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धारकुंडी आश्रम के संस्थापक स्वामी सच्चिदानंद ब्रह्मलीन: मुंबई में ली अंतिम सांस, चित्रकूट में दी जाएगी समाधि – Chitrakoot News

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धारकुंडी आश्रम के संस्थापक स्वामी सच्चिदानंद ब्रह्मलीन:  मुंबई में ली अंतिम सांस, चित्रकूट में दी जाएगी समाधि – Chitrakoot News

धारकुंडी आश्रम के संस्थापक स्वामी सच्चिदानंद ब्रह्मलीन: मुंबई में ली अंतिम सांस, चित्रकूट में दी जाएगी समाधि – Chitrakoot News


चित्रकूट: यूपी-एमपी सीमा पर स्थित धारकुंडी आश्रम के संस्थापक महंत स्वामी परमहंस सच्चिदानंद महाराज शनिवार को ब्रह्मलीन हो गए। वे 102 वर्ष के थे और उन्होंने मुंबई के बदलापुर आश्रम में अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना मिलते ही देशभर में फैले लाखों भक्तों में शोक की लहर दौड़ गई। धारकुंडी आश्रम के प्रमुख संत और महंत के शिष्य स्वामी संजय बाबा ने बताया कि स्वामी परमहंस सच्चिदानंद महाराज पिछले कई महीनों से मुंबई स्थित आश्रम में प्रवास कर रहे थे। उन्होंने हाल ही में 1 जनवरी को चित्रकूट स्थित धारकुंडी आश्रम में भक्तों के बीच अपना 102वां जन्मदिवस भी मनाया था। इसके बाद स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें इलाज के लिए मुंबई ले जाया गया था। स्वास्थ्य में कुछ सुधार होने के बाद वे बदलापुर आश्रम में रह रहे थे, जहां शनिवार को उनका निधन हो गया। स्वामी जी समय-समय पर आश्रम आने वाले श्रद्धालुओं को वर्चुअल दर्शन और प्रवचन भी देते रहते थे। रविवार शाम 3 बजे उनका पार्थिव शरीर भक्तों के अंतिम दर्शन के लिए धारकुंडी आश्रम पहुंचा। पहले पार्थिव शरीर को एयरबस से लाने की योजना थी, लेकिन बदलापुर आश्रम के लगभग 400 भक्तों के साथ होने के कारण एयरबस सेवा स्थगित कर दी गई। इसके बाद विशेष वाहन से सड़क मार्ग द्वारा पार्थिव शरीर धारकुंडी लाया गया, जहां भक्तों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। रविवार को आश्रम में अंतिम दर्शन के बाद सोमवार को आश्रम की परंपरा के अनुसार उन्हें समाधि दी जाएगी। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए स्वामी अड़गड़ानंद महाराज विशेष विमान से धारकुंडी पहुंचे हैं। चित्रकूट सहित आसपास के क्षेत्रों से कई साधु, संत और महंत भी आश्रम पहुंच चुके हैं। सुरक्षा के मद्देनजर यूपी-एमपी बॉर्डर पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। चित्रकूट प्रभारी एसपी सत्यपाल सिंह और सतना एसपी हंसराज सिंह स्वयं सुरक्षा व्यवस्था की कमान संभाले हुए हैं। धारकुंडी आश्रम घने जंगलों के बीच बसा एक शांत और प्राकृतिक स्थल है, जो साधना और तपस्या के लिए उपयुक्त माना जाता है। स्वामी परमहंस सच्चिदानंद महाराज ने 22 नवंबर 1956 को अपने गुरुदेव ब्रह्मलीन स्वामी परमानंद के आशीर्वाद से इस आश्रम की स्थापना की थी और वे आजीवन यहीं रहे। मान्यता है कि उस दौर में जब इस पिछड़े क्षेत्र में बिजली की सुविधा नहीं थी, तब स्वामी जी ने आश्रम में निरंतर बहने वाले स्वच्छ जल से बिजली उत्पादन कर उसका प्रयोग कराया था। आश्रम क्षेत्र में स्थित दो झरनों का पानी सालभर बहता है, जो आगे चलकर नदी का रूप ले लेता है। यह भी कहा जाता है कि स्थापना काल से लेकर 1970 तक कई बार शेर भी आश्रम में आते-जाते थे और स्वामी जी के सान्निध्य में रहते थे।स्वामी परमहंस सच्चिदानंद महाराज का जीवन त्याग, तप और साधना का प्रतीक रहा। उनके ब्रह्मलीन होने से साधु-संत समाज के साथ-साथ लाखों श्रद्धालुओं ने एक महान आध्यात्मिक मार्गदर्शक को खो दिया है।

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