भारत देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब उच्च न्यायालय के जजों ने सीधे तौर पर मीडिया के ज़रिये जनता को संबोधित किया हो. जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगाई, जस्टिस मदन भीमराव और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने प्रेस कांफ्रेंस करके चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की कार्यप्रणाली से असहमति जतायी. उन्होंने कहा “हम लोग कुछ खास मांगों को लेकर चीफ जस्टिस से मिले थे, लेकिन दुर्भाग्यवश हम यह साबित करने में असफल रहे कि हम सही हैं. ऐसा करना ज़रूरी था ताकि इस संस्थान (सुप्रीम कोर्ट) की अहमियत बरकरार रखी जा सके.”
इस प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को लिखी एक चिट्ठी का भी ज़िक्र किया था. अब वो चिट्ठी मीडिया के सामने आ गयी है.
ये हैं चिट्ठी की मुख्य बातें
चरों जजों ने देश की सबसे बड़ी अदालत के कामकाज को लेकर चीफ जस्टिस को चिट्ठी भेजी थी. चिट्ठी में लिखा था
- इस कोर्ट ने कई ऐसे न्यायिक आदेश पारित किए हैं, जिनसे चीफ जस्टिस के कामकाज पर असर पड़ा, लेकिन जस्टिस डिलिवरी सिस्टम और हाई कोर्ट की स्वतंत्रता बुरी तरह प्रभावित हुई है.
- सिद्धांत यही है कि चीफ जस्टिस के पास रोस्टर बनाने का अधिकार है. वह तय करते हैं कि कौन सा केस इस कोर्ट में कौन देखेगा. यह विशेषाधिकार इसलिए है, ताकि सुप्रीम कोर्ट का कामकाज सुचारू रूप से चल सके, लेकिन इससे चीफ जस्टिस को उनके साथी जजों पर कानूनी, तथ्यात्मक और उच्चाधिकार नहीं मिल जाता. इस देश के न्यायशास्त्र में यह स्पष्ट है कि चीफ जस्टिस अन्य जजों में पहले हैं, बाकियों से ज्यादा या कम नहीं.
- चीफ जस्टिस उस परंपरा से बाहर जा रहे हैं, जिसके तहत महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय सामूहिक तौर पर लिए जाते रहे हैं.
- वे महत्वपूर्ण मामले, जो सुप्रीम कोर्ट की अखंडता को प्रभावित करते हैं, चीफ जस्टिस उन्हें बिना किसी वाजिब कारण के उन बेंचों को सौंप देते हैं, जो चीफ जस्टिस की प्रेफेरेंस (पसंद) की हैं.
- चीफ जस्टिस केसों के बंटवारे में नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं.
- सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने उतराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसफ और सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त करने की सिफारिश भेजी है.
- जस्टिस केएम जोसफ ने ही हाईकोर्ट में रहते हुए 21 अप्रैल, 2016 को उतराखंड में हरीश रावत की सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले को रद्द किया था, जबकि इंदु मल्होत्रा सुप्रीम कोर्ट में सीधे जज बनने वाली पहली महिला जज होंगी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल जस्टिस आर भानुमति के बाद वह दूसरी महिला जज होंगी.
- सुप्रीम कोर्ट में तय 31 पदों में से फिलहाल 25 जज हैं, यानी जजों के 6 पद खाली हैं.
जजों ने कहा अपनी मर्जी चलाते हैं चीफ जस्टिस
चिट्ठी में लिखा है कि ऐसे भी कई मामले हैं, जिनका देश के लिए खासा महत्व है. लेकिन, चीफ जस्टिस ने उन मामलों को तार्किक आधार पर देने की बजाय अपनी पसंद वाली बेंचों को सौंप दिया. इसे तुरंत रोके जाने की जरूरत है. जजों ने लिखा कि यहां हम मामलों का जिक्र इसलिए नहीं कर रहे हैं, ताकि संस्थान की प्रतिष्ठा को चोट न पहुंचे. लेकिन इस वजह से न्यायपालिका की छवि को नुकसान हो चुका है.
वरिष्ठ वकीलों ने कहा इस क़दम से न्यायपालिका को नुकसान
इस मामले पर वरिष्ठ वकील उज्जवल निकम ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “जजों का ये कदम न्यायपालिका के लिए काला दिन है. जजों को अपनी शिकायतों रखने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस के अलावा कोई और रास्ता अपनाना चाहिए था. अब इस क़दम के बाद देश का आम आदमी कोर्ट के हर फैसले पर सवाल उठा सकता है.”
बीजेपी नेता और वरिष्ठ वकील सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा, “जजों ने बहुत ही गंभीर मुद्दा उठाया है. ये चारों ही जज काफी ईमानदार हैं और उनकी नियत पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में दखल देना चाहिए.”
पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद ने जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “ये काफी दुखद और दर्दनाक है. देश की सर्वोच्च अदालत का ये हाल हो गया है कि वहां के जजों को मीडिया में आकर अपनी बात कहनी पड़ रही है.”
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की राय में “ये बहुत गंभीर मामले है, जिसने चीफ जस्टिस को कटघरे में खड़ा कर दिया है. चीफ जस्टिस अपनी सत्ता का दुरुपयोग कर रहे हैं और इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करना अभूतपूर्व कदम है.”

