मध्य प्रदेश: जानलेवा 'गोटमार मेला' 11 सितंबर को, प्रशासन ने शांतिपूर्ण आयोजन के लिए कसी कमर
मध्य प्रदेश के पांढुर्ना में हर साल होने वाला सदियों पुराना 'गोटमार मेला' इस बार 11 सितंबर को आयोजित होगा, जिसमें दो गांवों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंकने की परंपरा निभाएंगे। समाचार एजेंसी IANS की…
मध्य प्रदेश के पांढुर्ना में हर साल होने वाला सदियों पुराना 'गोटमार मेला' इस बार 11 सितंबर को आयोजित होगा, जिसमें दो गांवों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंकने की परंपरा निभाएंगे। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस आयोजन के हिंसक इतिहास को देखते हुए प्रशासन ने इसे शांतिपूर्ण और सुरक्षित बनाने के लिए कड़े इंतजाम किए हैं। इस मेले में अब तक 18 से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है, और हर साल दर्जनों लोग घायल होते हैं।
जाम नदी के किनारे बसे पांढुर्ना और सावरगांव के बीच होने वाले इस पारंपरिक मेले को लेकर प्रशासन सतर्क है। गुरुवार को कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ ने एक शांति समिति की बैठक में साफ किया कि मेला पारंपरिक तरीके से ही होगा, लेकिन नियमों का सख्ती से पालन कराया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि पत्थर फेंकने के लिए 'गोफन' (गुलेल) का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।
क्या है यह अनोखी और खतरनाक परंपरा?
इस मेले की शुरुआत को लेकर कोई सटीक जानकारी तो नहीं है, लेकिन एक स्थानीय लोककथा इससे जुड़ी है। माना जाता है कि सालों पहले पांढुर्ना का एक लड़का, सावरगांव की एक लड़की के साथ भाग गया था। जब वे जाम नदी पार कर रहे थे, तो दोनों गांवों के लोगों ने उन पर पत्थर बरसाए, जिससे नदी में ही उनकी मौत हो गई। उसी दुखद घटना की याद में हर साल यह मेला आयोजित होता है।
परंपरा के तहत, सावरगांव के लोग नदी के बीच में पलाश का एक पेड़ लगाकर उस पर झंडा बांधते हैं, जिसे वे अपनी बेटी का प्रतीक मानते हैं। इसके बाद दोनों गांवों के लोग नदी के किनारों से एक-दूसरे पर पत्थर फेंकना शुरू कर देते हैं। जो पक्ष पेड़ को उखाड़कर उस पर कब्ज़ा कर लेता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
प्रशासन ने इस साल किसी भी अनहोनी को रोकने के लिए व्यापक तैयारी की है। कलेक्टर ने निवासियों से अपील करते हुए कहा, "लोगों की जिंदगी उनके परिवार के लिए बहुत कीमती है। सुरक्षित रहें और जिम्मेदारी से त्योहार मनाएं।" उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि सूरज ढलने से पहले झंडा टूटने के साथ ही पत्थरबाजी बंद हो जानी चाहिए।
मेले के दौरान मौके पर डॉक्टर और एम्बुलेंस की टीम तैनात रहेगी। सुरक्षा और ट्रैफिक व्यवस्था के लिए भी खास इंतजाम किए गए हैं। इसके अलावा, भीड़ को नियंत्रित करने के लिए साप्ताहिक बाजार को 8 सितंबर तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। कई सामाजिक संगठनों की अपील के बावजूद यह परंपरा स्थानीय पहचान का एक खतरनाक प्रतीक बनी हुई है।
इनपुट: IANS



