सीवान: 40 साल से चल रही थी अवैध पटाखा फैक्ट्री, विस्फोट में 5 की मौत, प्रशासन की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
बिहार के सीवान जिले में दशकों से चल रहे एक अवैध पटाखा कारोबार का दर्दनाक अंत हुआ है। आलमापुर गांव में एक घर में पटाखा बनाते समय हुए भीषण विस्फोट में कम से कम पांच लोगों की जान चली गई और एक बच्ची घायल…
बिहार के सीवान जिले में दशकों से चल रहे एक अवैध पटाखा कारोबार का दर्दनाक अंत हुआ है। आलमापुर गांव में एक घर में पटाखा बनाते समय हुए भीषण विस्फोट में कम से कम पांच लोगों की जान चली गई और एक बच्ची घायल हो गई। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि दो मंजिला मकान पूरी तरह मलबे में तब्दील हो गया। इस घटना ने स्थानीय प्रशासन की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यह 'मौत की फैक्ट्री' कथित तौर पर लगभग 40 सालों से चल रही थी।
स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि इस हादसे में छह लोगों की मौत हुई है, हालांकि प्रशासन ने अब तक पांच शवों की बरामदगी की पुष्टि की है। घायल बच्ची का इलाज अस्पताल में चल रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि अमीरुद्दीन मियां के इसी घर में करीब 26 साल पहले भी इसी तरह का एक विस्फोट हुआ था, जिसमें दो लोगों की जान गई थी। उस हादसे के बावजूद यह खतरनाक कारोबार यहां बेरोकटोक जारी रहा।
प्रशासन की कार्रवाई और जांच
घटना की गंभीरता को देखते हुए सीवान के जिलाधिकारी विजय प्रकाश मीणा ने जांच के आदेश दिए हैं। पूरे इलाके को सील कर दिया गया है और जेसीबी की मदद से मलबा हटाने का काम जारी है। मौके पर बम निरोधक दस्ता, फॉरेंसिक टीम, डॉग स्क्वायड और अग्निशमन विभाग की टीमें सबूत इकट्ठा कर रही हैं। तलाशी के दौरान पास के धान के खेत से बारूद भी बरामद हुआ है, जिसे सबूत मिटाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
इस मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में सीवान के पुलिस अधीक्षक भरत सोनी ने जामो थानाध्यक्ष धीरज कुमार और चौकीदार चंद्रिका मांझी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। महराजगंज के एसडीपीओ अमन के नेतृत्व में एक जांच टीम का गठन किया गया है जो पूरे मामले की पड़ताल करेगी।
अवैध कारोबार का लंबा इतिहास
स्थानीय मुखिया संघ के प्रतिनिधि जीव नारायण यादव के अनुसार, गांव के चार-पांच घरों में अवैध रूप से पटाखे बनाए जाते थे। शादी, छठ पूजा और मुहर्रम जैसे अवसरों पर पटाखों की मांग के कारण यह एक आकर्षक धंधा बन गया था। उन्होंने यह भी बताया कि करीब 10 साल पहले प्रशासन ने छापेमारी की थी और गिरफ्तारियां भी हुई थीं, जिसका मामला अब भी अदालत में लंबित है। सवाल यह उठता है कि अगर इस अवैध कारोबार की जानकारी प्रशासन को थी, तो इसे पूरी तरह से बंद क्यों नहीं कराया जा सका।
इनपुट: IANS



