केरल में CPI(M) की बड़ी हार: आत्ममंथन में सामने आईं 5 बड़ी वजहें
केरल में 2026 के विधानसभा चुनाव में वामपंथी मोर्चे (LDF) को चार दशकों की सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा। इस बड़ी चुनावी शिकस्त के बाद CPI(M) की केंद्रीय समिति ने अपनी विस्तृत समीक्षा रिपोर्ट में…
केरल में 2026 के विधानसभा चुनाव में वामपंथी मोर्चे (LDF) को चार दशकों की सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा। इस बड़ी चुनावी शिकस्त के बाद CPI(M) की केंद्रीय समिति ने अपनी विस्तृत समीक्षा रिपोर्ट में हार के कारणों को स्वीकार किया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी ने माना है कि पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पर अत्यधिक केंद्रित प्रचार, अहंकार और भाई-भतीजावाद की छवि, और जनता से कट जाना इस हार के मुख्य कारण रहे।
CPI(M) नेतृत्व ने पहली बार इतनी स्पष्टता से स्वीकार किया है कि LDF सरकार की हार के लिए बाहरी ताकतों से ज़्यादा पार्टी की अपनी आंतरिक राजनीतिक और संगठनात्मक कमजोरियां ज़िम्मेदार थीं। 2021 में 99 सीटें जीतने वाले LDF को इस बार सिर्फ़ 35 सीटों से संतोष करना पड़ा, जबकि CPI(M) की अपनी सीटें 64 से घटकर 26 पर आ गईं। पार्टी का वोट शेयर भी गिरकर 21.77% पर पहुंच गया, जो पिछले 40 सालों में सबसे कम है।
विजयन-केंद्रित प्रचार पड़ा भारी
रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि पूरा चुनाव अभियान पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के इर्द-गिर्द सिमट गया था। समिति ने विजयन को एक सक्षम मुख्यमंत्री तो माना, लेकिन यह भी कहा कि जब प्रचार एक व्यक्ति पर केंद्रित हो गया तो विपक्षी UDF को उन पर सीधा हमला करने का अवसर मिल गया। इसके चलते वाम मोर्चा अपना राजनीतिक एजेंडा तय करने में विफल रहा और पूरा अभियान नीतियों पर लड़ने के बजाय एक नेता के बचाव में ही सिमट कर रह गया।
संगठन और सरकार की छवि को नुक़सान
समीक्षा में माना गया कि पार्टी की विश्वसनीयता को गंभीर चोट पहुंची। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं में अहंकार, भ्रष्टाचार के आरोप, भाई-भतीजावाद और आलीशान जीवनशैली की धारणा ने पार्टी की छवि खराब की। इसमें यह भी कहा गया है कि गंभीर आरोपों का सामना कर रहे नेताओं पर कार्रवाई में देरी, सहकारी संस्थाओं में गड़बड़ियां और उम्मीदवारों के चयन में पक्षपात के आरोपों ने इस नुक़सान को और बढ़ाया।
अल्पसंख्यकों का छिटकना और ज़मीनी दूरी
रिपोर्ट में अल्पसंख्यक समुदायों का पार्टी से दूर होना भी एक बड़ी वजह बताई गई है। योगी आदित्यनाथ के संदेश को एक कार्यक्रम में पढ़े जाने और मुस्लिम विरोधी टिप्पणियों पर पार्टी की कमज़ोर प्रतिक्रिया जैसे मुद्दों से यह संदेश गया कि CPI(M) हिंदुत्व ताकतों के प्रति नरम है, जिससे उसकी धर्मनिरपेक्ष छवि को नुक़सान पहुंचा। इसके अलावा, रिपोर्ट की सबसे गंभीर चिंता यह है कि पार्टी अपने पारंपरिक समर्थकों और आम लोगों से दूर होती गई। जनसंगठन कमज़ोर पड़ गए, मंत्री आम लोगों से कट गए और कार्यकर्ता जनता की समस्याओं को उठाने के बजाय नौकरशाही पर निर्भर हो गए।
CPI(M) ने यह भी स्वीकार किया कि वह पेंशन बकाया, सहकारी क्षेत्र के संकट और जंगली हाथियों के हमले जैसे मुद्दों पर जनता के गुस्से को भांपने में नाकाम रही। हालांकि, रिपोर्ट में केंद्र की भाजपा सरकार, कांग्रेस, कॉरपोरेट मीडिया और सांप्रदायिक ताकतों को भी प्रतिकूल माहौल के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया, लेकिन ज़ोर इस बात पर दिया गया कि हार के मुख्य कारण आंतरिक थे। अब सबकी निगाहें सितंबर में कोझिकोड में होने वाली पार्टी की विस्तारित राज्य समिति की बैठक पर टिकी हैं, जहां संगठनात्मक बदलावों पर चर्चा हो सकती है।
इनपुट: IANS



