एन. रघुरामन का कॉलम: आपका जीवन संवारने वाले शिक्षक के प्रति आभार कैसे जताएं? h3>
कर्नाटक में बेंगलुरु से 335 किलोमीटर दूर हावेरी जिले में हैंगल एक कस्बा और तालुक मुख्यालय है। धर्मा नदी के बाएं किनारे बसी इस जगह बैठकर कोई घंटों तक शांति से प्रकृति को निहार सकता है। लेकिन इस साल 30 मई को यह शांत कस्बा अचानक पूरी तरह बदला हुआ दिखा। माहौल में एक अलग ही ऊर्जा थी, खासकर कुमारेश्वर हाई स्कूल में। इंजीनियर, डॉक्टर, आंत्रप्रेन्योर और कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव जैसे एक हजार से अधिक लोग अपने पुराने खेल मैदान में इकट्ठा हुए थे। वे हंस रहे थे, गले मिल रहे थे और भावुकता में आंसू भी पोंछ रहे थे। वे अलग-अलग शहरों से लौटकर वहीं आ गए थे, जहां से उनका जीवन शुरू हुआ था। वे सब वहां उस व्यक्ति के रिटायरमेंट का जश्न मनाने एकत्रित हुए थे, जिसने उन्हें सब कुछ दिया। यह थे उनके शिक्षक सी.एस. वस्त्रद। आमतौर पर शिक्षक शायद ही कभी सुर्खियां बनते हैं, खासकर छोटे कस्बों के, जब तक कि वे ‘एसआईआर’ से न जुड़े हों। वे अपने उतने-से वेतन में ही चुपचाप काम करते रहते हैं, जितने में शायद उनके परिवार का गुजारा भी बमुश्किल हो पाता है। फिर भी वे दिन-प्रतिदिन, साल-दर-साल अपनी इसी सीमित आय से दूसरे लोगों के बच्चों के सपनों को भी सहारा देते हैं। वे अपनी जेब से अतिरिक्त किताबें खरीदते हैं, मुफ्त में पढ़ाने के लिए अपनी छुट्टियां कुर्बान करते हैं और कई बार चुपचाप उन छात्रों की फीस भी भरते हैं, जिन्हें अन्यथा ड्रॉप-आउट होना पड़ता। वस्त्रद भी इसी तरह के भविष्य निर्माता थे। दशकों तक कड़ा अनुशासन और विद्यार्थियों के प्रति गहरा लगाव ही उनके जीवन की पहचान रहा। उस विशाल भीड़ में उनके एक स्टूडेंट नवीन हुलिहल्ली भी थे। आज नवीन बेंगलुरु में एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत सफल पेशेवर हैं। लेकिन कॉर्पोरेट जगत तक पहुंचने का उनका सफर बेहद कठिनाइयों से भरा था। जब नवीन छोटे थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। एक पल में उनका परिवार बेहद गरीबी में आ गया और शिक्षा का सपना तो लगभग खत्म हो गया। उनकी दुखी मां के लिए स्कूल फीस, यूनिफॉर्म और किताबों का खर्च उठाना संभव नहीं था। तब वस्त्रद ने एक अभिभावक की भूमिका निभाई। एक हाई स्कूल शिक्षक की सीमित आय में ही उन्होंने नवीन की पढ़ाई का खर्च उठाने का फैसला किया। वे सिर्फ आर्थिक मदद पर ही नहीं रुके। उन्होंने स्कूल की छुट्टियां भी छोड़ दीं और नवीन समेत अन्य संघर्षरत स्टूडेंट्स के लिए एक्स्ट्रा क्लासेज लगाईं, ताकि वे पढ़ाई में ना पिछड़ें। नवीन के लिए वस्त्रद सिर्फ ब्लैकबोर्ड पर पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं रहे, बल्कि एक सरोगेट पैरेंट जैसे बन गए। उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन तक उनका मार्गदर्शन और सहयोग किया। उन्होंने सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं दिया, बल्कि स्टूडेंट्स को यह भी सिखाया कि दुनिया में आगे कैसे बढ़ना है और शून्य से शुरू होकर कैसे भविष्य बनाना है। जब विदाई समारोह अपने चरम पर पहुंचा तो दर्शकों में उत्साह की लहर दौड़ गई। एक नई, रिबन में लिपटी मारुति सुजुकी स्विफ्ट मंच पर लाई गई। नवीन चले, चाबी हाथ में ली और अपने पुराने मेंटर की तरफ मुड़े। स्थानीय आध्यात्मिक नेताओं, ट्रस्ट पदाधिकारियों और अपने एक हजार सहपाठियों की मौजूदगी में उन्होंने पूरी श्रद्धा के साथ वह कार अपने शिक्षक को भेंट की। यह जीवनभर के उस ऋण के प्रति आभार की एक शानदार और ठोस निशानी थी, जिसे शायद पूरी तरह कभी नहीं चुकाया जा सकता। इसने साबित किया कि शिक्षक जो बीज बोते हैं, वे हमेशा फल देते हैं। भावुकता से भरे वस्त्रद ने लड़खड़ाती जुबान में वहां मौजूद लोगों से कहा कि ‘मैंने बस अपना कर्तव्य निभाया।’ उनके लिए तो एक हजार सफल और ईमानदार लोगों को वहां एक साथ देखना ही सबसे बड़ा पुरस्कार था। फंडा यह है कि शिक्षकों को सम्मानित करने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम कभी न भूलें उन्होंने बेहद सीमित साधनों में रहकर हमारे भविष्य को गढ़ा। अपनी जरूरतों से ज्यादा हमारी तरक्की को प्राथमिकता दी। रिटायरमेंट के बाद के उनके “गोल्डन ईयर्स’ में उनका साथ दीजिए। उनकी सीख को आगे बढ़ाते हुए दूसरों का जीवनस्तर भी ऊपर उठाइए, जैसे कभी उन्होंने हमारा उठाया था।
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