साहिब सिंह वर्मा: प्याज की महंगाई और एक विवादित बयान ने कैसे पलटी दिल्ली के CM की किस्मत
"गरीब आदमी किसी हालत में प्याज नहीं खाता" — यह महज़ एक वाक्य था, लेकिन दिल्ली की राजनीति में इसने वह तूफ़ान खड़ा किया जिसने एक मुख्यमंत्री की कुर्सी ही उलट दी। यह कहानी है दिल्ली के चौथे मुख्यमंत्री स
"गरीब आदमी किसी हालत में प्याज नहीं खाता" — यह महज़ एक वाक्य था, लेकिन दिल्ली की राजनीति में इसने वह तूफ़ान खड़ा किया जिसने एक मुख्यमंत्री की कुर्सी ही उलट दी। यह कहानी है दिल्ली के चौथे मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा की — एक किसान परिवार के बेटे की, जो आरएसएस कार्यकर्ता से देश की राजधानी का सर्वोच्च प्रशासनिक पद तक पहुँचे, पर एक प्रेस वार्ता में कही बात उनके राजनीतिक सफ़र का सबसे महँगा पड़ाव बन गई।
मुंडका के किसान परिवार से दिल्ली की सत्ता तक
IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 मार्च 1943 को दिल्ली के मुंडका गाँव में एक जाट किसान परिवार में जन्मे साहिब सिंह वर्मा ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। कहा जाता है कि वहाँ एक प्रोफेसर की सलाह पर ही उन्होंने अपने नाम के साथ 'वर्मा' जोड़ा। पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली लौटे और म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की लाइब्रेरी में नौकरी की।
इसी दौर में दूध-जलेबी के लिए मशहूर एक मिठाई की दुकान पर उनकी मुलाकात अटल बिहारी वाजपेयी समेत जनसंघ के कई वरिष्ठ नेताओं से हुई। उनके विचारों ने वर्मा को प्रेरित किया और वे पहले आरएसएस, फिर भाजपा की राह पर चल पड़े। जनता पार्टी के टिकट पर दिल्ली नगर निगम पहुँचे, 1983 में भाजपा के बैनर तले फिर निर्वाचित हुए और 1993 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद दिल्ली सरकार में शिक्षा व विकास मंत्री बनाए गए।
जैन हवाला कांड ने खोला मुख्यमंत्री पद का दरवाज़ा
1996 में साहिब सिंह वर्मा के करियर में निर्णायक मोड़ आया। जैन हवाला मामले में फँसे मदन लाल खुराना को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा। भाजपा विधायक दल ने विचार-विमर्श के बाद साहिब सिंह वर्मा को अपना नेता चुना और इस तरह वे दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। ढाई साल से भी अधिक समय तक वे इस पद पर रहे।
लेकिन उनका यह कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहा। वजीराबाद स्कूल बस हादसा, उपहार सिनेमाघर की त्रासदी और मिलावटी सरसों के तेल से फैली 'ड्रॉप्सी' बीमारी के गंभीर प्रकोप ने उनकी सरकार की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़े किए। इस खाद्य मिलावट संकट और स्वास्थ्य आपातकाल से निपटने के तरीके को लेकर उन्हें काफ़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।
प्याज की आँच और वह बयान जो भारी पड़ा
विधानसभा चुनावों से महज़ पचास दिन पहले, अक्टूबर 1998 में दिल्ली की जनता प्याज की आसमान छूती कीमतों से बेहाल थी। विपक्षी कांग्रेस को बिना किसी विशेष प्रयास के एक धारदार हथियार मिल चुका था। 12 अक्टूबर 1998 को मुख्यमंत्री आवास के बाहर भारी भीड़ जुटी, नारेबाज़ी हो रही थी और माहौल तनावपूर्ण था।
इससे कुछ समय पहले एक प्रेस वार्ता में वर्मा के मुँह से निकला था — "गरीब आदमी किसी हालत में प्याज नहीं खाता।" अगले दिन अखबारों ने इस टिप्पणी को सुर्खियाँ बना दिया। कहा जाता है कि इस बयान ने पहले से भड़के आक्रोश में घी का काम किया। नतीजा यह हुआ कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ और राजनीतिक दबाव के बीच साहिब सिंह वर्मा एक सरकारी डीटीसी बस में सवार होकर मुख्यमंत्री आवास से निकले — और इसी के साथ उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल समाप्त हो गया। उनके इस्तीफ़े के बाद सुषमा स्वराज को दिल्ली की बागडोर सौंपी गई।
30 जून 2007: एक दुखद अंत
दिल्ली की राजनीति के लिए 30 जून 2007 का दिन गहरे शोक का दिन बन गया। जयपुर-दिल्ली हाईवे पर शाहजहाँपुर के पास साहिब सिंह वर्मा की कार एक ट्रक से टकरा गई और इस सड़क हादसे में उनका निधन हो गया। एक ऐसे नेता का सफ़र थम गया, जिसने एक लाइब्रेरी कर्मचारी से दिल्ली के मुख्यमंत्री तक का लंबा रास्ता तय किया था।
इनपुट: IANS



