैसे आरोप लगे। डिबेट के आखिरी दिन जब नेहरू जवाब देने उठे तो उन्होंने इस प्रस्ताव को ही अवास्तविक बताया। उन्होंने कहा, ‘अविश्वास प्रस्ताव सरकार में मौजूद पार्टी को हटाने के लिए लाया जाता है। लेकिन अभी ऐसी कोई स्थिति नहीं दिख रही, इसलिए यह प्रस्ताव थोड़ा अवास्तविक है।’
संसद में अविश्वास प्रस्ताव का जवाब देते पीएम नेहरू।
इस अविश्वास प्रस्ताव को सदन में सिर्फ 62 वोट मिले, जबकि इसके खिलाफ 347 सांसदों ने वोट किया और नेहरू बड़े आराम से यह परीक्षा पार कर गए। लेकिन अब तक इन मुश्किल इम्तिहानों का असर उनके सेहत पर दिखने लगा था।
सितंबर 1963 में जब नेहरू सदन पहुंचते थे तो पहले से कई ज्यादा बूढ़े दिखाई देते थे। उनके पर्सनल सेक्रेटरी रहे एच.वी. कामथ ने इस दौरान उनकी स्थिति के बारे में कहा था, ‘नेहरू बूढ़े, कमजोर और थके हुए दिख रहे थे, उनकी चाल में झुकाव और लड़खड़ाहट थी। नीचे उतरते समय सहारे के लिए बेंचों की पिछली सीट पकड़ रहे थे।’
इंदिरा गांधी ने भी अपनी एक दोस्त को पत्र में नेहरू की तबीयत के बारे बताया,
मेरे पिता के ब्लड प्रेशर, वजन और पेशाब की हर हफ्ते जांच होती है। वे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनाव से गुजर रहे हैं, जिसके कारण वे थके हुए दिखाई दे रहे हैं। इसका सिर्फ एक ही इलाज है, और वो है आराम।
कांग्रेस की कमजोर होती स्थिति को उबारने के लिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. कामराज ने एक सुझाव दिया। सुझाव था कि पार्टी के सीनियर मंत्रियों को इस्तीफा दे देना चाहिए और कांग्रेस को फिर से मजबूत करने के काम में लग जाना चाहिए। इस प्लान के तहत सीनियर केंद्रीय मंत्री- जगजीवन राम, मोरारजी देसाई और लाल बहादुर शास्त्री तक ने इस्तीफा दिया। कामराज सहित कांग्रेस के 6 मुख्यमंत्रियों ने भी पद छोड़ दिया।
नेहरू ने इस्तीफा नहीं दिया। वे देश के हर कोने की यात्रा कर रहे थे। दिसंबर 1963 में नेहरू मद्रास, मदुरई, चंडीगढ, कलकत्ता, बिहार और दो बार बॉम्बे गए थे।
निधन से 4 महीने पहलेः भरी मीटिंग में नेहरू को स्ट्रोक आया, एक हिस्सा पैरालाइज हो गया
6 जनवरी 1964 को नेहरू को भुवनेश्वर में कांग्रेस की वार्षिक बैठक में शामिल होना था। वे 5 तारीख को ही उड़ीसा पहुंच गए थे। एयरपोर्ट से राजभवन के बीच करीब 5 किलोमीटर तक नेहरू को देखने लोगों की भीड़ उमड़ी हुई थी।
वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री एम. जे. अकबर अपनी किताब ‘नेहरू: द मेकिंग ऑफ इंडिया’ में लिखते हैं, ‘नेहरू एक ओपन जीप में सवार होकर जनता का अभिवादन कर रहे थे। लेकिन इस दौरान भी नेहरू के चेहरे में सूजन, आंखों में गड्ढे और धीमी चाल साफ दिखाई दे रही थी।’
अगले दिन बीच मीटिंग में ही नेहरू की तबीयत खराब हो गई। पास बैठी इंदिरा गांधी को एहसास हो गया। इंदिरा ने तुरंत नेहरू की खड़े होने में मदद की और लोगों के बीच से उन्हें छिपाते हुए ले गईं।
कांग्रेस और इंदिरा नेहरू की बीमारी छिपाने की पूरी कोशिश कर रहे थे। 7 जनवरी को आधिकारिक तौर पर बताया गया कि हाई ब्लड प्रेशर के कारण नेहरू की तबीयत बिगड़ी थी। लेकिन उन्हें स्ट्रोक हुआ था और मीडिया ने ली तस्वीरों से यह बात अब सभी को समझ आने लगी थी। स्ट्रोक की वजह से नेहरू के दाएं हिस्से पर असर पड़ा था।
स्ट्रोक के बाद नेहरू पहली बार 26 जनवरी को देश के सामने आए। उन्होंने गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लिया। लगातार होती फिजियोथेरेपी से अब वे चल-फिर पा रहे थे, लेकिन उनका शरीर का दायां हिस्सा अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था। फरवरी में हुए बजट सत्र के दौरान उन्होंने बैठकर ही भाषण दिया।
निधन से 2 महीने पहले: कश्मीर समस्या सुलझाने की आखिरी कोशिश की
भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन, नेहरू के अच्छे दोस्त थे। उन्होंने अप्रैल 1963 में नेहरू से कहा था, ‘उनकी प्रसिद्धि ने एक समय में दुनिया में भारत को प्रतिष्ठा दिलाई थी। लेकिन अब कश्मीर की समस्या न सुलझा पाने के चलते उनकी और भारत की छवि धूमिल हो रही है।‘
नेहरू ने अप्रैल 1964 में, 11 साल से जेल में बंद शेख अब्दुल्ला को रिहा करने का फैसला लिया। शेख अब्दुल्ला नेहरू के अच्छे दोस्त और नेशनल कॉन्फ्रेंस के फाउंडर थे।
विभाजन के समय अब्दुल्ला कश्मीर के भारत का हिस्सा बनने के पक्ष में थे। यहां तक की कश्मीर को आर्टिकल 370 के तहत स्पेशल स्टेसस देना भी नेहरू और अब्दुल्ला का ही विचार था। बाद में सरकार को अब्दुल्ला के भारत के प्रति समर्पण और पाकिस्तान से संबंध का शक होने लगा, जिसके चलते उन्हें 1953 में गिरफ्तार कर लिया गया। 8 अप्रैल 1964 को अब्दुल्ला जम्मू जेल से रिहा हुए।
8 अप्रैल को जम्मू स्पेशल जेल से रिहा होने के दौरान शेख अब्दुल्ला।
नेहरू के इस फैसले से विपक्ष के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी का भी एक धड़ा खुश नहीं था। अब्दुल्ला के नेहरू से दिल्ली मिलने आने के एक दिन पहले, जन संघ ने राजधानी में विशाल मार्च निकाला। इसमें अब्दुल्ला और नेहरू के खिलाफ नारे लगे। अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा, ‘नेहरू, शेख अब्दुल्ला को बता दें कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन चुका है। इसमें अब बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है।’
शेख अब्दुल्ला, नेहरू के तीन मूर्ति भवन में ही ठहरे। 29 अप्रैल को अब्दुल्ला नेहरू से मिले। प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से रामचंद्र गुहा, ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं, ‘दोनों ने गर्मजोशी से एक-दूसरे को गले लगाया। वे 11 साल बाद मिल रहे थे, लेकिन दोनों में कोई शर्मिंदगी नहीं थी। उन्होंने अपनी कड़वाहट मिटा दी थी।’
नेहरू और अब्दुल्ला के बीच कश्मीर का मुद्दा सुलझाने बातचीत और प्लानिंग हुई। 11 मई को अब्दुल्ला ने मीडिया से कहा था, ‘नेहरू भारत का प्रतीक हैं। मुझे उनके बाद इतनी शिद्दत से कश्मीर की समस्या सुलझाने की क्षमता किसी में दिखाई नहीं देती।’
22 मई की प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेहरू ने कश्मीर को लेकर उनके प्लान के बारे में कुछ भी बताने से मना कर दिया। दो दिन बाद 24 मई को अब्दुल्ला इस मुद्दे पर बात करने दो हफ्ते के लिए पाकिस्तान गए। उनकी बातचीत पूरी हो पाती इससे पहले ही नेहरू का निधन हो गया। कहा जाता है कि कश्मीर तनाव के बावजूद पाकिस्तान ने नेहरू के निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया और अपना झंडा आधा झुकाया था।
निधन से 5 दिन पहलेः नेहरू ने पत्रकारों से कहा- अभी मैं नहीं मरूंगा
नेहरू के पर्सनल सेक्रेटरी और करीबी रहे एम. ओ. मथाई अपनी किताब ‘रेमिनिसेंस ऑफ नेहरू एज’ में लिखते हैं, ‘मैं नेहरू से आखिरी बार 27 अप्रैल 1964 को मिला था। मैंने उन्हें कुछ नोट्स दिए। दो बार पढ़ने के बाद भी वे उन्हें समझ नहीं पाए। मैंने उन्हें बोला कि चिंता करने की जरूरत नहीं है। नेहरू उस समय कोई भी जरूरी काम करने की स्थिति में नहीं थे।’
भुवनेश्वर में आए स्ट्रोक के बाद नेहरू ने पहली बार 22 मई को प्रेस कॉन्फ्रेंस की। कुछ 38 मिनट चली कॉन्फ्रेंस में, आधे घंटे तक नेहरू ने मीडिया के सवालों के जवाब दिए। यह नेहरू की सबसे छोटी प्रेस कॉन्फ्रेंस थी।
पत्रकारों ने नेहरू से पूछा, ‘क्या आपको जीते जी ही अपना उत्तराधिकारी तय नहीं कर देना चाहिए?’ जवाब में नेहरू ने कहा, ‘मैं इतने जल्दी मरने नहीं वाला।’ यह सुनकर वहां मौजूद करीब 200 पत्रकारों की तालियों की आवाज से कमरा गूंज उठा।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद नेहरू देहरादून के लिए निकल गए। बीमारी में अपने पिता का ध्यान रखने इंदिरा भी उनके साथ गई।
निधन से 4 दिन पहलेः देहरादून गए, घंटों कपूर के पेड़ के नीचे गुमसुम बैठे रहते थे
23 मई को नेहरू देहरादून पहुंचे। वे घंटों गेस्ट हाउस में लगे कपूर के पेड़ के नीचे चुपचाप बैठे रहते। कभी सर्किट हाउस में घूमते या फिर घंटो सिर्फ उड़ते पक्षियों को देखते और उनकी आवाज सुनते बैठे रहते। वे कभी-कभी अपनी डायरी में कुछ लिख भी लिया करते।
देहरादून में इंदिरा गांधी के साथ बैठे पीएम नेहरू।
देहरादून में नेहरू सरकार में कैबिनेट मंत्री और आजादी के दौर से उनके साथी रहे, श्री प्रकाश भी रहते थे। 25 मई को नेहरू और इंदिरा उनके घर गए। तीनों ने साथ में दोपहर का खाना खाया, जिसके बाद इंदिरा और नेहरू सर्किट हाउस वापस लौट आए। थोड़ी देर बाद दोनों सहस्त्रधारा भी गए।
इस बार नेहरू का मन देहरादून में इस कदर रम गया था, कि वे वापस दिल्ली आना ही नहीं चाहते थे। नेहरू की देहरादून में ठहरने की इच्छा देखकर, वहां के डीएम ए.पी. दीक्षित ने जून तक देहरादून रूकने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा, ‘जरूरी फाइलें देहरादून ही मंगा लेंगे और काम यहीं से हो जाएगा।’ जवाब में नेहरू ने कहा, ‘हां काम तो सब हो जाएगा।’
अगले दिन 27 मई को नेहरू की दिल्ली में मीटिंग थी, जिससे पहले उन्हें कुछ फाइलों पर भी काम करना था। ऐसे में चाहते हुए भी नेहरू देहरादून नहीं रुक सकते थे। 26 मई की दोपहर को ही वे और इंदिरा, दिल्ली के लिए निकल गए। अधिकारियों, राजनेताओं और पत्रकारों के दल ने उन्हें विदाई दी। शाम तक दोनों अपने घर तीन मूर्ति भवन पहुंच गए।
नेहरू को देहरादून से विदाई दे रहे लोगों के समूह में पत्रकार और लेखक राज कंवर भी शामिल थी। वे कहते हैं, ‘लौटते हुए नेहरू ने हमें एक हल्की मुस्कान दी, जिसे देखकर मैं चौंक गया। मैंने पहली बार नेहरू को इतनी रूखी मुस्कान देते हुए देखा था।’
राज कंवर बताते हैं, ‘नेहरू ने अपना बायां हाथ उठाकर हमें अलविदा कहा। लेकिन ऐसा लग रहा था कि उन्हें हाथ उठाने में उन्हें काफी मेहनत लग रही है। उनका दायां हाथ ज्यादा सक्रिय नहीं था। वहीं उनका दायां पैर भी ठीक से उठ नहीं पा रहा था। शायद भुवनेश्वर में आए स्ट्रोक के चलते ऐसा हो रहा था।’
पत्रकार राज कंवर और उनकी बहन से मिलते पीएम नेहरू।
निधन से एक रात पहलेः देर तक जागते रहे, नींद की गोली खाई फिर भी सुबह 6 बजे उठ गए
26 मई की रात नेहरू और इंदिरा देहरादून से लौटे। सोने से पहले नेहरू ने कई फाइलें पूरी की। रात में उन्हें जब बहुत देर तक नींद नहीं आई तो नेहरू के सहयोगी नत्थू ने उन्हें नींद की दवा दी। इसके बावजूद अगली सुबह नेहरू 06:25 बजे उठ गए।
सुबह उठने के बाद से ही उनके शरीर में दर्द था, लेकिन नेहरू ने किसी को जगाकर इसके बारे में नहीं बताया। थोड़ी देर बाद नत्थू जागा और पूरे घर को नेहरू की तबीयत का पता चला। डॉक्टर को बुलाया गया। चेकअप में पता चला की नेहरू की बड़ी धमनी अरोटा डैमेज हो गई है।
कुछ देर बाद नेहरू बेहोश हो गए। डॉक्टर के मुताबिक वे कोमा में चले गए थे। इस नींद से नेहरू कभी नहीं उठे। दोपहर 01:44 बजे भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल को मृत घोषित कर दिया गया।
नेहरू की इच्छा थी कि उनकी अस्थियों का एक हिस्सा इलाहाबाद में गंगा नदी में बहाया जाए। बाकी की अस्थियां एयरफोर्स के हवाई जहाज से देश के अलग-अलग हिस्सों में बिखेर दी जाए जहां भारत के किसान मेहनत करते हैं।
एम. जे. अकबर की किताब, ‘नेहरू: द मेकिंग ऑफ इंडिया’ के मुताबिक, ’12 जून को इंदिरा गांधी ने एयरफोर्स अधिकारी की मदद से पहलगाम के ऊपर से नेहरू की जन्मभूमि कश्मीर और हिमालय में अस्थियां बिखेर दी।’
27 मई 1964 को पीएम नेहरू के शव के पास सिर धक कर खड़ी इंदिरा गांधी।
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18 मई 1974 की सुबह यानी आज से ठीक 51 साल पहले। प्रधानमंत्री आवास में सुबह से ही चहल-पहल थी। इंदिरा गांधी लोगों से मिल जरूर रही थीं, लेकिन अंदर से बेचैन थीं। उन्होंने करीब 8.30 बजे अपने सेक्रेटरी पीएन धर को आते देखा, तो लगभग दौड़ते हुए खुद ही उनके पास पहुंच गईं। इंदिरा ने पूछा- क्या हुआ… पूरी खबर पढ़िए
