NDPS मामलों में जांच और सुनवाई में देरी: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों से जवाब मांगा
नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की जांच और सुनवाई में होने वाली देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, शीर्ष…
नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की जांच और सुनवाई में होने वाली देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, शीर्ष अदालत ने सोमवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों के लिए एक समयबद्ध और प्रभावी कानूनी प्रक्रिया सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहन की पीठ ने सुनवाई की। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 सितंबर की तारीख तय की है। याचिका में तर्क दिया गया है कि जांच के लिए एक समान मानकों, समय पर फॉरेंसिक जांच और प्रभावी निगरानी की कमी के कारण कानूनी प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होती है, जिससे प्रक्रियात्मक त्रुटियां बढ़ती हैं।
जांच प्रक्रिया में सुधार की मांग
याचिका में NDPS मामलों की जांच और अभियोजन प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। इसमें फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट जमा करने के लिए एक अनिवार्य समय-सीमा तय करने की मांग की गई है। साथ ही, कम और मध्यम मात्रा के नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में तलाशी, जब्ती और नमूना लेने के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने का भी आग्रह किया गया है। पारदर्शिता बढ़ाने और प्रक्रियात्मक खामियों के कारण आरोपियों के बरी होने को रोकने के लिए, तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया की अनिवार्य डिजिटल रिकॉर्डिंग और वीडियोग्राफी की भी मांग की गई है।
कानूनी और संस्थागत ढांचे पर जोर
याचिकाकर्ता ने नए प्रकार के नशीले पदार्थों (न्यू साइकोएक्टिव सब्सटेंसेस) की पहचान और उन्हें समय पर सूचीबद्ध करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन की आवश्यकता पर भी बल दिया है। इसके अलावा, NDPS अधिनियम की धारा 36 और 36ए के तहत विशेष अदालतों के गठन और मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए एक समान एसओपी बनाने की मांग की गई है। याचिका में ड्रग तस्करों और उन्हें वित्तपोषित करने वालों की संपत्तियों का समयबद्ध आकलन कर उन्हें जब्त करने के लिए भी कहा गया है, जिसके लिए धन शोधन निवारण अधिनियम और बेनामी संपत्ति कानून जैसे अन्य कानूनों का हवाला दिया गया है।
नशा पीड़ितों और पुनर्वास का मुद्दा
याचिका में नशे के आदी लोगों और ड्रग तस्करों के बीच अंतर करने वाली एक सजा नीति की वकालत की गई है। इसमें तस्करों के लिए कड़ी सजा, जबकि व्यक्तिगत उपयोग से जुड़े मामलों में अलग दृष्टिकोण अपनाने की मांग है। साथ ही, देशभर में नशा मुक्ति और पुनर्वास केंद्रों की स्थापना और संचालन की भी मांग की गई है। याचिका में NDPS अधिनियम की धारा 39 और 64ए के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया गया है, जो स्वेच्छा से उपचार लेने वाले नशा पीड़ितों को अभियोजन से राहत का प्रावधान देती हैं।
याचिका में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि 2025 में ड्रग्स से जुड़े मामलों में 53 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिसमें 1,48,063 मामले दर्ज हुए। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह समस्या सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि जनस्वास्थ्य, परिवार व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी प्रभावित करती है।
इनपुट: IANS



