गया केंद्रीय कारा के नामकरण की मांग: लोग बोले- शहीद बैकुंठ शुक्ल के नाम पर रखा जाए, 14 मई 1934 को अंग्रेजो ने दी थी फांसी – Gaya News h3>
गया केंद्रीय कारा का नाम शहीद बैकुंठ शुक्ल के नाम पर रखने की मांग की गई है। गुरुवार को शुक्ल के 92वें बलिदान दिवस पर शहर में विशाल पदयात्रा निकाली गई। पदयात्रा में सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के पदाधिकारी, कार्यकर्ताओं के साथ-साथ शहर के आम लोग भी शामिल हुए। लोगों ने शहीद बैकुंठ शुक्ल के सम्मान में संकल्प सभा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत पदयात्रा की शुरुआत गया केंद्रीय कारा से हुई। यहां से रामपुर थाना, गया कॉलेज, अनुग्रहपुरी कॉलोनी, आशा सिंह मोड़ और चाणक्यपुरी स्थित बैकुंठ शुक्ल नगर होते हुए यात्रा शहीद बैकुंठ शुक्ल पार्क पहुंची। पार्क में यह पदयात्रा संकल्प सभा में बदल गई। इस दौरान पूरे रास्ते “शहीद बैकुंठ शुक्ल अमर रहें”, “जब तक सूरज-चांद रहेगा, बैकुंठ शुक्ल का नाम रहेगा” जैसे नारों से माहौल गूंजता रहा। सभा में वक्ताओं ने कहा कि गया केंद्रीय कारा के वार्ड नंबर 15 में आज भी वह कमरा मौजूद है, जहां शहीद बैकुंठ शुक्ल को रखा गया था। उस कमरे की नियमित साफ-सफाई होती है, लेकिन आज तक राज्य सरकार ने गया केंद्रीय कारा का नाम उनके नाम पर नहीं किया। वक्ताओं ने सवाल उठाया कि जब मुजफ्फरपुर और भागलपुर केंद्रीय कारा का नाम वहां शहीद हुए क्रांतिकारियों के नाम पर हो सकता है, तो गया केंद्रीय कारा का नाम शहीद बैकुंठ शुक्ल केंद्रीय कारा क्यों नहीं हो सकता। ऐसा नहीं किया जाना महान सपूत शहीद वैकुंठ शुक्ल की सीधे तौर पर अनदेखी है। बैकुंठ शुक्ल पार्क में शहीद की आदमकद कांस्य प्रतिमा लगाने की मांग लोगों ने बैकुंठ शुक्ल पार्क में उनकी आदमकद कांस्य प्रतिमा स्थापित कराने के संकल्प को भी दोहराया। साथ ही आम लोगों से हर सम्भव सहयोग की अपील की गई। नेताओं ने राज्य सरकार से गया केंद्रीय कारा का नामकरण शहीद बैकुंठ शुक्ल के नाम पर करने और उनकी जीवनी को बिहार के पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग उठाई। जानिए, कौन थे अमर वीर शहीद बैकुंठ शुक्ल बैकुंठ शुक्ल वही वीर सपूत थे जिन्होंने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिलाने में अंग्रेजों का साथ देने वाले गद्दार फनीन्द्र नाथ घोष को मौत के घाट उतार दिया था। इस बात से तिलमिलाई अंग्रेजी हुकूमत ने 14 मई 1934 को गया केंद्रीय कारा में उन्हें फांसी दे दी थी। बैकुंठ शुक्ल का जन्म 1907 में पुराने मुजफ्फरपुर (वर्तमान वैशाली) जिले के जलालपुर ग्राम के एक किसान परिवार में हुआ था। गांव में ही प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पड़ोस के मथुरापुर गांव के प्राथमिक स्कूल में शिक्षक बनकर समाज को सुधारना शुरू किया। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय सहयोग दिया और पटना के कैम्प जेल गए। गांधी-इर्विन समझौता के बाद रिहा हुए। जेल प्रवास के दौरान वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के संपर्क में आए और क्रांतिकारी बने। 1931 में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षडयंत्र कांड में सजा के एलान ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। फणीन्द्र नाथ घोष, जो खुद रेवोल्यूशनरी पार्टी का सदस्य था, अंग्रेजी हुकूमत के दबाव और लालच में आकर वादामाफ़ गवाह बन गया और उसकी गवाही पर तीनों वीर क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई। घोष को विश्वासघात की सजा देने का बीड़ा बैकुंठ शुक्ल ने उठाया और 9 नवंबर 1932 को घोष को मारकर इसे पूरा किया। इसके बाद उन्हें कैद कर मुकदमा चलाया गया और 14 मई 1934 को मात्र 28 वर्ष की उम्र में उन्हें गया सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई।
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