रविवार, 2 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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बलूचिस्तान खदान हादसा: एक ही गाँव के 22 समेत 34 मज़दूरों की मौत, पाकिस्तान के खनन उद्योग का स्याह सच उजागर

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक कोयला खदान में हुआ दर्दनाक हादसा देश के खनन उद्योग में व्याप्त खतरों और मज़दूरों की असुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों को एक बार फिर सामने ले आया है। इस त्रासदी में…

बलूचिस्तान खदान हादसा: एक ही गाँव के 22 समेत 34 मज़दूरों की मौत, पाकिस्तान के खनन उद्योग का स्याह सच उजागर
(फोटो: IANS)

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक कोयला खदान में हुआ दर्दनाक हादसा देश के खनन उद्योग में व्याप्त खतरों और मज़दूरों की असुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों को एक बार फिर सामने ले आया है। इस त्रासदी में 34 खनिकों की जान चली गई, जिनमें से कई एक ही परिवार और गाँव के थे।

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समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना क्वेटा के स्पिन करेज इलाके में गुरुवार सुबह उस वक्त हुई, जब मज़दूर ज़मीन से कई हज़ार फीट नीचे काम कर रहे थे। खदान में अचानक मीथेन गैस का एक शक्तिशाली विस्फोट हुआ, जिससे उसका एक बड़ा हिस्सा ढह गया और दर्जनों मज़दूर मलबे में ज़िंदा दफन हो गए।

एक गाँव का मातम और बेबसी

इस हादसे का सबसे गहरा असर खैबर पख्तूनख्वा के शांगला ज़िले पर पड़ा है, जहाँ के अधिकांश मृतक रहने वाले थे। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि मारे गए 34 मज़दूरों में से 22 अकेले शांगला के मियां कल्ले पीराबाद गाँव के थे। बाक़ी पीड़ित भी आस-पास के गाँवों के ही थे। कई मृतक आपस में रिश्तेदार थे, जिससे एक ही कुनबे पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। इस हादसे ने कई बच्चों को अनाथ और महिलाओं को विधवा बना दिया है।

मजबूरी में जोखिम भरा काम

रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ये सभी मज़दूर अपने परिवारों का पेट पालने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घर से बलूचिस्तान काम करने आए थे। शांगला दशकों से पाकिस्तान के सबसे पिछड़े ज़िलों में से एक है, जहाँ औद्योगिक विकास, रोज़गार के अवसर और कृषि उत्पादन न के बराबर है। इसी व्यापक बेरोज़गारी के चलते हज़ारों युवा बलूचिस्तान, सिंध और पंजाब की खतरनाक कोयला खदानों में काम करने को मजबूर हैं।

स्थानीय अनुमानों के अनुसार, शांगला की लगभग 65 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोयला खनन पर ही निर्भर है, जो अब पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाला काम बन गया है।

सुरक्षा और मुआवजे का अभाव

यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कई दशकों में बलूचिस्तान की खदानों में हुए हादसों में शांगला के सैकड़ों मज़दूर अपनी जान गँवा चुके हैं और हज़ारों स्थायी रूप से अपंग हो गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये मज़दूर बिना किसी बुनियादी कानूनी सुरक्षा के काम करते हैं। अधिकांश सरकारी अधिकारियों के पास पंजीकृत नहीं हैं और उन्हें सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा या जीवन बीमा जैसी कोई सुविधा नहीं मिलती। वे ठेकेदारों के ज़रिए काम करते हैं, इसलिए किसी घातक दुर्घटना की स्थिति में पीड़ित परिवारों को बहुत कम या कोई मुआवज़ा भी नहीं मिल पाता है।

इनपुट: IANS

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