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‘4500 टका दिए, एजेंट ने भारत पहुंचा दिया’: बांग्लादेश से आए घुसपैठिए, पुलिस में सिपाही; SIR के बाद भी वोटर लिस्ट में नाम

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‘4500 टका दिए, एजेंट ने भारत पहुंचा दिया’:  बांग्लादेश से आए घुसपैठिए, पुलिस में सिपाही; SIR के बाद भी वोटर लिस्ट में नाम

‘4500 टका दिए, एजेंट ने भारत पहुंचा दिया’: बांग्लादेश से आए घुसपैठिए, पुलिस में सिपाही; SIR के बाद भी वोटर लिस्ट में नाम

दलाल के जरिए भारत आए। आधार कार्ड से लेकर वोटर आईडी तक बनवा ली। एक तो पश्चिम बंगाल पुलिस में सिपाही बन गया।

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ये कहानी उन बांग्लादेशियों की है, जो अवैध तरीके से भारत में घुसे हैं। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR में पश्चिम बंगाल से करीब 58 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने के लिए आइडेंटिफाई किए गए हैं।

लेकिन NEWS4SOCIALकी पड़ताल में खुलासा हुआ कि, बहुत से बांग्लादेशियों नाम अब भी वोटर लिस्ट में हैं। कई बांग्लादेशियों के पास दोनों देशों के पासपोर्ट और बाकी डॉक्युमेंट्स हैं।

जमीनी हकीकत जानने के लिए रिपोर्टर ने खुद को SIR में सुधार के लिए काम करने वाले एक संगठन का मेंबर बताकर पश्चिम बंगाल के नॉर्थ 24 परगना के पांच सब-डिविजनों में पड़ताल की।

इन पांच सब-डिविजनों में विधानसभा की 33 विधानसभा सीटें आती हैं। इन लोगों से हुई बातचीत हिडन कैमरे में रिकॉर्ड हुई। सिलसिलेवार तरीके से पढ़िए और देखिए पूरी रिपोर्ट…।

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केस : 1

4500 टका, नदी पार… SIR के बाद भी नाम बरकरार

किससे मिले : बिस्वजीत पॉल

जगह : नॉर्थ 24 परगना का हाबरा

बिस्वजीत पिछले साल अवैध तरीके से बॉर्डर पार कर बांग्लादेश से भारत आया। जमीन, मकान से लेकर आधार, पैन और पहचान पत्र तक बनवा लिए ।

रिपोर्टर और बिस्वजीत के बीच हुई बातचीत

रिपोर्टर : बांग्लादेश से कब आए

बिस्वजीत : शेख हसीना पर जब हमला हुआ था, उस समय

रिपोर्टर : कौन से बॉर्डर से आए

बिस्वजीत : गोजाडांगा से आए। पासपोर्ट नहीं है, इसलिए दलाल ने एंट्री करवाई

रिपोर्टर : दलाल ने कितने पैसे लिए

बिस्वजीत : 4 लोग आए थे, 4500 टका लिया

रिपोर्टर : क्या नदी पार करके आए

बिस्वजीत : हां, नाव से

रिपोर्टर : BSF ने रोका नहीं

बिस्वजीत : नहीं रात में आए

रिपोर्टर : यहां का आधार, पेनकार्ड, राशन कार्ड बनवा लिया

बिस्वजीत : हां, दलाल ने सब बनवा दिए

रिपोर्टर : SIR का फॉर्म भर दिया

बिस्वजीत : हां

नॉर्थ 24 परगना जिले में करीब 8 लाख बोगस वोटर्स के नाम काटे गए हैं। हमने इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर बिस्वाजित पाल का EPIC नंबर वेरिफाई किया, तो उसका वोटर आईडी एक्टिव दिखा। यानी SIR के बाद भी उसका नाम वोटर लिस्ट से नहीं हटाया गया। जबकि बिस्वाजित पाल ने खुद बताया कि, वह परिवार के साथ पिछले साल ही दलाल को पैसे देकर बॉर्डर पार कर भारत आया है।

केस : 2

बांग्लादेश का पासपोर्ट है, भारत के भी डॉक्युमेंट्स

किससे मिले : जॉय बाला

जगह : बनगांव का श्रीमंतपुरा–दुर्गापुर

श्रीमंतपुरा–दुर्गापुर इलाके में दो बांग्लादेशी भाई–बहन किराये के घर में रह रहे हैं। मौके पर पहुंचे NEWS4SOCIALरिपोर्टर की इनसे मुलाकात हुई।

रिपोर्टर : आपके पैरेंट्स बांग्लादेश में ही हैं

जॉय : हां

रिपोर्टर : भारत में कितने साल से हो

जॉय : 2014 में और बहन आए थे

रिपोर्टर : आधार और सारे डॉक्युमेंट्स बन गए

जॉय : हां

रिपोर्टर : बांग्लादेश का पासपोर्ट है

जॉय : हां (जॉय ने सभी डॉक्यूमेंट रिपोर्टर को दिखाए)

जॉय बाला नाम के इस बांग्लादेशी युवक ने भारतीय दस्तावेजों में अपने पिता का नाम तक दर्ज करवा लिया है, जबकि उसके पास बांग्लादेश का पासपोर्ट भी मौजूद है। हमने इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर जॉय बाला का वोटर आईडी नंबर खंगाला, तो उसका इलेक्शन कार्ड एक्टिव दिखा।

केस 3 :

किससे मिले : अखिल मुंडा

जगह : दुर्गापुर

पड़ताल के दौरान पता चला कि, एक और युवक 4–5 साल पहले बांग्लादेश से आया था। उसने दुर्गापुर गांव में रहते हुए पहले आधार कार्ड ‘उकील बिस्वास’ नाम से बनवाया, जिसमें बाप का नाम कालीपाड़ा बिस्वास था। जब वोटर कार्ड नहीं बन पाया, तो उसने गांव में अपनी पहचान के सहारे एक बुजुर्ग को पिता बताकर सभी दस्तावेज तैयार करवा लिए।

उस बुजुर्ग का सरनेम ‘मुंडा’ होने के कारण युवक ने नाम बदलकर ‘अखिल मुंडा’ कर लिया, जबकि उसके असली माता-पिता आज भी बांग्लादेश में रहते हैं। SIR की वजह से अखिल घर से गायब था। उसकी मुंहबोली भाभी से मुलाकात हुई।

रिपोर्टर : अखिल बिस्वास है या अखिल मुंडा

महिला : अखिल मुंडा

रिपोर्टर : बांग्लादेश से अखिल कब आया था

महिला : 5–6 साल हो गए

अखिल मुंडा का वोटर आईडी नंबर इलेक्शन कमीशन की आधिकारिक वेबसाइट पर वेरिफाई किया, तो अकील का वोटर कार्ड एक्टिव दिखा।

केस 4 :

किससे मिले : रतना पॉल

जगह : नॉर्थ 24 परगना का मसलंदपुर

उत्तर 24 परगना के मसलंदपुर इलाके में बांग्लादेश से अवैध तरीके से आया एक परिवार रह रहा है, जो कुछ साल पहले यहां आकर बस गया था। पता तलाशते हुए हम उस घर तक पहुंच गए, जहां वह परिवार रह रहा था। यहां परिवार की रतना पॉल से बात हुई।

रिपोर्टर : वोटर कार्ड–इलेक्शन कार्ड बन गया

रतना : हां, सब है

रिपोर्टर : कौन सी बॉर्डर से आए थे

रतना : गोजाडांगा बॉर्डर

रिपोर्टर : दलाल ने यहां लाने का कितना लिया

रतना : 10 हजार

इस लड़के ने जो बांग्लादेशी और भारतीय पासपोर्ट दिखाए, उनमें सुसांता पॉल उसके पिता है, और साथ बैठे बुजुर्ग नारायण पॉल को उसके दादा हैं। पासपोर्ट पर लगे वीजा से साफ होता है कि ये लोग कई बार भारत आए और फिर बांग्लादेश लौटे।

उस समय सुसांता पॉल घर पर मौजूद नहीं था, लेकिन उसकी पत्नी रतना पॉल ने बताया कि परिवार की महिलाएं और बच्चे दलालों के जरिए बॉर्डर पार कर भारत आए थे, जबकि बाकी लोग पासपोर्ट के जरिए आए।

रतना ने यह भी बताया कि उसका खुद का वोटर कार्ड अब तक नहीं बना है, हालांकि अन्य भारतीय दस्तावेज तैयार हो चुके हैं। वहीं, उसके पति सुसांता पॉल का वोटर कार्ड बन चुका है।

हमने सुसांता पॉल और उसके छोटे भाई की पत्नी रतना पॉल का EPIC नंबर इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर वेरिफाई किया।

जांच में सामने आया कि सुसांता पॉल का वोटर आईडी जहां एक्टिव दिख रहा है, वहीं रतना पॉल के EPIC नंबर पर “No Record Found” लिखा आया।

यानी SIR प्रक्रिया के बाद रतना पॉल का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया, जबकि सुसांता पॉल का नाम अब भी सूची में बना हुआ है।

केस 5 :

किससे मिले : रिंकू मंडल

जगह : बदूरिया

मसलंदपुर से कुछ ही दूरी पर बदूरिया इलाका है। यहां रिंकू मंडल नाम की एक महिला के बारे में जानकारी मिली, जो बांग्लादेशी नागरिक बताई जाती है और भारत आकर उसने सुब्रतो मंडल नाम के व्यक्ति से शादी कर ली। NEWS4SOCIALके पास उसके भारतीय पहचान पत्र और बांग्लादेश के जन्म प्रमाण पत्र की प्रतियां मौजूद हैं।

NEWS4SOCIALटीम जब दिए गए पते पर पहुंची, तो घर पर ताला लगा मिला। आसपास पूछताछ करने पर पता चला कि SIR शुरू होने के बाद से रिंकू मंडल और उसका पति सुब्रतो मंडल घर पर ताला लगाकर कहीं और रहने चले गए हैं।

हमने रिंकू मंडल का वोटर आईडी नंबर इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर वेरिफाई किया, तो यहां भी रिंकू मंडल का वोटर आईडी एक्टिव दिखा।

केस 6 :

किससे मिले : कलाल बाला की पत्नी

जगह : बनगांव का चूहाटी

हमारी अगली पड़ताल बनगांव के चूहाटी इलाके में हुई, जहां दो बांग्लादेशियों के बारे में जानकारी मिली, जो कुछ साल पहले आकर बस गए थे।

इनमें से एक कलाल बाला पश्चिम बंगाल पुलिस में काम करता है। दूसरा हृदय रॉय परिवार के साथ बांग्लादेश से आकर यहां किराए के मकान में रह रहा है।

कलाल बाला के घर पहुंचने पर हमारी मुलाकात उसकी पत्नी से हुई। उसने कहा कि कलाल बाला यहां नहीं, बल्कि कोलकाता में है।

कलाल बाला के बांग्लादेशी होने के सवाल पर महिला घबरा गई और SIR का नाम सुनते ही अंदर चली गई और दरवाजा फिर से बंद कर लिया।

यहां पर अधिकतर बांग्लादेशी रहते हैं…

फिर हम बगल में ही मौजूद हृदय रॉय के घर पहुंचे। हृदय यहां परिवार के साथ किराये पर रह रहा था। घर पर ताला मिला। घर के सामने बैठे मणिशंकर ने बताया कि, यहां पर अधिकतर बांग्लादेशी बसे हैं।

रिपोर्टर ने पूछा कि, कलाल बाला ने सातवीं की पढ़ाई बांग्लादेश से की है, ऐसे में उसे पश्चिम बंगाल पुलिस में कैसे नौकरी मिल गई।

इस पर मणिशंकर ने बताया कि, ‘वो तो DIB वेरीफिकेशन होकर ही मिली है। यह DIB भी इन्वाल्व होते है। दो–चार हजार में करवा देते हैं। सही DIB वेरीफिकेशन होता तो पुलिस में नहीं जा पाता।’

मणिशंकर ने बताया कि, ‘हृदय का वोटर आईडी कार्ड बन चुका है, और उसने सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट यानी CAA के तहत नागरिकता का आवेदन भी किया है।’

‘जब नागरिकता की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई तो वोटर आईडी कैसे बन गया। वहीं, कलाल बाला तो बंगाल पुलिस में नौकरी कर रहा है।’

पड़ताल में सामने आया कि अवैध तरीके से बॉर्डर पार कर आए बांग्लादेशियों ने न सिर्फ भारतीय पहचान से जुड़े दस्तावेज बनवा लिए, बल्कि मकान तक ले लिए और कुछ मामलों में सरकारी नौकरी भी हासिल कर ली। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के बाद भी इनके नाम वोटर लिस्ट से नहीं कटे।

हमारे पास कलाल बाला के बांग्लादेश में सातवीं तक पढ़ाई करने के प्रमाण पत्र हैं, वहीं हृदय रॉय और उसके परिवार का जन्म प्रमाण पत्र भी मौजूद है।

TMC चला रही रैकेट, ये बॉर्डर इकोनॉमी का पार्ट

इस मामले में बीजेपी प्रवक्ता तरुण ज्योति तिवारी कहते हैं कि, ‘ये इश्यू गवर्नमेंट को मालूम है। क्योंकि ये सब करने के लिए चार–छह हजार चार्जेस हैं।’

‘बांग्लादेश से कोई यहां आए तो सबसे पहले उसका बर्थ सर्टिफिकेट बनाया जाता है। फिर काउंसलर और पंचायत मेंबर का एक सर्टिफिकेट कि हां, वो यहां का रेजिडेंशियल है।’

‘फिर लाइसेंस, पैन कार्ड बनवाकर उससे वोटर आईडी बनवा लेते हैं। ये बॉर्डर इकॉनमी का पार्ट है। इसे टीएमसी चलवाती है।’

‘बीएसएफ किसी को पकड़ भी लेती है, तो फिर उसे पुलिस को हैंडओवर करती है। प्रोसीडिंग चलाने का पावर उनके पास नहीं है।’

‘बंगाल में 560 किलोमीटर बॉर्डर है, जहां फेंसिंग पॉसिबल नहीं हो पाई। हर एक मीटर में बीएसएफ का बंदा खड़ा रहे, ये पॉसिबल नहीं है। जहां फेंसिंग नहीं हुआ, वहीं से इधर–उधर का काम चलता है। ऑल आर इनवॉल्व्ड। लोकल पुलिस इनवॉल्व्ड है।’

कौन–कैसे घुस रहा है, पकड़ क्यों नहीं पा रहे

वहीं, टीएमसी के स्पोकपर्सन प्रदीप्तो मुखर्जी कहते हैं कि, ‘यहां फर्जी वोटिंग हो रही है तो फिर 2024 में बीजेपी के 12 सांसद कैसे जीत गए। 2019 में भी फर्जी वोटिंग हुई क्या।’

‘बॉर्डर डेवलपमेंट प्रोग्राम का अभी थर्ड फेज चल रहा है। उस थर्ड फेज में आप इतना पैसा डाल रहे हो, उसमें आप डिटेक्शन कैसे नहीं कर पा रहे हो कि कौन कैसे घुस पा रहा है?’

‘इंडिया में अगर घुस गया, वो केवल बंगाल में नहीं घुस रहा है, वो असम में भी घुस रहा है, वो त्रिपुरा में भी घुस रहा है, वो मेघालय में भी घुस रहा है, वो मिज़ोरम में भी घुस रहा है।’

अवैध प्रवासी का नाम जोड़ना कानून का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अभिषेक कृष्ण कहते हैं, ‘अगर किसी अवैध प्रवासी का नाम बिना वैध नागरिकता प्रमाण के वोटर लिस्ट में जोड़ा गया है, तो यह सीधा कानून का उल्लंघन है।’

‘ऐसे मामलों में रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 के तहत कार्रवाई का प्रावधान है, जिसमें जेल या जुर्माना दोनों हो सकते हैं।’

‘घर-घर जाकर सत्यापन करने की जिम्मेदारी निभाने वाले बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) ने कई जगहों पर ठीक से जांच नहीं की।’

‘इसके बाद असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO) ने उसी अधूरी और संदिग्ध जानकारी के आधार पर ड्राफ्ट वोटर लिस्ट को मंजूरी दे दी और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) ने बिना गहन पड़ताल के अंतिम आदेश जारी कर दिया।’

‘अगर जांच में यह साबित होता है कि इन अधिकारियों ने आपसी मिलीभगत से काम किया, तो उनके खिलाफ चुनाव कानूनों की भ्रष्टाचार संबंधी धाराएं और भारतीय न्याय संहिता के तहत जालसाजी व पद के दुरुपयोग के मामले दर्ज हो सकते हैं।’

कॉन्क्लूजन : पड़ताल से साफ है कि, करोड़ों रुपए खर्च कर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कराने के बावजूद कई अवैध बांग्लादेशियों के नाम वोटर लिस्ट से नहीं कटे, जो SIR की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सवाल ये भी है कि, इतनी आसानी से भारतीय दस्तावेज कैसे बन रहे हैं। क्या इसकी वजह सरकारी विभागों में फैला भ्रष्टाचार है, या फिर सिस्टम में मौजूद ऐसे लूपहोल हैं, जिनका फायदा उठाकर कुछ लोग ये दस्तावेज बनवा दे रहे हैं।

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