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हेपेटाइटिस बी के इलाज में बड़ी कामयाबी: नई दवा 'हिबसागो' को अमेरिकी FDA की मंजूरी, रोज़ाना की दवा से मिल सकती है मुक्ति

हेपेटाइटिस बी के लाखों मरीजों के लिए एक उम्मीद की किरण जगी है, जो वायरस को नियंत्रित करने के लिए जीवन भर एंटीवायरल दवाओं पर निर्भर रहते हैं। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने क्रोनिक…

हेपेटाइटिस बी के इलाज में बड़ी कामयाबी: नई दवा 'हिबसागो' को अमेरिकी FDA की मंजूरी, रोज़ाना की दवा से मिल सकती है मुक्ति
(फोटो: IANS)

हेपेटाइटिस बी के लाखों मरीजों के लिए एक उम्मीद की किरण जगी है, जो वायरस को नियंत्रित करने के लिए जीवन भर एंटीवायरल दवाओं पर निर्भर रहते हैं। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने क्रोनिक हेपेटाइटिस बी के लिए एक नई इंजेक्टेबल दवा 'हिबसागो' (बेपिरोविरसेन) को मंजूरी दे दी है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, जीएसके (GSK) द्वारा विकसित यह दवा कुछ मरीजों को अपनी रोज़ाना की एंटीवायरल थेरेपी बंद करने और फिर भी वायरस को नियंत्रण में रखने में सक्षम बना सकती है।

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यह मंजूरी मंगलवार को घोषित की गई और यह उन वयस्क मरीजों के लिए है जिन्हें सिरोसिस (लिवर का गंभीर रोग) नहीं है। एफडीए के मुताबिक, यह हेपेटाइटिस बी के लिए स्वीकृत पहला 'एंटीसेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड' श्रेणी का इलाज है। यह एक उन्नत तकनीक है जो सीधे वायरस के उन जेनेटिक निर्देशों को बाधित करती है, जिनका उपयोग वह अपनी संख्या बढ़ाने और प्रोटीन बनाने के लिए करता है।

कैसे काम करती है और किसे मिलेगा लाभ?

इस दवा को उन मरीजों के लिए अधिकृत किया गया है जो कम से कम छह महीने से एंटीवायरल थेरेपी ले रहे हैं और जिनके खून में वायरस का स्तर पहले से ही दबा हुआ (कम) है। इसके अलावा, एक डायग्नोस्टिक टेस्ट के ज़रिए यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मरीज़ के 'हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन' का स्तर 3,000 इंटरनेशनल यूनिट प्रति मिलीलीटर या उससे कम हो।

एफडीए के 'ऑफिस ऑफ इंफेक्शियस डिसीज' की कार्यवाहक निदेशक वेंडी कार्टर ने कहा, "हिबसागो इलाज का एक नया तरीका पेश करता है, जिससे कुछ मरीज क्रोनिक एचबीवी का पूरा इलाज खत्म होने के बाद भी वायरस को नियंत्रित रख सकते हैं। यह मंजूरी इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रगति है।"

परीक्षणों के नतीजे और सुरक्षा संबंधी चिंताएं

इस दवा का मूल्यांकन दो क्लिनिकल परीक्षणों में किया गया। इसमें शामिल मरीजों को 24 सप्ताह तक हिबसागो के इंजेक्शन दिए गए, जबकि वे अपनी पुरानी एंटीवायरल दवाएं भी लेते रहे। परीक्षणों में पाया गया कि हिबसागो लेने वाले 24% मरीज अपनी एंटीवायरल दवाएं बंद करने की शर्तें पूरी करने में सफल रहे, जबकि प्लेसबो (दवा रहित) समूह में कोई भी ऐसा नहीं कर पाया। इलाज पूरी तरह बंद होने के 24 हफ़्तों बाद भी, हिबसागो लेने वाले 19% मरीजों में वायरस पर नियंत्रण बना रहा।

हालांकि, एफडीए ने इस दवा से जुड़े गंभीर सुरक्षा जोखिमों के प्रति आगाह भी किया है। दवा की जानकारी में लिवर की गंभीर प्रतिक्रियाओं और प्लेटलेट काउंट में कमी के बारे में एक विशेष चेतावनी शामिल है, जिससे जानलेवा ब्लीडिंग का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा, किडनी की कार्यक्षमता बिगड़ने और अन्य गंभीर सूजन संबंधी चेतावनियाँ भी दी गई हैं। इलाज के दौरान मरीजों को नियमित रक्त जांच और डॉक्टरों की सख्त निगरानी में रहना होगा।

भारत के लिए महत्व

क्रोनिक हेपेटाइटिस बी एक लंबे समय तक चलने वाला संक्रमण है जो लिवर को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है, जिसमें सिरोसिस और लिवर कैंसर भी शामिल है। भारत सहित पूरे एशिया में यह एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। एफडीए की घोषणा में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह इलाज अमेरिका के बाहर, जिसमें भारत भी शामिल है, व्यावसायिक रूप से कब उपलब्ध होगा। इस दवा को 'फास्ट ट्रैक' और 'ब्रेकथ्रू थेरेपी' का दर्जा दिया गया था, जो गंभीर बीमारियों के इलाज में इसकी क्षमता को दर्शाता है।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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