मध्य प्रदेश: कांग्रेस नेता उमंग सिंघार का बड़ा बयान, 2028 में सरकार बनी तो खत्म कर देंगे UCC कानून
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने ऐलान किया है कि अगर 2028 में कांग्रेस की सरकार बनती है, तो वह इस…
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने ऐलान किया है कि अगर 2028 में कांग्रेस की सरकार बनती है, तो वह इस कानून को खत्म कर देगी। उन्होंने यूसीसी को 'काला कानून' करार दिया।
समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघार यह बयान भोपाल में विधायक आरिफ मसूद द्वारा आयोजित 'जंग-ए-आजादी-उलेमा की कुर्बानी' कार्यक्रम में दे रहे थे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कांग्रेस के सत्ता में लौटने पर समान नागरिक संहिता कानून को रद्द कर दिया जाएगा। उनके इस बयान ने राज्य की राजनीति में यूसीसी के मुद्दे को फिर से गरमा दिया है।
राज्य में UCC कानून और उसके प्रावधान
यह राजनीतिक विवाद तब शुरू हुआ जब मध्य प्रदेश सरकार ने 20 जुलाई को एक विशेष कैबिनेट बैठक में यूनिफॉर्म सिविल कोड विधेयक 2026 को मंजूरी दी थी। इसके ठीक अगले दिन, 21 जुलाई को, यह विधेयक विधानसभा में पारित हो गया था। इस दौरान कांग्रेस विधायकों ने विधेयक को प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) को भेजने की मांग को लेकर सदन में हंगामा भी किया था।
इस कानून के तहत कई महत्वपूर्ण प्रावधान हैं, जिनमें बहुविवाह पर रोक, विवाह का अनिवार्य पंजीकरण और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए भी पंजीकरण को अनिवार्य करना शामिल है। हालांकि, अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।
कानून पर पक्ष और विपक्ष
यूसीसी का उद्देश्य विवाह, तलाक, संपत्ति, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे पारिवारिक मामलों में धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों की जगह सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसका समर्थन करते हुए इसे समानता और सामाजिक सौहार्द के लिए जरूरी बताया है। सरकार का तर्क है कि इससे सभी को समान अधिकार मिलेंगे और महिलाओं को अधिक कानूनी सुरक्षा प्राप्त होगी।
वहीं, कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। उनकी आपत्ति है कि यह कानून विभिन्न समुदायों की धार्मिक व पारंपरिक प्रथाओं में हस्तक्षेप कर सकता है। साथ ही, आदिवासी समाज की परंपराओं और उन्हें मिले संवैधानिक संरक्षण पर इसके असर को लेकर भी चिंता जताई गई है।
इनपुट: IANS



