मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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खालिस्तान आंदोलन: सिख हितों के विरुद्ध और समुदाय पर एक बोझ - नई रिपोर्ट का निष्कर्ष

पश्चिमी देशों में खालिस्तानी अलगाववाद को मिल रहा बढ़ावा सिख समुदाय के वास्तविक हितों को नुकसान पहुँचा रहा है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यह आंदोलन न केवल सिखों को मुख्यधारा से अलग-थलग करता है, बल्कि उन…

खालिस्तान आंदोलन: सिख हितों के विरुद्ध और समुदाय पर एक बोझ - नई रिपोर्ट का निष्कर्ष
(फोटो: IANS)

पश्चिमी देशों में खालिस्तानी अलगाववाद को मिल रहा बढ़ावा सिख समुदाय के वास्तविक हितों को नुकसान पहुँचा रहा है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यह आंदोलन न केवल सिखों को मुख्यधारा से अलग-थलग करता है, बल्कि उन पर संदेह भी बढ़ाता है। समाचार एजेंसी IANS की इस रिपोर्ट के मुताबिक, यह उग्रवाद युवाओं के कट्टरपंथ और नशीले पदार्थों व गैंग नेटवर्क जैसी गंभीर समस्याओं से ध्यान भटकाता है।

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रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत और विदेशों में रहने वाले अधिकांश सिख, खालिस्तान आंदोलन को किसी सार्थक उद्देश्य के बजाय एक बोझ के रूप में देखते हैं। पंजाब में इसे लगभग कोई चुनावी समर्थन हासिल नहीं है। रिपोर्ट में कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया के पूर्व प्रधानमंत्री उज्जल दोसांझ का हवाला देते हुए कहा गया है कि 5% से भी कम कनाडाई सिख इसका समर्थन करते हैं।

हिंसा का इतिहास और आंदोलन का सच

यह रिपोर्ट खालिस्तान आंदोलन के हिंसक अतीत की याद दिलाती है, जिसमें एयर इंडिया बमकांड और पंजाब में दशकों तक चला उग्रवाद और रक्तपात शामिल है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह एक राजनीतिक परियोजना है जिसे बाहरी समर्थन मिलता रहा है और यह बार-बार हिंसा का रास्ता अपना चुकी है।

इसी संदर्भ में 'फाइंडिंग खालिस्तान' नामक एक डॉक्यूमेंट्री का भी जिक्र है, जो इस आंदोलन के पूरे सफर को सामने रखती है। इस डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत कनाडा के पत्रकार डेनियल बोर्डमैन द्वारा की गई एक वैश्विक पड़ताल के बाद हुई। यह पड़ताल ब्रैम्पटन के सभा मंदिर में एक कांसुलर शिविर के दौरान खालिस्तान समर्थक तत्वों द्वारा श्रद्धालुओं पर किए गए हमले के बाद शुरू हुई थी।

गुरुओं की शिक्षा के विरुद्ध

रिपोर्ट के अनुसार, खालिस्तान की विचारधारा सिख गुरुओं की मूल शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत है। इसमें कहा गया है कि गुरु नानक ने धार्मिक कट्टरता और राजनीतिक विभाजन को खारिज किया था, और श्री गुरु ग्रंथ साहिब बार-बार 'ना को बैरी, नहि बेगाना' के माध्यम से मानव एकता का संदेश देता है। खालसा की स्थापना दबे-कुचलों की रक्षा के लिए की गई थी, न कि आतंक और धमकी के बल पर एक धार्मिक राज्य बनाने के लिए।

आज की खालिस्तानी गतिविधियाँ, जैसे मंदिरों पर हमले और आतंकवादियों का महिमामंडन, सिख धर्म की आध्यात्मिक और नैतिक विरासत से कोई मेल नहीं खातीं। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि इस आंदोलन के कारण आम सिखों को दुनियाभर में बदनामी की कीमत चुकानी पड़ रही है, जबकि उनका समुदाय सेवा और समृद्धि के लिए जाना जाता है।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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