साथियों आज, एक बार फिर से आप लोगों के सवालों का जवाब देने के लिए हम आपकी खिदमत में हाज़िर हो गए हैं। आप में से कई लोगों से एक अहम व ज़रूरी सवाल पूछा है कि ‘मुसलमान वंदे मातरम क्यों नहीं बोलते हैं’। ज़ाहिर है कि जिन लोगों ने ये सवाल किया है उनमें से ज़्यादातर बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक होंगे। तो चलिए जानते हैं कि मुस्लिम समुदाय में वंदे मातरम क्यों नहीं बोला जाता है।
1- वंदे मातरम् संस्कृत, बांग्ला भाषा में रचित ‘आनन्दमठ उपन्यास’ का एक हिस्सा है, जिसमें देवी दुर्गा को राष्ट्र के तौर पर पेश किया गया है और यह इस्लाम की बेसिक फिलॉस्फी के बिल्कुल ख़िलाफ़ है क्योंकि इस्लाम में मुसलमान गवाही देता है कि अल्लाह के सिवा कोई भी इबादत करने के काबिल नहीं है।
2- वहीं, वंदे मातरम् का मतलब होता है ‘माता की वन्दना करना’। मगर इस्लाम में सिर्फ एक ही ख़ुदा की इबादत करने की बात कही गई है। वहां किसी देवी-देवताओं का ज़िक्र नहीं है।
3- दरअसल, आज़ादी के लिए संघर्ष के दिनों में यह गीत हर तरफ़ तेज़ी फैल रहा था। वहीं, उस दौरान कुछ मुसलमानों को इस गीत से आपत्ति हुई क्योंकि इसमें मुसलमानों की बुहत खिल्ली उड़ाई गई थी।
इस विषय के अहम पहलू
1- मुसलमानों का भी मानना था कि ये गीत जिस “आनन्द मठ” उपन्यास से लिया गया, वह मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है। इन आपत्तियों को देखते हुए साल 1937 में कांग्रेस ने इस विवाद पर गहरा चिंतन किया व जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित हुई। जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे।
2- इस समिति ने पाया कि इस गीत के शुरुआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गये हैं, लेकिन बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं का ज़िक्र करते हैं। लिहाजा फैसला लिया गया कि इस गीत के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जाए।
3- सुप्रीम कोर्ट का फैसला – सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम संबंधी एक याचिका पर फैसला दिया था कि यदि कोई आदमी राष्ट्रगान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं तो इसका मतलब ये नहीं कि वो इसका अपमान कर रहा है। इसलिए इसे नहीं गाने के लिये उस व्यक्ति को दंडित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। चूंकि वंदे मातरम् इस देश का राष्ट्रगीत है अत: इसको ज़बरदस्ती गाने के लिये मजबूर करने पर भी यही कानून व नियम लागू होगा।
















