शनिवार, 29 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान का नया रक्षा समझौता सवालों के घेरे में, रिपोर्ट में कई विरोधाभास उजागर

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने हाल ही में एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे 'मक्का समझौता' कहा जा रहा है। कनाडा स्थित 'जियोपॉलिटिकल मॉनिटर' की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह समझौता कई…

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान का नया रक्षा समझौता सवालों के घेरे में, रिपोर्ट में कई विरोधाभास उजागर
(फोटो: IANS)

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने हाल ही में एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे 'मक्का समझौता' कहा जा रहा है। कनाडा स्थित 'जियोपॉलिटिकल मॉनिटर' की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह समझौता कई बुनियादी विरोधाभासों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से जूझ रहा है, जिससे इसकी सफलता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। समाचार एजेंसी IANS द्वारा प्राप्त इस रिपोर्ट में समझौते की खामियों को विस्तार से उजागर किया गया है।

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अगस्त की शुरुआत में हुआ यह समझौता मध्य पूर्व में बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों का नतीजा माना जा रहा है। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर बार-बार होते हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात सुचारु रखने में वाशिंगटन की असमर्थता ने इस क्षेत्र के देशों को नए रक्षा साझेदार खोजने के लिए प्रेरित किया है।

समझौते की बनावट और चुनौतियाँ

मक्का समझौते को नाटो जैसे सुरक्षा गठबंधन के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। इसमें भी नाटो के अनुच्छेद 5 की तरह एक प्रावधान है, जिसके तहत किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमले को तीनों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, रिपोर्ट इस बात पर सवाल उठाती है कि क्या साझा मूल्यों, हितों या किसी एक साझा दुश्मन के अभाव में यह गठबंधन एकजुट रह पाएगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस समझौते की सबसे बड़ी कमजोरी इसके सदस्यों के आपसी रिश्ते और उनके अलग-अलग भू-राजनीतिक हित हैं। उदाहरण के लिए, सऊदी अरब ने पिछले एक दशक में भारत के साथ अपने संबंध काफी मजबूत किए हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या भविष्य में भारत के साथ किसी भी संघर्ष की स्थिति में सऊदी अरब पाकिस्तान का साथ देगा?

क्या सदस्य देश एक-दूसरे की मदद करेंगे?

रिपोर्ट में अतीत की एक घटना का भी जिक्र किया गया है। जब सऊदी अरब ने यमन युद्ध के लिए पाकिस्तान से सैनिक, जहाज और विमान मांगे थे, तब पाकिस्तान की संसद ने इसमें शामिल न होने के पक्ष में मतदान किया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि हर देश युद्ध और शांति जैसे मामलों में अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। इसलिए, यह आशंका बनी हुई है कि क्या ये तीनों देश संकट के समय वाकई एक-दूसरे की मदद करेंगे, और अगर करेंगे भी तो किस हद तक, यह एक खुला सवाल है।

साझा राजनीतिक विचारधारा का अभाव

नाटो की सफलता का एक बड़ा कारण यह है कि वह साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों के सम्मान पर आधारित है, जो इसे एक मजबूत वैचारिक आधार देता है। इसके विपरीत, मक्का समझौते में ऐसी कोई जोड़ने वाली राजनीतिक विचारधारा नहीं है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब एक धर्म-आधारित शासन वाला देश है, जबकि पाकिस्तान में सेना समर्थित लोकतंत्र है जो धर्म को एक नीतिगत हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। वहीं, तुर्की को एक संकटग्रस्त लोकतंत्र के रूप में देखा जाता है जो राजनीतिक इस्लाम का समर्थन करता है। विडंबना यह है कि सऊदी अरब राजनीतिक इस्लाम, विशेषकर मुस्लिम ब्रदरहुड को, अपने शासन के लिए एक बड़ा खतरा मानता है। इन बुनियादी अंतरों के कारण समझौते का भविष्य अनिश्चित लगता है।

इनपुट: IANS

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