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दिल्ली की इस हवा में सांस लेना खतरनाक, इन 5 सवालों से समझें क्यों साइलेंट किलर है प्रदूषण

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दिल्ली की इस हवा में सांस लेना खतरनाक, इन 5 सवालों से समझें क्यों साइलेंट किलर है प्रदूषण

दिल्ली की इस हवा में सांस लेना खतरनाक, इन 5 सवालों से समझें क्यों साइलेंट किलर है प्रदूषण

नई दिल्ली: दिल्लीवालों की सांसों में प्रदूषण के रूप में घुल रहे जहर के बीच एम्स के पूर्व डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के सौमित्र घोष को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि प्रदूषण एक ऐसा ‘साइलेंट किलर’ है, जो बुनियादी बीमारियों को और बिगाड़ रहा है। उन्होंने प्रदूषण नियंत्रण को लेकर नीतियों की नाकामी के पीछे इसे तैयार करने की दोषपूर्ण प्रक्रिया को जिम्मेदार ठहराया। गौरतलब है, डॉ. गुलेरिया एम्स में पल्मोनरी मेडिसिन और स्लीप डिसऑर्डर विभाग के हेड हैं। डॉ. रणदीप गुलेरिया से हुई बातचीत के मुख्य अंश:

सवाल 1: दिल्ली में वायु प्रदूषण के संकट ने हमारी जिंदगी को किस तरह प्रभावित किया है?

जवाब: हमलोग दो चीजें देख रहे हैं। पहला- बच्चों और बुजुर्गों पर तत्काल पड़ने वाला प्रभाव, जिससे उनके अस्पताल आने की फ्रीक्वेंसी बढ़ गई है। इसके अलावा, मैं ऐसे लोगों को जानता हूं जो इस वक्त दिल्ली छोड़कर देश के अन्य हिस्सों में चले जाते हैं, जैसे कि साउथ इंडिया की तरफ क्योंकि वहां हवा की गुणवत्ता बेहतर है। आंकड़े बताते हैं कि साल के इस दौरान हार्ट अटैक के मामले बढ़ जाते हैं क्योंकि पीएम 2.5 और अन्य बेहद सूक्ष्म पार्टिकुलेट मैटर के कारण रक्त वाहिकाओं (ब्लड वेसल्स) में सूजन आ जाती है।

​सवाल 2: आप इस गंभीर वायु प्रदूषण के दूरगामी परिणाम क्या देखते हैं?

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जवाब:हमारे अध्ययनों से पता चलता है कि अगर कोविड के एक साल को छोड़ दिया जाए तो एक्यूआई खराब, बेहद खराब या गंभीर श्रेणी में ही रहता है। इसलिए देश के उत्तर मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग लगातार ऐसी हवा में सांस ले रहे हैं, जो उनके पूरे स्वास्थ्य पर असर डालना शुरू करता है। यहां पर हार्ट अटैक और सांस की क्रॉनिक बीमारियों की आशंका ज्यादा है। वहीं, यह बच्चों में लंग्स (फेफड़ों) के विकास को कुंद कर देता है। फेफड़ों का विकास 20 साल की उम्र तक होता है, लेकिन अगर आप खराब हवा में सांस लेते रहें तो इससे फेफड़ों की क्षमता उतनी नहीं रह जाती, जितनी होनी चाहिए। स्टडीज से पता चला है कि दिल्ली के बच्चों की फेफड़ों की क्षमता साउथ इंडिया के बच्चों की तुलना में कम हो गई है। ऐसी स्टडीज हैं जो कहती हैं कि दिल्ली में रहने से दिल की बीमारियों और हाई कोलेस्ट्रॉल का खतरा है। पहले प्रदूषण के असर का फोकस सिर्फ हार्ट और लंग्स पर था, लेकिन अब यह भी साबित हो चुका है कि प्रदूषण के पार्टिकल्स हमारे खून में मिलकर शरीर के दूसरे अंगों में भी पहुंच जाते हैं जिससे स्ट्रोक, डिमेंशिया समेत अन्य बीमारियां होती हैं।

​सवाल 3: तो, क्या हम उस स्टेज पर पहुंच गए हैं जहां हम प्रदूषण का संबंध सीधे तौर पर मौतों से जोड़ सकते हैं?

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जवाब: वायु प्रदूषण एक ‘साइलेंट किलर’ है… मौतों के दूसरे फैक्टर्स का तो हम परीक्षण कर सकते हैं, मगर प्रदूषण का नहीं। प्रदूषण प्रमुख बीमारियों की स्थिति को और खराब कर देता है। अगर आपको पहले से श्वसन तंत्र से जुड़ी दिक्कत है और आप प्रदूषण का शिकार होते हैं, तो सांसों से जुड़ी समस्या और गहरा सकती है। यह लंग्स कैंसर और हार्ट अटैक का भी कारण बन सकता है, लेकिन इनके बीच संबंध के परीक्षण की जरूरत है।

​सवाल 4: पिछले तमाम वर्षों से प्रदूषण की समस्या के हल के लिए नीतियों और उपायों के बारे में काफी कुछ कहा गया है, लेकिन अब तक इसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आया है। आपके हिसाब से ये नीतियां सफल क्यों नहीं हुईं?

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जवाब: हमें सभी हितधारकों को साथ लेने की जरूरत है। हमें टारगेट तय कर रणनीति बनानी होगी कि लोगों की क्या चिंताएं हैं। दूसरा, स्थायी समाधान पर काम किया जाना चाहिए जिसमें सभी सेक्टरों का ध्यान रखना होगा और उत्तर भारत के मैदानी इलाकों के मुद्दों को भी समझना होगा। यह एक लैंडलॉक (भूमिबंद) इलाका है, इसलिए जब भी वायु प्रदूषण गंभीर होता है तो स्मॉग ग्राउंड लेवल पर आकर स्थिर हो जाता है। तटीय क्षेत्रों के उलट इस क्षेत्र में मौसम पर काफी कुछ निर्भर करता है, इसलिए हमें इस पर मुखरता के साथ काम करना होगा। इसके अलावा, योजनाओं का फॉलोअप जरूरी है ताकि एक योजना काम ना करे तो हम वैकल्पिक रास्ते तलाशें।

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​सवाल 5: प्रदूषण नियंत्रण के लिए दिल्ली सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर आपके क्या विचार हैं, जैसे- स्मॉग टावर्स, पानी का छिड़काव, गाड़ियों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाना वगैरह?

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जवाब: ये उपाय कितने प्रभावी हैं, इसका पता लगाने के लिए हमें आंकड़ों की आवश्यकता है, क्योंकि हो सकता है कि इनमें से कुछ असरदायक ना हों। चाहे तात्कालिक समाधान हो या फिर दीर्घकालिक… इसका विश्लेषण होना चाहिए कि ये काम कर रहे हैं नहीं और क्या ये टिकाऊ और कम खर्चीले हैं? उसके बाद ही इन्हें लागू किया जाना चाहिए, अन्यथा दूसरे विकल्पों को आजमाना चाहिए।

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