शिवसेना किसकी? सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल की दलील- चुनाव आयोग ने 2018 के संविधान को नज़रअंदाज़ किया
शिवसेना के नाम और उसके चुनाव चिह्न 'तीर-कमान' पर अधिकार को लेकर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। बुधवार को हुई इस सुनवाई में उद्धव ठाकरे गुट की ओर…
शिवसेना के नाम और उसके चुनाव चिह्न 'तीर-कमान' पर अधिकार को लेकर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। बुधवार को हुई इस सुनवाई में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें पेश करते हुए चुनाव आयोग (ECI) के अधिकार क्षेत्र पर गंभीर सवाल उठाए। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, सिब्बल ने आरोप लगाया कि आयोग ने शिंदे गुट को फायदा पहुँचाने के लिए पार्टी के 2018 के संविधान को जानबूझकर नजरअंदाज किया। मामले पर सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।
चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल
सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष दलील दी कि चुनाव आयोग ने यह मान लिया कि उनके पास पार्टी का नवीनतम संविधान नहीं है, जबकि ऐसा करना उनके लिए सुविधाजनक था। उन्होंने कहा, "ECI का कहना है कि सभी उप-नेता मनोनीत हैं, लेकिन वे निर्वाचित हैं। ECI दस्तावेजों को देखता तक नहीं है।" उन्होंने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का हवाला देते हुए कहा कि पार्टी में पदाधिकारियों या पते जैसे किसी भी बदलाव की सूचना आयोग को देना अनिवार्य है, और उनके गुट ने यह कर्तव्य निभाया था। सिब्बल ने कहा कि 2018 में पार्टी की सामान्य सभा में 12 उप-नेता मनोनीत और 21 निर्वाचित हुए थे, जिसका दस्तावेज़ 4 अप्रैल की तारीख का है और उस पर आयोग की मुहर भी है।
'क्षेत्राधिकार था या नहीं?' - अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि मूल प्रश्न यह है कि चुनाव आयोग के पास इस मामले में हस्तक्षेप करने का अधिकार क्षेत्र था भी या नहीं। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, "अगर इन सभी बातों पर ध्यान दिया जाए तो यह कहना सही नहीं है कि इलेक्शन कमीशन के पास अधिकार क्षेत्र नहीं था। उसका तरीका गलत हो सकता है।" जस्टिस बागची ने कहा कि यदि आयोग के पास क्षेत्राधिकार था और उसका गलत इस्तेमाल हुआ, तो यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन अगर क्षेत्राधिकार ही नहीं था, तो आगे कुछ भी नहीं जांचा जा सकता।
सिब्बल की प्रमुख दलीलें
कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि 19 जुलाई को जब आयोग ने प्रक्रिया शुरू की, तो उसके पास केवल दो दस्तावेज थे- एक विधायकों की संख्या से जुड़ा और दूसरा एक बैठक से। उन्होंने सवाल उठाया कि आयोग ने किस आधार पर फैसला किया? उन्होंने कहा, "एक बार जब आप चीफ मिनिस्टर बन जाते हैं तो जाहिर है, लोग आपके पास आएंगे। उस जमीनी हकीकत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।" सिब्बल ने यह भी कहा कि शिंदे गुट ने 'पक्ष प्रमुख' के पद को मनमाने ढंग से बदल दिया, जबकि पार्टी संविधान के अनुसार यह पद चुनाव से ही भरा जाता है। उन्होंने आरोप लगाया, "ECI एक विशेष निष्कर्ष पर पहुंचना चाहता था, इसलिए उसने 2018 के संविधान को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने पहले ही नतीजा तय कर लिया था।"
इनपुट: IANS



