भगवान विष्णु की प्रिय माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए शरद पूर्णिमा की तिथि सबसे योग्य मानी गई है. ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण ने अश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन यमुना तट पर मुरली वादन करके गोपियों संग रास रचाया था जिसके फलस्वरूप इस दिन उपवास का विधान है. सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा को कौमुदी उत्सव कुमार उत्सव शरदोत्सव रास पूर्णिमा कोजागिरी पूर्णिमा एवं कमला पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है.
माता लक्ष्मी के विशेष पर्व के रूप में माने जाने वाली शरद पूर्णिमा मैं माता के आठ स्वरूप जिनमें धनलक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, राजलक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी ऐश्वर्या लक्ष्मी संतान लक्ष्मी कमला लक्ष्मी विजयलक्ष्मी के रूपों की पूजा अर्चना की जाती है कार्तिक स्नान के यम व्रत एवं नियम तथा दीपदान के बाद सुबह ब्रह्म मुहूर्त में माता लक्ष्मी एवं आदि आराध्य देवी देवता की पूजा अर्चना के बाद शरद पूर्णिमा के व्रत का संकल्प लेना विशेष फलदाई माना गया है.
वाराणसी के ख्याति प्राप्त ज्योतिषाचार्य विमल जैन बताते हैं कि ज्योतिष गणना के अनुसार पूरे वर्ष में अश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन ही चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त होता है. 16 कलाओं से युक्त चंद्रमा से निकली रोशनी समस्त रूपों वाली बताई गई है इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है जबकि रात्रि को दिखाई देने वाला चंद्रमा अपेक्षाकृत आम दिनों की अपेक्षा बड़ा होता है ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन भूलोक पर लक्ष्मी जी घर-घर वचन करती हैं जो जागता रहता है.
उस पर उनकी विशेष कृपा होती है. ज्योतिषाचार्य श्री जैन ने बताया कि शरद पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी को वस्त्र पुष्प धूप दीप गंध अक्षत तांबूल सुपारी ऋतु फल एवं विविध प्रकार के मिष्ठान दूध से बनी खीर जिसमें दूध चावल मिश्री मेवा शुद्ध देसी घी मिश्रित हो उसका नैवेद्य का भोग भी लगाया जाता है. ज्योतिषाचार्य श्री जैन बताते हैं कि रात्रि में शरद पूर्णिमा के दिन भगवती श्री लक्ष्मी की आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं इस दिन श्री लक्ष्मी सुक्तम श्री कनकधारा स्त्रोत श्री लक्ष्मी स्तुति श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने एवं लक्ष्मी जी के प्रिय मंत्र ओम श्री नमः का जप करना अत्यंत फलदाई माना गया है.
किसी व्यक्ति की मृत्यु शरद पूर्णिमा को होने को लेकर कोई धार्मिक मान्यता नहीं है पर शरद पूर्णिमा को रोगों के निदान का भी दिन माना गया है. बताते हैं कि आरोग्य लाभ के लिए शरद पूर्णिमा के दिन औषधीय गुण विद्यमान रहते हैं शरद पूर्णिमा की रात्रि मैं दूध से बनी खीर को चांदनी की रोशनी में अति स्वच्छ वस्त्र से ढक कर रखें. यह भी ध्यान रहे कि खीर के पात्र में चांदनी की रोशनी पढ़ना अति आवश्यक है सुबह के समय उस खीर का पान करने से शरीर के विभिन्न रोगों का नाश होता है और जीवन में सुख सौभाग्य वृद्धि होती है ऐसी सनातन धर्म में मानता है.
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