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काशी की पंचक्रोशी यात्रा: 108 शिवलिंगों के दर्शन से मिलता पुण्य, 5 प्रमुख पड़ावों से होकर गुजरती है परिक्रमा – Varanasi News

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काशी की पंचक्रोशी यात्रा:  108 शिवलिंगों के दर्शन से मिलता पुण्य, 5 प्रमुख पड़ावों से होकर गुजरती है परिक्रमा – Varanasi News

काशी की पंचक्रोशी यात्रा: 108 शिवलिंगों के दर्शन से मिलता पुण्य, 5 प्रमुख पड़ावों से होकर गुजरती है परिक्रमा – Varanasi News


उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर अर्धचंद्राकार स्वरूप में बसी काशी को धार्मिक ग्रंथों में पृथ्वी का मस्तक कहा गया है। मान्यता है कि जिस प्रकार भगवान शिव के मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है, उसी प्रकार काशी भी पृथ्वी पर अलौकिक आभा बिखेरती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अंतर्गत वर्णित ‘काशी रहस्य’ में पंचक्रोशी क्षेत्र को स्वयं भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग स्वरूप बताया गया है, जिसकी पवित्र परिक्रमा की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। यह यात्रा 17 मई से शुरू हुई है जो अभी 15 जून तक चलने वाली है। त्रेता युग में भगवान राम ने पहली बार की थी परिक्रमा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में भगवान राम ने अपने पिता महाराज दशरथ को श्रवण कुमार के श्राप से मुक्ति दिलाने हेतु माता सीता एवं भाइयों के साथ पहली बार पंचक्रोशी यात्रा की थी। बाद में रावण वध के पश्चात ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति के लिए भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ पुनः इस यात्रा की। वहीं द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडवों द्वारा द्रौपदी सहित इस यात्रा को संपन्न करने का उल्लेख भी मिलता है। 5 प्रमुख मंदिर जहां होता है श्रद्धालुओं का पड़ाव लगभग 25 कोस की यह परिक्रमा पांच दिनों में पूरी की जाती है। यात्रा के पांच प्रमुख पड़ाव क्रमशः कर्दमेश्वर, भीमचंडी, रामेश्वर, शिवपुर और कपिलधारा हैं। पंचक्रोशी परिक्रमा दक्षिणावर्त दिशा में की जाती है, जिससे यात्रा मार्ग के प्रमुख मंदिर श्रद्धालुओं के दाहिनी ओर पड़ते हैं। मार्ग में स्थित धर्मशालाओं में लगभग 25 हजार यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था है। प्रत्येक पड़ाव के समीप जलकुंड या जलस्रोत भी स्थित हैं, जहां श्रद्धालु स्नान कर पूजन-अर्चन करते हैं। 108 शिवलिंगों का होता है दर्शन पंचक्रोशी यात्रा के दौरान श्रद्धालु 108 शिवलिंगों, 56 मंदिरों, 11 विनायकों, 10 अन्य शिव मंदिरों, 10 देवी स्थलों, 4 विष्णु मंदिरों, 2 भैरव स्थलों एवं 14 अन्य देवस्थानों के दर्शन-पूजन का पुण्य प्राप्त करते हैं। मणिकर्णिका घाट से प्रारंभ होकर अस्सी के मार्ग से पंचक्रोशी पथ पर चलने वाली यह यात्रा काशी की प्राचीनतम तीर्थ परंपराओं में से एक मानी जाती है। अब पांचों मंदिरों का इतिहास जाने पहला पड़ाव कर्दमेश्वर है, जहां स्थित प्राचीन शिवलिंग की स्थापना कर्दम ऋषि द्वारा किए जाने की मान्यता है। यहां स्थित बिंदु सरोवर में स्नान के पश्चात श्रद्धालु रात्रि विश्राम करते हैं। दूसरे दिन यात्रा भीमचंडी पहुंचती है, जहां गंधर्व सागर कुंड के समीप स्थित भीमचंडी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। तीसरे पड़ाव रामेश्वर में स्थित शिवलिंग को भगवान राम द्वारा स्थापित माना जाता है। यहां लक्ष्मणेश्वर, भरतेश्वर और शत्रुघ्नेश्वर मंदिर भी स्थित हैं। चौथे पड़ाव शिवपुर में पांडवों द्वारा स्थापित पांच शिवलिंगों तथा द्रौपदी कुंड का विशेष महत्व है। यात्रा के दौरान अनेक श्रद्धालु मार्ग में ईंटों से प्रतीकात्मक घरौंदे बनाकर अपने घर निर्माण की कामना भी व्यक्त करते हैं। पांचवें और अंतिम पड़ाव कपिलधारा में कपिलेश्वर महादेव का विशाल मंदिर स्थित है, जो कपिल मुनि को समर्पित है। यहां पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण का विशेष महत्व माना जाता है। कपिलधारा में धर्मशाला, जलकुंड, प्रसाधन और विद्युत जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। कपिलधारा से आगे श्रद्धालु वरुणा और गंगा के संगम स्थित आदि केशव घाट के समीप जौ विनायक मंदिर पहुंचते हैं, जहां जौ अर्पित करने की परंपरा है।

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