अमेरिका: H-1B वीज़ा और ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया में बड़े बदलाव का प्रस्ताव, भारतीय पेशेवरों पर पड़ सकता है असर
अमेरिका में काम करने वाले हज़ारों भारतीय तकनीकी पेशेवरों के लिए भविष्य में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। एक शीर्ष रिपब्लिकन सीनेटर ने श्रम विभाग से उस प्रक्रिया में बड़े बदलाव करने की मांग की है, जो H-1B…
अमेरिका में काम करने वाले हज़ारों भारतीय तकनीकी पेशेवरों के लिए भविष्य में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। एक शीर्ष रिपब्लिकन सीनेटर ने श्रम विभाग से उस प्रक्रिया में बड़े बदलाव करने की मांग की है, जो H-1B वीज़ा धारकों के लिए ग्रीन कार्ड यानी स्थायी निवास का पहला कदम होती है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, अगर ये प्रस्ताव लागू होते हैं तो नियोक्ताओं के लिए विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखना और उनके लिए ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया शुरू करना पहले से ज़्यादा जटिल हो सकता है।
मिसौरी से रिपब्लिकन सीनेटर एरिक श्मिट ने कार्यवाहक श्रम सचिव कीथ सॉन्डलिंग को एक पत्र लिखकर 'प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक समीक्षा प्रबंधन' (PERM) प्रक्रिया को आधुनिक बनाने का आग्रह किया है। यह वही प्रक्रिया है जिसका इस्तेमाल कंपनियां किसी विदेशी कर्मचारी को स्थायी नौकरी देने के लिए ग्रीन कार्ड दिलाने की शुरुआत के तौर पर करती हैं। श्मिट का आरोप है कि मौजूदा नियमों का दुरुपयोग करके कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की जगह सस्ते विदेशी श्रमिकों को नौकरी पर रख रही हैं।
क्या हैं प्रस्तावित बदलाव?
सीनेटर श्मिट ने अपने पत्र में सीधे तौर पर H-1B या ग्रीन कार्ड नियमों में बदलाव का उल्लेख नहीं किया है, न ही उन्होंने भारत का नाम लिया है। इसके बजाय, उन्होंने श्रम विभाग से PERM से जुड़े नियमों को फिर से लिखने की मांग की है। उनके प्रमुख प्रस्तावों में शामिल है:
- भर्ती प्रक्रिया के नियमों को आधुनिक बनाना, क्योंकि मौजूदा नियम 20 साल से भी ज़्यादा पुराने हैं।
- नियोक्ताओं के लिए हर अमेरिकी आवेदक का रिकॉर्ड रखना और उसे अस्वीकार करने का कारण बताना अनिवार्य करना।
- यह प्रमाणित करना कि पद विशेष रूप से विदेशी कर्मचारी के लिए पहले से तय नहीं था।
- ऑडिट, संदिग्ध धोखाधड़ी और PERM आवेदकों द्वारा पहले इस्तेमाल किए गए OPT और H-1B वीज़ा का डेटा सार्वजनिक करना।
अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में स्वीकृत कुल H-1B याचिकाओं में से 70 प्रतिशत भारतीय नागरिकों की थीं।
अमेरिकी कर्मचारियों की सुरक्षा पर ज़ोर
एरिक श्मिट का तर्क है कि पुराने नियम, जैसे अखबारों में विज्ञापन देना, आज के ऑनलाइन ज़माने में अप्रासंगिक हो गए हैं। उनका कहना है कि इसकी वजह से नियोक्ता आसानी से यह दिखा देते हैं कि उन्होंने स्थानीय स्तर पर भर्ती की कोशिश की, जबकि असल में वे नौकरियां अमेरिकी नागरिकों से छिपी रह जाती हैं।
उन्होंने कहा, "मौजूदा नियम अमेरिकी आवेदकों पर सिर्फ़ खानापूर्ति करने की इजाजत देते हैं। विभाग को इसे एक ऐसे सिस्टम से बदलना चाहिए जहां बेरोजगार अमेरिकियों को नौकरी के लिए असली मौका मिले।" प्रस्ताव के अनुसार, कंपनियों को हाल ही में नौकरी गंवा चुके योग्य अमेरिकियों को सूचित करना होगा, उनका इंटरव्यू लेना होगा और उन्हें न चुनने की लिखित वजह भी देनी होगी।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भर्ती से जुड़े दस्तावेज़ों की प्रक्रिया सख्त होती है तो नियोक्ताओं पर अनुपालन का बोझ बढ़ेगा और ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में जांच भी कड़ी हो जाएगी। इससे पहले से ही जटिल मानी जाने वाली स्पॉन्सरशिप प्रक्रिया और भी लंबी हो सकती है। हालांकि, इसका अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि श्रम विभाग सीनेटर श्मिट के प्रस्तावों को किस हद तक अपनाता है।
इनपुट: IANS



