पराली दहन: दिल्ली की हवा में 'ज़हर' और खेत की मिट्टी को दोहरा नुकसान
हर साल अक्टूबर की शुरुआत के साथ ही दिल्ली-एनसीआर की हवा में प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है, जिसका एक बड़ा कारण पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना माना जाता है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट…
हर साल अक्टूबर की शुरुआत के साथ ही दिल्ली-एनसीआर की हवा में प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है, जिसका एक बड़ा कारण पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना माना जाता है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार और NGT की सख़्ती के बावजूद पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में धान की कटाई के बाद पराली जलाने की घटनाएं जारी हैं। यह न केवल वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, बल्कि खेतों की उर्वरा शक्ति को भी भारी क्षति पहुँचाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सर्दियों के मौसम में अकेले दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान 40 प्रतिशत तक हो सकता है। इससे निकलने वाले सूक्ष्म कण हवा में घुलकर स्मॉग बनाते हैं, जो सांस की बीमारियों, आंखों में जलन और हृदय संबंधी समस्याओं का कारण बनते हैं।
मिट्टी की सेहत पर सीधा असर
पराली जलाने का नुकसान सिर्फ़ वायु प्रदूषण तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार, एक टन पराली जलाने से खेत को कई ज़रूरी पोषक तत्वों का नुक़सान होता है। इसमें लगभग 400 किलो कार्बन, 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 2.5 किलो पोटाश और 1.2 किलो सल्फर जलकर नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही, आग की गर्मी से मिट्टी में मौजूद किसान-मित्र सूक्ष्मजीव भी खत्म हो जाते हैं, जो ज़मीन को उपजाऊ बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
क्या हैं पराली प्रबंधन के विकल्प?
किसानों के लिए पराली जलाने के कई बेहतर और क़ानूनी विकल्प मौजूद हैं। पराली को पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, क्योंकि इसमें अच्छी मात्रा में फाइबर और प्रोटीन होता है। इसके अलावा, रोटावेटर, हैप्पी सीडर और पैडी स्ट्रॉ रीपर जैसी मशीनों की मदद से इसे खेत में ही मिलाया जा सकता है, जो जैविक खाद का काम करती है। बायो-डीकंपोजर और कम्पोस्टिंग के ज़रिए भी इसे खाद में बदला जा सकता है। शोध बताते हैं कि पराली में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश के साथ-साथ जिंक, आयरन और मैंगनीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी होते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाते हैं।
आंकड़े और कानूनी प्रावधान
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के एक बुलेटिन के मुताबिक, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच सात राज्यों में फसल अवशेष जलाने की 287 घटनाएं दर्ज की गईं। यह जानना महत्वपूर्ण है कि पराली जलाना एक कानूनन अपराध है और ऐसा करने पर जुर्माने के साथ-साथ कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान है।
इनपुट: IANS



