स्वच्छता को मानवीय गरिमा और सामाजिक समानता से जोड़ने वाले बिंदेश्वर पाठक की कहानी सिर्फ़ शौचालय बनाने की नहीं, बल्कि समाज की उस गहरी सोच को बदलने की है जो सदियों से चली आ…
बिहार के वैशाली ज़िले में जन्मे पाठक ने समाजशास्त्र की पढ़ाई के बाद जब गांधी शताब्दी समिति के साथ काम करना शुरू किया, तो उनका सामना समाज की एक कड़वी सच्चाई से हुआ। उन्हों…
एक बचपन की घटना और बाद में बेतिया में हुआ एक अनुभव, जहाँ एक युवक को 'अछूत' होने के कारण मदद नहीं मिली, उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। महात्मा गांधी के विचारों से प…
यह रास्ता आसान नहीं था। आर्थिक तंगी के चलते बिंदेश्वर पाठक को अपनी ज़मीन और पत्नी के गहने तक बेचने पड़े। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 1973 में आरा नगरपालिका से मिले महज़…
बिंदेश्वर पाठक का मिशन शौचालय बनाने से कहीं आगे का था। उन्होंने सफ़ाईकर्मियों के पुनर्वास, उनके बच्चों की शिक्षा और कौशल विकास पर ज़ोर दिया ताकि आने वाली पीढ़ी को इस पेशे…
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