महिला आरक्षण कानून: परिसीमन की शर्त पर विपक्ष ने उठाए सवाल, केंद्र सरकार पर 'चुनावी ड्रामा' का आरोप
महिला आरक्षण कानून यानी 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को लागू करने को लेकर केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच एक बार फिर बहस छिड़ गई है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के एक बयान के बाद विपक्ष ने सरकार…
महिला आरक्षण कानून यानी 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को लागू करने को लेकर केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच एक बार फिर बहस छिड़ गई है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के एक बयान के बाद विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे 'चुनावी ड्रामा' बताया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार को मौजूदा 543 लोकसभा सीटों पर ही महिलाओं के लिए आरक्षण लागू कर देना चाहिए और इसके लिए परिसीमन (डिलिमिटेशन) प्रक्रिया का इंतजार नहीं करना चाहिए।
यह पूरा विवाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र से शुरू हुआ। खड़गे ने पत्र में पूछा था कि क्या सरकार परिसीमन विधेयक पारित करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने एक टीवी इंटरव्यू में विशेष सत्र के संकेत दिए थे, जिसके बाद उन्होंने यह मांग दोहराई है।
विपक्षी दलों ने क्या कहा?
कई विपक्षी नेताओं ने सरकार की आलोचना करते हुए उस पर झूठ बोलने और प्रक्रिया में देरी करने का आरोप लगाया है। शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत ने IANS से बातचीत में कहा, "महिला आरक्षण विधेयक कब पारित हुआ था? 2023 में। ...भाजपा झूठ के सहारे खड़ी है।" उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर सरकार वाकई आरक्षण देना चाहती है, तो वह मौजूदा 543 सीटों के आधार पर ऐसा कर सकती है। सावंत ने इसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले का 'ड्रामा' भी बताया।
इसी तरह की राय व्यक्त करते हुए, पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने सरकार की सोच को "महिलाओं और गरीबों के प्रति विकृत" बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार नहीं चाहती कि गरीब, पिछड़ी और मध्यम वर्ग की महिलाएं राजनीति में आगे बढ़ें और उसकी चिंता सिर्फ 2029 के लोकसभा चुनाव को लेकर है।
कानून के क्रियान्वयन पर सवाल
विपक्षी नेताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि कानून तो पहले ही बन चुका है, लेकिन असली मुद्दा उसके लागू होने का है। सीपीआई नेता एनी राजा ने कहा कि जनगणना और परिसीमन की दो शर्तें जोड़कर महिलाओं को गुमराह किया जा रहा है। उनके मुताबिक, कानून को इस तरह बनाया गया है कि इन प्रक्रियाओं के पूरा हुए बिना महिला आरक्षण लागू नहीं हो सकता।
ओडिशा कांग्रेस के नेता अरविंद दास ने भी यही मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सरकार महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना चाहती है और संवैधानिक परंपराओं को दरकिनार करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि जो काम पिछले सत्र में नहीं हो सका, उसे अब विशेष सत्र बुलाकर करने की कोशिश की जा रही है।
इनपुट: IANS



