मंगलवार, 23 जून 2026 · नई दिल्ली
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बिहार: भोजपुर के बिलौटी गांव में कथित एनकाउंटर का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, पुलिस महकमे में हड़कंप

बिहार के भोजपुर स्थित बिलौटी गांव में भरत भूषण तिवारी के कथित एनकाउंटर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं। पुलिस इसे जवाबी फायरिंग बता रही है, जबकि परिजनों ने सरेंडर के बाद हत्या का आरोप लगाया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने रिटायर्ड जज से जांच के आदेश दिए हैं।

बिहार: भोजपुर के बिलौटी गांव में कथित एनकाउंटर का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, पुलिस महकमे में हड़कंप
AI जनित प्रतीकात्मक चित्र

भोजपुर: बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में हुए भरत भूषण तिवारी के कथित एनकाउंटर का विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत की दहलीज तक पहुंच गया है। इस घटना ने न केवल राज्य के पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में भी सरगर्मी तेज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई याचिकाओं के जरिए इस अभियान में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने और पूरे प्रकरण की एक स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराने की गुहार लगाई गई है।

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सुप्रीम कोर्ट में कानूनी शिकंजा और सुनवाई की उम्मीद

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कानूनी मोर्चे पर इस कथित पुलिस मुठभेड़ को लेकर शीर्ष अदालत में दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई हैं। पहली कानूनी पहल वकील नरेंद्र मिश्रा द्वारा की गई है, जिन्होंने सीधे सीजेआई सूर्यकांत को एक लेटर पिटीशन भेजी है। वहीं, दूसरी तरफ वकील विशाल तिवारी ने भी एक विस्तृत याचिका दाखिल कर मामले की गहन न्यायिक समीक्षा की मांग की है। बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट आगामी 22 जून को इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई कर सकता है। दिलचस्प बात यह है कि इस याचिका का दायरा केवल बिहार की सीमाओं तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसमें उत्तर प्रदेश में हुए कथित 'पूरे और आधे एनकाउंटर' के मामलों को भी शामिल करते हुए उनकी व्यापक जांच की अपील की गई है।

वारदात की रात: दावों और हकीकत के बीच उलझी कहानी

बिलौटी गांव में हुई इस वारदात को लेकर स्थानीय पुलिस और वहां के निवासियों के बीच बयानों का भारी विरोधाभास देखने को मिल रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में दो बिल्कुल अलग-अलग पहलू सामने आए हैं:

  • पुलिस का दावा: प्रशासनिक सूत्रों और पुलिस के आधिकारिक बयान के अनुसार, जब उनकी टीम आरोपी को पकड़ने के लिए इलाके में दबिश देने गई थी, तब भरत भूषण तिवारी ने उन पर अचानक फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस महकमे का कहना है कि आत्मरक्षा और जवाबी कार्रवाई में उन्हें भी मजबूरन गोलियां चलानी पड़ीं।
  • परिजनों और ग्रामीणों का आरोप: मृतक के परिवार और गांव वालों ने पुलिस की इस थ्योरी को सिरे से नकार दिया है। उनका बेहद गंभीर आरोप है कि भरत ने पुलिस के सामने पूरी तरह से सरेंडर कर दिया था और उसके बाद उसे कथित तौर पर बेहद करीब से गोली मारी गई।

इस मामले ने तब और ज्यादा तूल पकड़ लिया जब घटना के वक्त का एक कथित वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। इस डिजिटल सुराग ने पुलिस की पूरी कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट में दी गई याचिका में यह भी दावा किया गया है कि मृतक तिवारी का पहले से कोई भी आपराधिक इतिहास (क्रिमिनल हिस्ट्री) दर्ज नहीं था।

एफआईआर की कार्रवाई और पुलिस का एक्शन

इस कथित एनकाउंटर के बाद स्थानीय थाने में दो अलग-अलग प्राथमिकियां (एफआईआर) दर्ज की गई हैं, जिसने मामले को और पेचीदा बना दिया है। पहली एफआईआर में मृतक के पिता और उसके भाई को ही मुख्य आरोपी बनाया गया है। पुलिस ने उन पर अवैध हथियार रखने, सरकारी काम में बाधा डालने, पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला करने और एक आरोपी को पनाह देने जैसे कई गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं, दूसरी एफआईआर सीधे तौर पर इस पुलिस एनकाउंटर की घटना और उसमें हुई मौत से संबंधित है।

राजनीतिक बयानबाजी और उठते सवाल

इस कथित मुठभेड़ के बाद बिहार के राजनीतिक गलियारों में भी हलचल काफी तेज हो गई है। विभिन्न राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं ने पुलिस की थ्योरी पर खुला संदेह जताया है:

  • अश्विनी चौबे (वरिष्ठ बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री): उन्होंने पुलिस की इस पूरी कार्रवाई पर सीधा सवाल दागते हुए पूछा है कि जब भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था और उसके पास कोई भी हथियार मौजूद नहीं था, तो फिर पुलिस को गोली चलाने की नौबत क्यों आई?
  • सुदामा प्रसाद (आरा के सांसद): उन्होंने इंटरनेट पर मौजूद वायरल वीडियो फुटेज और मौके से मिले अन्य उपलब्ध साक्ष्यों का हवाला देते हुए इस पूरे एनकाउंटर को बेहद संदिग्ध करार दिया है।

प्रशासनिक आदेश और आगे की जांच का रास्ता

बढ़ते सार्वजनिक दबाव और विवाद को देखते हुए राज्य सरकार को इस मामले में दखल देना पड़ा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस पूरे प्रकरण की गंभीरता को समझते हुए इसकी जांच पटना हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज से कराने के सख्त आदेश जारी किए हैं। दूसरी तरफ, मृतक की मां आशा देवी ने न्याय की गुहार लगाते हुए जगदीशपुर के डीएसपी और शाहपुर थाने के तत्कालीन एसएचओ (SHO) के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज करने के लिए प्रशासन को एक औपचारिक अर्जी दी है।

कानूनी विशेषज्ञों ने भी इस मामले में अपनी बेबाक राय रखी है। पटना हाई कोर्ट के वकील रजनीश कुमार ने इसे एक कथित फर्जी एनकाउंटर बताते हुए एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) के गठन की पुरजोर मांग की है। इसके साथ ही, उन्होंने पटना हाई कोर्ट से यह अपील भी की है कि वह इस गंभीर मामले का स्वतः संज्ञान ले ताकि पूरी सच्चाई का पर्दाफाश हो सके और पीड़ित परिवार को जल्द से जल्द न्याय मिल सके। अब सभी की निगाहें 22 जून को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली संभावित सुनवाई पर टिकी हैं, जहां से इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच की आगे की दिशा तय होने की पूरी उम्मीद है।

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