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आरती जेरथ का कॉलम: एक राजनीतिक दोराहे पर आकर खड़े हो गए हैं थरूर

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आरती जेरथ का कॉलम:  एक राजनीतिक दोराहे पर आकर खड़े हो गए हैं थरूर

आरती जेरथ का कॉलम: एक राजनीतिक दोराहे पर आकर खड़े हो गए हैं थरूर

6 घंटे पहले

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आरती जेरथ राजनीतिक टिप्पणीकार

त्रिवेंद्रम के नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा की चौंकाने वाली जीत शायद कांग्रेस के असंतुष्ट नेता शशि थरूर की हालिया बेचैन कोशिशों की वजह को बताती है। उन्हें संभवतः आभास हो गया था कि हवा बदल रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में वे त्रिवेंद्रम सीट पर बेहद मामूली अंतर से जीते थे। इससे पूर्व लगातार तीन चुनावों में बड़ी जीत दर्ज करने के बाद पिछले साल वे भाजपा उम्मीदवार राजीव चंद्रशेखरन को केवल 12,600 वोटों से हरा सके थे।

यह जीत भी थरूर को इसलिए मिली थी, क्योंकि शहर की सीमाओं के बाहर तटीय इलाकों में रहने वाले गरीब मछुआरों ने एकजुट होकर उनके पक्ष में मतदान किया था। इन नतीजों ने त्रिवेंद्रम में भाजपा की एंट्री की जमीन तैयार कर दी है, जो पिछले 45 वर्षों से वाम दलों का गढ़ रहा है। शहर के 101 वार्डों में से भाजपा ने 50 पर जीत हासिल की- पूर्ण बहुमत से सिर्फ एक सीट कम।

हालांकि, भाजपा की यह जीत शशि थरूर के लिए खुशी की वजह बनने की संभावना कम ही है। उलटे, आने वाले महीनों में स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में वे खुद को हाशिए पर पा सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र में अपने उच्च पद से इस्तीफा देने के बाद जिस कांग्रेस ने उनके राजनीतिक करियर को गढ़ा और संवारा, उसी के खिलाफ उनके बयानों, हाल के महीनों में प्रधानमंत्री की खुलकर की गई प्रशंसा और फिर पुतिन के सम्मान में राष्ट्रपति भवन में आयोजित भोज में शामिल होने ने उन्हें अपनी ही पार्टी में अविश्वसनीय बना दिया है। अ

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ब जब उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा का सितारा उभार पर है, तो क्या थरूर यह उम्मीद कर सकते हैं कि पिछले कई महीनों से भाजपा से मेलजोल बढ़ाने का उन्हें कोई राजनीतिक लाभ मिलेगा? त्रिवेंद्रम में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए थरूर को चंद्रशेखरन जैसी मजबूत शख्सियत से मुकाबला करना पड़ेगा।

नगरीय निकाय चुनावों में पार्टी के चौंकाने वाले प्रदर्शन को भाजपा में चंद्रशेखरन की बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। थरूर के अपनी ही पार्टी के खिलाफ खुले विद्रोह ने भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया है, जबकि त्रिवेंद्रम में बढ़ते वाम-विरोधी माहौल का स्वाभाविक लाभ कांग्रेस को ही मिलना था। कांग्रेस वहां तीसरे स्थान पर रही, जबकि वाम दलों ने मुख्य विपक्षी दल की भूमिका बनाए रखी।

चंद्रशेखरन पिछले कुछ वर्षों से इस संसदीय क्षेत्र को साध रहे हैं, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का टिकट हासिल कर सकें। उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है, जबकि थरूर की बड़ी पूंजी भाषाई ज्ञान और वाकपटुता भर है।

देखना दिलचस्प होगा कि थरूर भाजपा का टिकट पाते हैं या उसकी आंतरिक राजनीति के शिकार बन जाते हैं। वास्तव में, थरूर अब एक दोराहे पर खड़े हैं। केरल में 2026 की शुरुआत में चुनाव होंगे, जब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम में भी चुनाव होंगे। जहां कभी थरूर को केरल में कांग्रेस की एक बड़ी ताकत माना जाता था, वहीं स्थानीय चुनावों ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि राज्य में उनकी प्रासंगिकता अब पहले जैसी नहीं रही। व्यावहारिक रूप से कांग्रेस ने थरूर के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। और यही उनके सामने बड़ी दुविधा खड़ी करता है।

अगर थरूर कांग्रेस में हलचल मचाने के काम नहीं आ सकते, तो क्या भाजपा के लिए भी वे उपयोगी रह पाएंगे? इसमें संदेह नहीं कि पिछले कई महीनों से भाजपा कांग्रेस को असहज करने के लिए ही थरूर का फायदा उठाती रही है। थरूर के हर बयान या लेख से पार्टी में खलबली मचती थी। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद सरकार के अंतरराष्ट्रीय जनसंपर्क अभियान के तहत जब उन्हें एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सौंपा गया, तो कांग्रेस को सार्वजनिक रूप से असहज होना पड़ा था।

थरूर से अपने कड़वे अनुभवों के चलते पार्टी ने यह सबक सीखा है कि सबसे बेहतर रणनीति उन्हें नजरअंदाज करना है। ऐसे में थरूर के पास एक ही रास्ता बचता है- कांग्रेस से खुद को निष्कासित करवाने की कोशिश करना, ताकि उनकी लोकसभा सीट सुरक्षित रह सके।

अगर उन्हें पार्टी से निकाला जाता है तो वे निर्दलीय सांसद बन जाएंगे; लेकिन अगर वे स्वयं इस्तीफा देते हैं, तो उनकी सीट चली जाएगी। कांग्रेस तो फिलहाल उनके उकसावे में आकर उन्हें निष्कासित करने के मूड में नहीं दिखती। ऐसे में यह देखना बाकी है कि क्या भाजपा त्रिवेंद्रम में हालात को परखने के लिए थरूर को इस्तीफा देने के लिए प्रेरित करती है और लोकसभा उपचुनाव कराने की दिशा में कदम बढ़ाती है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भाजपा चंद्रशेखरन की जगह थरूर को टिकट देगी।

  • अगर थरूर को कांग्रेस पार्टी से निकाला जाता है तो वे निर्दलीय सांसद बन जाएंगे; लेकिन अगर वे स्वयं इस्तीफा देते हैं, तो उनकी सीट चली जाएगी। कांग्रेस तो फिलहाल उनके उकसावे में आकर उन्हें निष्कासित करने के मूड में नहीं दिखती।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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