पाकिस्तान: नए ईसाई विवाह कानूनों पर चिंता, चर्चों से परामर्श की मांग तेज़
पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों में ईसाई विवाह से जुड़े कानूनों में बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं, जिस पर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं। एक रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि कोई भी अंतिम निर्णय…
पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों में ईसाई विवाह से जुड़े कानूनों में बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं, जिस पर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं। एक रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले सरकार को चर्च और ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ गंभीरता से विचार-विमर्श करना चाहिए। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से आई खबर के मुताबिक, यह मांग इसलिए उठी है क्योंकि ईसाई धर्म में विवाह को सिर्फ एक कानूनी समझौता नहीं, बल्कि एक पवित्र बंधन माना जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि ब्रिटिश काल के पुराने कानूनों में सुधार की आवश्यकता है, लेकिन यह प्रक्रिया बेहद सावधानी से पूरी की जानी चाहिए। इसमें ईसाई नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही गई है, जिसमें विवाह का उचित पंजीकरण, जबरन और बाल विवाह से सुरक्षा, तथा किसी भी तरह के दुर्व्यवहार के खिलाफ प्रभावी कानूनी उपाय शामिल हैं।
क्या हैं प्रस्तावित बदलाव?
पंजाब में 'पंजाब क्रिश्चियन मैरिज बिल 2026' लाया जा रहा है, जो 1872 के पुराने 'क्रिश्चियन मैरिज एक्ट' की जगह लेगा। इस नए विधेयक में लड़के और लड़की दोनों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल तय करने का प्रावधान है। साथ ही, शादी के लिए दोनों पक्षों का ईसाई होना और यूनियन काउंसिल व राष्ट्रीय डेटाबेस प्राधिकरण (NADRA) में पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। यह बिल 30 सितंबर को पंजाब विधानसभा की मानवाधिकार और अल्पसंख्यक मामलों की स्थायी समिति से सर्वसम्मति से पारित हो चुका है और अब पूरी विधानसभा में मतदान का इंतज़ार है।
वहीं, सिंध प्रांत में डिप्टी स्पीकर एंथनी नवीद ने एक निजी सदस्य विधेयक के तौर पर 'क्रिश्चियन फैमिली लॉज बिल 2026' पेश किया है। इसका दायरा ज़्यादा बड़ा है और इसमें तलाक, न्यायिक अलगाव, गुजारा-भत्ता, पुनर्विवाह, बच्चों की कस्टडी और पारिवारिक संपत्ति जैसे कई अहम विषय शामिल किए गए हैं।
चर्च की भूमिका और संवैधानिक अधिकार
रिपोर्ट में पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 20 का हवाला दिया गया है, जो सभी को धार्मिक स्वतंत्रता और अपने संस्थानों के प्रबंधन का अधिकार देता है। इस आधार पर यह तर्क दिया गया है कि गैर-सरकारी संगठन (NGO) कानूनी सुरक्षा पर अपनी राय दे सकते हैं, लेकिन आस्था से जुड़े मामलों पर वे चर्च का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि चर्च के प्रतिनिधियों को केवल बैठकों में बुला लेने को प्रस्तावित कानून पर उनकी सहमति नहीं माना जाना चाहिए। मांग की गई है कि चर्च, धर्मशास्त्रियों, कानूनी विशेषज्ञों और महिलाओं को इन मसौदों की समीक्षा करने और अपने सुझाव देने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।
इनपुट: IANS



