IIT मंडी का बड़ा अविष्कार: अब हिमालय में भूस्खलन की मिलेगी पहले से चेतावनी
हिमालय क्षेत्र में मानसून के दौरान होने वाले जान-माल के भारी नुकसान को रोकने की दिशा में एक बड़ी कामयाबी मिली है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्
हिमालय क्षेत्र में मानसून के दौरान होने वाले जान-माल के भारी नुकसान को रोकने की दिशा में एक बड़ी कामयाबी मिली है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए एक 'लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम' यानी भूस्खलन की पूर्व चेतावनी देने वाली प्रणाली विकसित की है। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, यह सिस्टम वेब-आधारित प्लेटफॉर्म के जरिए रोजाना भूस्खलन के खतरे का पूर्वानुमान जारी करेगा, जिससे आपदा प्रबंधन की तैयारियों को मजबूती मिलेगी।
यह सिस्टम भारत में अब तक का सबसे बड़े भौगोलिक क्षेत्र को कवर करने वाला भूस्खलन पूर्वानुमान सिस्टम है। देश में पहले से मौजूद कई चेतावनी प्रणालियाँ सिर्फ छोटे-छोटे इलाकों तक ही सीमित हैं, लेकिन आईआईटी मंडी का यह सिस्टम पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए काम करेगा। बदलते जलवायु पैटर्न के कारण इस क्षेत्र में पहाड़ों के ढलान टूटने की घटनाएँ बढ़ रही हैं, जिससे यह इलाका देश के सबसे अधिक भूस्खलन-संभावित क्षेत्रों में से एक बन गया है।
कैसे काम करता है यह सिस्टम?
आईआईटी मंडी द्वारा विकसित यह प्रणाली किसी इलाके की संवेदनशीलता के आंकड़ों का रियल-टाइम बारिश के डेटा के साथ मिलान करती है। इसके आधार पर यह भूस्खलन की आशंका का अनुमान लगाकर उस पर लगातार नजर रखती है। सिस्टम खतरे वाली जगहों के लिए विशेष चेतावनी जारी करता है, जिससे अधिकारियों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को समय रहते बचाव के उपाय करने में मदद मिलती है।
इस शोध का नेतृत्व आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डेरिक्स प्रेज शुक्ला ने अपने रिसर्च स्कॉलर अंकित सिंह और नितेश धीमान के साथ मिलकर किया। प्रोफेसर शुक्ला ने बताया, "यह सिस्टम मानसून सीजन की शुरुआत से ही एक वेब-एप्लिकेशन के जरिए रोजाना भूस्खलन का अनुमान देता है, जिससे ज्यादा जोखिम वाले इलाकों की पहले से पहचान करने में मदद मिलती है।"
आपदा प्रबंधन के लिए एक प्रभावी निवेश
प्रोफेसर शुक्ला ने इस तकनीक के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि सैटेलाइट पर आधारित पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ आपदा जोखिम को कम करने में सबसे असरदार निवेश में से एक हैं, क्योंकि वे वैज्ञानिक डेटा को समय पर कार्रवाई योग्य जानकारी में बदल देती हैं। उनके अनुसार, यह पूर्वानुमान प्लेटफॉर्म आपदा की तैयारी को मजबूत करने, आपातकालीन प्रतिक्रिया को बेहतर बनाने और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने की क्षमता रखता है।
इस सिस्टम को विकसित करने के लिए शोधकर्ताओं ने एक बहु-चरणीय पद्धति अपनाई। उन्होंने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के डेटाबेस से लगभग 26,000 पुरानी भूस्खलन की घटनाओं की पहचान कर एक 'भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र' तैयार किया। इसके बाद, भूस्खलन को गति देने वाले कई कारकों को मशीन लर्निंग मॉडल का उपयोग करके एकीकृत किया गया। टीम ने नासा के ग्लोबल लैंडस्लाइड कैटलॉग और IMERG सैटेलाइट के बारिश संबंधी सात मापदंडों का उपयोग करके बारिश से होने वाले भूस्खलन की संभावना का मॉडल भी तैयार किया।
इनपुट: IANS



