मंगलवार, 1 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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सशस्त्र बल न्यायाधिकरण का अहम फैसला: समलैंगिक वायुसैनिक की बर्खास्तगी को 'डिस्चार्ज' में बदला

नई दिल्ली स्थित सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) ने भारतीय वायु सेना (IAF) के एक कर्मी की बर्खास्तगी के आदेश को ‘सेवामुक्ति’ यानी डिस्चार्ज में बदल दिया है। यह फैसला इस आधार पर लिया गया ताकि कर्मचारी के…

सशस्त्र बल न्यायाधिकरण का अहम फैसला: समलैंगिक वायुसैनिक की बर्खास्तगी को 'डिस्चार्ज' में बदला
(फोटो: IANS)

नई दिल्ली स्थित सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) ने भारतीय वायु सेना (IAF) के एक कर्मी की बर्खास्तगी के आदेश को ‘सेवामुक्ति’ यानी डिस्चार्ज में बदल दिया है। यह फैसला इस आधार पर लिया गया ताकि कर्मचारी के भविष्य में नौकरी पाने की संभावनाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्मी ने खुद के समलैंगिक होने और एक विदेशी नागरिक के साथ संबंध होने की बात स्वीकार की थी, जिसके बाद उसे नौकरी से निकाल दिया गया था।

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यह निर्णय AFT की प्रधान पीठ के अध्यक्ष जस्टिस राजेंद्र मेनन और सदस्य जस्टिस रासिका चौबे ने सुनाया। दिसंबर 2016 में भारतीय वायु सेना में शामिल हुए इस कर्मी ने 2024 में मानवीय आधार पर सेवा से मुक्ति की मांग की थी। उसने यह भी स्वीकार किया था कि उसका वायु सेना परिसर के बाहर एक विदेशी पार्टनर के साथ समलैंगिक संबंध था।

जांच और बर्खास्तगी की वजह

IAF ने इस मामले में जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि कर्मी ने एक विदेशी के साथ संबंध बनाकर अनुशासन तोड़ा और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला। एक कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी में उसे बिना अनुमति विदेश यात्रा करने का भी दोषी पाया गया, जिसके बाद इस साल की शुरुआत में उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।

न्यायाधिकरण के समक्ष अपनी याचिका में, कर्मी ने बर्खास्तगी के फैसले को चुनौती नहीं दी, बल्कि केवल यह अनुरोध किया कि इसे 'डिस्चार्ज' में बदल दिया जाए। उसके वकील ने तर्क दिया कि बर्खास्तगी का दाग उसके भविष्य के करियर में बाधा बनेगा। उसने कहा कि उसकी कोई बुरी नीयत नहीं थी, बल्कि परिस्थितियों के कारण उसे अपने पार्टनर से मिलने के लिए दो बार थाईलैंड और श्रीलंका की यात्रा करनी पड़ी थी।

न्यायाधिकरण का नजरिया

न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में कहा, "प्रतिवादियों (IAF) ने कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया और उनके द्वारा की गई तथाकथित पूछताछ और जांच में भी... राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की रक्षा या इंडियन एयरफोर्स के कामकाज से जुड़ी कोई चिंताजनक बात नहीं दिखी।" पीठ ने माना कि यद्यपि अनुशासित सशस्त्र बल में अनुशासन और नैतिकता के मानक लागू होते हैं, लेकिन इस विशेष मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना उचित है।

ट्रिब्यूनल ने यह भी गौर किया कि कर्मी ने साढ़े दस साल सेवा की है, जो पेंशन या सेवानिवृत्ति लाभों के लिए पर्याप्त नहीं है। उसके वकील ने स्पष्ट किया कि वह कोई वित्तीय लाभ नहीं चाहता, बल्कि केवल एक सम्मानजनक सेवामुक्ति चाहता है ताकि वह अपने पार्टनर के साथ रह सके और दूसरा काम कर सके।

अंतिम फैसला और शर्तें

फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि बर्खास्तगी और डिस्चार्ज, दोनों का नतीजा एक ही है कि वायु सेना अब उसकी सेवाएं नहीं चाहती। लेकिन 'डिस्चार्ज' उसे बर्खास्तगी से जुड़े कलंक से बचाएगा। इसी आधार पर, न्यायाधिकरण ने बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में बदलने का निर्देश दिया। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया कि आवेदक किसी भी प्रकार के वित्तीय लाभ, पेंशन, सेवानिवृत्ति लाभ या पूर्व-सैनिक के दर्जे का हकदार नहीं होगा। न्यायाधिकरण ने यह भी साफ किया कि इस फैसले को अन्य मामलों में एक नजीर के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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