नंदितेश निलय का कॉलम: क्या सिस्टम को तकनीक से जोड़ने भर से सब ठीक हो जाएगा? h3>
डिजिटल माध्यमों पर भरोसा करती दुनिया में नीट की भविष्य की परीक्षाओं का (21 जून को होने जा रही परीक्षा का नहीं) कम्प्यूटराइज्ड होना शुभ संकेत है और साथ-साथ सिस्टम और जनता के संबंधों पर उस भरोसे का भी मरहम है, जो कमजोर पड़ता जा रहा है। लेकिन क्या सिस्टम को तकनीक से जोड़ने से सब ठीक हो जाएगा? क्या तकनीक भरोसे को बचा पाएगी? और फिर आइंदा लीक की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी? शायद हां, शायद नहीं! नीट परीक्षा को लेकर अभी भी कितने पैरेंट्स और परीक्षार्थी संशय की स्थिति में होंगे। नागरिकों के लिए यह जानना आसान नहीं होता है कि सरकार में उनके प्रतिनिधि क्या कर रहे हैं, हालांकि वे उनके काम-काज पर नजर बनाए रखते हैं। चुने हुए जनप्रतिनिधियों को तो वोट की मदद से पद से हटाया जा सकता है, लेकिन सरकारी कर्मचारी या सिविल सर्वेंट्स चुने हुए नहीं होते और इस तरह के नियंत्रण से सुरक्षित रहते हैं। तब नागरिकों को सरकारी एजेंसियों और उनके कर्मचारियों पर भरोसा रखना पड़ता है कि वे उनके हित में ही काम करेंगे। लेकिन यह सत्य है कि सिस्टम तो उनके भरोसे को बचा नहीं पा रहा है। पेपर लीक की घटना ने यह प्रश्न हम सभी के सामने रखा कि आखिर क्या किया जाए, जिससे यह दुबारा न हो? जब भी कोई ईमानदार व्यक्ति इस्तीफा देता है, तो शिकायत यही होती है कि व्यवस्था ईमानदारी का साथ नहीं देती और इसी वजह से व्यक्ति खुद को हमेशा अलग-थलग समझने लगता है, जबकि चारों ओर खामियां ही खामियां हैं। तो क्यों नहीं इस सिस्टम को समझा जाए और यह भी खंगाला जाए कि इस सिस्टम को और सुदृढ़ कैसे किया जा सकता है? इस संबंध में यह तर्क रहा है कि सरकारी अधिकारियों की सही भूमिका संरक्षक की होनी चाहिए, यानी एक प्रभावी और नैतिक प्रतिनिधि के तौर पर काम करके जनता का भरोसा जीतने की प्रशासक की इच्छा और उसकी क्षमता से लैस व्यक्तित्व। सिस्टम पर भरोसे को बचाए रखने के लिए सिर्फ एक कुशल और पेशेवर सिविल सर्वेंट होना ही नहीं काफी है, बल्कि न्याय और परोपकार के नैतिक मानदंडों से प्रेरित भी जरूरी है। हाल में यूपीएससी ने अपनी पीटी परीक्षा में ऐसे प्रश्न पूछे, जो मेन्स में पूछे जाने वाले एथिक्स के पेपर जैसे थे। मानो पहले ही चरण में यूपीएससी अपने परीक्षार्थियों के नैतिक निर्णय लेने की क्षमता को परखना चाह रहा था। क्योंकि सिस्टम उन नैतिक निर्णयों से ही उस भरोसे को बनाए रख पाता है, जो लोकतंत्र का आधार है। तो क्या 21 जून को होने वाली नीट और अन्य परीक्षाएं त्रुटिरहित हो पाएंगी और किसी भी तरह के लीक से सुरक्षित रहेंगी? क्या सिस्टम भरोसे को कायम रख पाएगा? क्या भविष्य की कम्प्यूटराइज्ड परीक्षा सिस्टम के नायकों की साख को और पारदर्शी बनाएगी? इसका उत्तर तो समय के ही पास है। लेकिन यह तो निश्चित है कि सबकुछ संरक्षित करना, उस भरोसे को जीवित रखना अब इतना आसान नहीं होगा। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जिन समाजों में आपसी विश्वास कम होता है, वहां नैतिक मूल्य साझा नहीं किए जाते और इसलिए नैतिक सहमति का अभाव होता है। ऐसे समाजों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू लोगों के सामाजिक-राजनीतिक विश्वास में लगातार आ रही गिरावट है। यदि राजनीति खुशी और एकता का माहौल बनाए, राजनीति को सेवा के एक माध्यम के रूप में परिभाषित किया जाए और सिस्टम नैतिकता को बढ़ावा दे तो भरोसा एक बिल्कुल ही पारदर्शी रंग में नजर आएगा। सिस्टम में भरोसे को फिर से स्थापित करने के लिए तकनीक का तो सहारा लेना ही पड़ेगा, साथ ही व्यवस्था को चलाने वाले नायकों को भी उस ईमानदारी या सत्यनिष्ठा को अपनाना होगा, जिससे वे खुद को नैतिक दुविधा से बाहर निकाल सकें। नीट की कम्प्यूटराइज्ड माध्यम से होने वाली परीक्षा और यूपीएससी की पीटी परीक्षा में नैतिक प्रक्रिया से जुड़े प्रश्न उस भरोसे को नि:संदेह मजबूत बनाएंगे। नैतिकता का लोकेशन परिधि में नहीं बल्कि केंद्र में होता है और सिस्टम इसी के गुरुत्व से चलता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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