सोमवार, 29 जून 2026 · नई दिल्ली
स्वास्थ्य

बच्चे को 'परफेक्ट' बनाने की होड़ में माता-पिता कहीं उसकी मानसिक सेहत तो नहीं बिगाड़ रहे?

हर माँ-बाप चाहते हैं कि उनका बच्चा जीवन में आगे बढ़े — यह स्वाभाविक है। लेकिन जब यह चाहत एक अटूट दबाव में बदल जाती है और बच्चे को हर क्षेत्र में 'नंबर वन' साबित करने की जिद बन जाती है, तो यही प्यार उस

बच्चे को 'परफेक्ट' बनाने की होड़ में माता-पिता कहीं उसकी मानसिक सेहत तो नहीं बिगाड़ रहे?
(फोटो: IANS)

हर माँ-बाप चाहते हैं कि उनका बच्चा जीवन में आगे बढ़े — यह स्वाभाविक है। लेकिन जब यह चाहत एक अटूट दबाव में बदल जाती है और बच्चे को हर क्षेत्र में 'नंबर वन' साबित करने की जिद बन जाती है, तो यही प्यार उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। मनोविज्ञान में इस व्यवहार को 'पुशी पेरेंटिंग' कहा जाता है।

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IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, पुशी पेरेंटिंग बाहर से अनुशासन और सफलता जैसी दिखती है, लेकिन भीतर से यह बच्चे के मानसिक विकास को धीरे-धीरे कमज़ोर करती रहती है। ऐसे बच्चे खेल, सीखने और खुशी का अनुभव लेने की बजाय केवल 'परफॉर्मेंस' के बारे में सोचने लगते हैं।

अच्छे नंबर भी काफी नहीं — टॉप न करना भी बन जाता है 'गुनाह'

पुशी पेरेंटिंग की सबसे आम पहचान यह है कि माता-पिता बच्चे से हमेशा सर्वोच्च अंक और हर काम में पहले स्थान की उम्मीद रखते हैं। यदि बच्चा अच्छे नंबर लाए, लेकिन कक्षा में शीर्ष न रह पाए, तो भी उसे डाँट का सामना करना पड़ता है। इस तरह के माहौल में बच्चे को धीरे-धीरे यह एहसास होने लगता है कि उसकी मेहनत का कोई मोल नहीं — और वह खुद को तभी स्वीकार कर पाता है जब वह दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरे। यह मानसिकता उसके भीतर एक स्थायी डर की जड़ें जमा देती है।

बच्चे की पसंद दरकिनार, माता-पिता की मर्ज़ी थोपी जाती है

कई बार बच्चे की रुचि किसी खेल, कला या शौक में होती है, मगर माता-पिता उसे अपनी पसंद के करियर या विषय की ओर धकेलते हैं। नतीजतन बच्चा अपनी खुशियाँ और रुचियाँ दबाने लगता है और सिर्फ वही करने की कोशिश करता है जिससे घर में सराहना मिले। इस प्रक्रिया में उसका अपना व्यक्तित्व पीछे छूट जाता है।

तुलना की आदत और 'सेल्फ-डाउट पैटर्न'

जब बच्चों की बार-बार दूसरों से तुलना की जाती है — "देखो, पड़ोस का रोहन कितने नंबर लाया" — तो यह उनके आत्मविश्वास की नींव को खोखला करता है। मनोवैज्ञानिक इसे 'सेल्फ-डाउट पैटर्न' कहते हैं, जिसमें बच्चा खुद को दूसरों से कमतर समझने लगता है और अपनी क्षमताओं पर भरोसा करना छोड़ देता है। धीरे-धीरे उसके मन में हीन भावना घर कर लेती है।

हर छोटे फैसले पर नियंत्रण — आत्मनिर्भरता की राह बंद

पुशी पेरेंटिंग का एक और पहलू यह है कि माता-पिता बच्चे के क्या पहनना है, क्या खाना है, किससे दोस्ती करनी है और खाली वक्त में क्या करना है — जैसे रोज़मर्रा के फैसले भी खुद ही तय करने लगते हैं। जब बच्चे को अपनी छोटी-छोटी पसंद के अनुसार चुनाव करने का मौका ही नहीं मिलता, तो वह आत्मनिर्भर नहीं बन पाता। बड़े होने पर भी हर बात के लिए दूसरों की राय पर निर्भर रहने की आदत बनी रहती है।

दिशा दें, दबाव नहीं — मनोवैज्ञानिकों की सलाह

मनोवैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि बच्चों को सही मार्गदर्शन देना ज़रूरी है, लेकिन उन पर अपेक्षाओं का बोझ लादना उनके समग्र विकास के लिए नुकसानदेह है। बच्चे को 'परफेक्ट' बनाने की कोशिश में माता-पिता अनजाने में उसकी स्वाभाविक खुशी, रचनात्मकता और आत्मबल को कुचल सकते हैं।

इनपुट: IANS

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