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महाराष्ट्र: अवैध साहूकारों पर अब और सख्त होगी कार्रवाई, सरकार ने पेश किया सज़ा बढ़ाने वाला विधेयक

महाराष्ट्र में कमजोर किसानों और कर्जदारों को अवैध साहूकारों के शोषण से बचाने के लिए राज्य सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। विधानसभा में मंगलवार को एक विधेयक पेश किया गया, जिसका मकसद अवैध साहूकारी के खिला

महाराष्ट्र: अवैध साहूकारों पर अब और सख्त होगी कार्रवाई, सरकार ने पेश किया सज़ा बढ़ाने वाला विधेयक
(फोटो: IANS)

महाराष्ट्र में कमजोर किसानों और कर्जदारों को अवैध साहूकारों के शोषण से बचाने के लिए राज्य सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। विधानसभा में मंगलवार को एक विधेयक पेश किया गया, जिसका मकसद अवैध साहूकारी के खिलाफ मौजूदा कानून को और सख्त बनाना है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस विधेयक में जेल की सजा और जुर्माने की राशि, दोनों को बढ़ाने का प्रस्ताव है।

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यह कदम पिछले हफ्ते विधानसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के सदस्यों द्वारा उठाई गई जोरदार मांग के बाद उठाया गया है। सदन में चर्चा के दौरान यह बात सामने आई थी कि राज्य भर में अवैध साहूकारों द्वारा अत्यधिक ब्याज दरें वसूलने और कर्ज वापसी के लिए लगातार प्रताड़ित करने के मामले बढ़ रहे हैं, जिसके चलते कई किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं।

कानून में क्या होंगे बदलाव?

राज्य के सहकारिता मंत्री बाबासाहेब पाटिल द्वारा पेश किए गए इस विधेयक में 'महाराष्ट्र साहूकारी (विनियमन) अधिनियम, 2014' की धारा 39 में संशोधन का प्रस्ताव है।

मौजूदा सजा: अभी तक, बिना वैध लाइसेंस के साहूकारी का धंधा करने, फर्जी नाम से लाइसेंस लेने, या कर्ज वसूली के लिए कर्जदार को परेशान करने जैसे अपराधों के लिए अधिकतम 5 साल की जेल और 50,000 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान था।

प्रस्तावित सजा: नए संशोधनों के तहत, अवैध साहूकारी के अपराध के लिए अधिकतम कारावास की अवधि को 5 साल से बढ़ाकर 7 साल किया जाएगा। इसके साथ ही, जुर्माने की राशि को भी 50,000 रुपये से बढ़ाकर 1,00,000 रुपये करने का प्रस्ताव है।

क्यों पड़ी संशोधन की जरूरत?

सरकार का मानना है कि मौजूदा कानून के प्रावधान अवैध साहूकारों पर नकेल कसने के लिए पर्याप्त रूप से शक्तिशाली साबित नहीं हो रहे थे। इसी वजह से कई व्यक्ति और संस्थाएं गैर-कानूनी तरीके से साहूकारी के धंधे में लिप्त थे। नए और कड़े प्रावधानों का उद्देश्य ऐसे लोगों पर कानूनी शिकंजा कसना और संकट में फंसे कर्जदारों को राहत देना है।

इनपुट: IANS

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