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160 करोड़ की बैंक धोखाधड़ी: ED के मुंबई-वडोदरा में छापे, 12 करोड़ के गहने और नकदी ज़ब्त

मुंबई की एक कंपनी द्वारा भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के साथ की गई 160.55 करोड़ रुपये की कथित लोन धोखाधड़ी के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के…

160 करोड़ की बैंक धोखाधड़ी: ED के मुंबई-वडोदरा में छापे, 12 करोड़ के गहने और नकदी ज़ब्त
(फोटो: IANS)

मुंबई की एक कंपनी द्वारा भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के साथ की गई 160.55 करोड़ रुपये की कथित लोन धोखाधड़ी के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार, ED ने 25 अगस्त को मुंबई और वडोदरा में सात ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। इस तलाशी अभियान में करोड़ों रुपये के गहने, नकदी और कई अहम दस्तावेज़ बरामद किए गए हैं।

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यह पूरा मामला मेसर्स बिलपावर लिमिटेड नाम की कंपनी से जुड़ा है, जो ट्रांसफॉर्मर लैमिनेशन और कोर बनाती थी। कंपनी का प्रबंधन राजेंद्र कुमार चौधरी, सुरेश कुमार चौधरी और नरेश कुमार चौधरी करते थे। ईडी ने यह जांच सीबीआई द्वारा दर्ज एक FIR के आधार पर शुरू की थी, जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शिकायत पर आधारित थी। सीबीआई इस मामले में 30 सितंबर 2024 को कंपनी और उसके निदेशकों के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल कर चुकी है।

कैसे हुई 160 करोड़ की धोखाधड़ी?

आरोपों के मुताबिक, बिलपावर लिमिटेड ने SBI से कैश क्रेडिट, वर्किंग कैपिटल लोन और कॉर्पोरेट लोन समेत कई तरह की बैंकिंग सुविधाएं ली थीं। बाद में कंपनी ने धोखाधड़ी से इस रकम को दूसरी जगहों पर भेज दिया और बैंक को गुमराह करने के लिए खातों में हेरफेर की। 18 अप्रैल 2012 को कंपनी का लोन अकाउंट नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) घोषित हो गया, जिस पर बैंक का 160.55 करोड़ रुपये का मूलधन बकाया था।

छापेमारी में क्या-क्या मिला?

ED के तलाशी अभियान के दौरान लगभग 43.90 लाख रुपये नकद और करीब 12.20 करोड़ रुपये मूल्य के सोने-चांदी के गहने जब्त किए गए हैं। इसके अलावा, दो बैंक खातों में जमा 27 लाख रुपये और तीन बैंक लॉकरों को भी फ्रीज कर दिया गया है। एजेंसी को छापेमारी के दौरान अचल संपत्ति, जमीन और मशीनरी से जुड़े दस्तावेज भी मिले हैं। साथ ही, अकाउंट बुक, लेजर और डिजिटल उपकरणों जैसे सबूतों को भी जब्त कर लिया गया है। ED ने बताया है कि मामले की आगे की जांच जारी है।

जांच में यह भी सामने आया है कि बैंक से मिले फंड को जाली दस्तावेजों के सहारे कुछ शेल (फर्जी) कंपनियों में भेजा गया था। इन कंपनियों का इस्तेमाल पैसों की हेराफेरी (राउंड-ट्रिपिंग) के लिए किया जाता था, जिसके बाद यह रकम चौधरी परिवार के सदस्यों या उनके सहयोगियों द्वारा नियंत्रित अन्य संस्थाओं में भेज दी जाती थी।

इनपुट: IANS

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News4Social क्राइम डेस्क

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