क्यों वीर क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के शव को दो बार जलाया गया?

1659

भारत को आज़ादी दिलाने में शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का एक बहुत बड़ा योगदान था। आपने देश को अग्रेजो की गुलामी के चुंगुल से बचाने के लिए ये मतवाले देश के ख़ातिर आपने जान का बलिदान दे दिया, देश के यह सपूत फांसी के फंदे पर लटक गए।आज देश का हर एक नौजवान भगत सिंह को अपनी प्रेरणा मानता है। शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के क्रांतिकारी किस्सों से इतिहास में अपना नाम दर्ज करा गए लेकिन क्या आप जानते है शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शवों को एक बार नहीं बल्कि दो बार जलाया गया था। जी हां सही सुना आपने इसके पीछे का विशेष कारण यह था की देश इनके जजज़्बे और देश के प्रति इनकी प्रेम को सम्मान देना था।

इन क्रांतिकारियों को मारना अंग्रेज़ों के लिए इतना आसान नहीं था इसलिए इनको धोखे से मारा गया था। बताया जाता है कि अंग्रेज़ों ने जनता के विद्रोह के डर से फांसी की मुक़र्रर तारीख़ से एक दिन पहले 23 मार्च, 1931 को ही भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी थी। भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी देने के बाद अंग्रेज़ों ने काफी बेहरहमी से उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर सतलज नदी के किनारे स्थित हुसैनीवाला नामक जगह पर ले जाकर इनके शवों को बेहद अपमानजनक तरीके से जलाने की कोशिश की थी। जब देशवासियों को इस बारे में सूचना मिली तो उसी समय वहां हज़ारों की संख्या में लोग इकट्ठा हो गए। इस भीड़ में लाल लाजपत राय की बेटी पार्वती और भगतसिंह की बहन बीबी अमर कौर भी मौजूद थीं।

इतनी तादाद में लोगो को आते देख अंग्रेज़ वहां से भाग निकले। फिर लोगों ने जलती हुई आग से उनके शवों को बाहर निकाला। इसके बाद देशवासियों ने इन वीर सपूतों का अंतिम संस्कार लाहौर स्थित रावी नदी के किनारे करने का निर्णय लिया। आपको बताना चाहेंगे की 24 मार्च की शाम भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के सम्मान में लाखों लोगों द्वारा लाहौर स्थित रावी नदी के तट तक शव यात्रा निकाली गई।

ये भी पढ़े- किन-किन देशों में भारतीय सैनिक शांति सेना के रूप में तैनात है?

इसके बाद लाखों लोगों के समक्ष ही इन क्रांतिकारियों को पूरे सम्मान सहित अंतिम संस्कार किया गया। आज भी देशवासी के आँखों में आपने इन वीर क्रांतिकारियों को याद कर आँसू भर आते है और हर माँ आपने बेटे के रूप में इन वीर सपूतोँ की कमाना करते है जिन्होंने देश के लिए एंटनी कम उम्र में अपनी जान न्योछावर कर दी लेकिन देश का मान कम नहीं होने दिया।