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एन. रघुरामन का कॉलम: अपने मूल्यांकन से आपको वैश्विक पहचान मिल सकती है!

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एन. रघुरामन का कॉलम:  अपने मूल्यांकन से आपको वैश्विक पहचान मिल सकती है!

एन. रघुरामन का कॉलम: अपने मूल्यांकन से आपको वैश्विक पहचान मिल सकती है!

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6 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

वो स्कूल बंद होने वाला था। सरकारी नियमों के अनुसार भी उसे बंद होना पड़ता, क्योंकि 2006 में शुरू हुए स्कूल में 2023 में महज तीन ही छात्र बचे थे। राज्य सरकार के नियम भी कहते हैं कि 10 से कम विद्यार्थी वाले स्कूल बंद होने चाहिए। वह साल 2023 का समय था, जब स्कूल के नए प्रिंसिपल दत्तात्रेय वारे ने वहां पद संभाला।

अब हम सीधे 2025 पर आते हैं। पुणे से 50 किमी दूर जलिंदर नगर के खेड़ तालुका स्थित इस मराठी माध्यम के स्कूल ने ना सिर्फ खुद को जीवंत किया, बल्कि आज इसमें कक्षा एक से सात तक के 120 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इससे भी ज्यादा विद्यालय को ‘स्कूल विकास में सामुदायिक भागीदारी’ श्रेणी में अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मिली है।

स्कूल को यह पहचान यूके के ‘द टी4 एजुकेशन कॉम्पिटीशन’ के कारण मिली, जो हर साल दुनियाभर में उत्कृष्ट स्कूलों को मान्यता देता है और उन्हें विश्व के सर्वश्रेष्ठ स्कूलों की श्रेणी में लाता है। यह उन स्कूलों को हाईलाइट कर रहा है, जो अपने नवाचारों से छात्रों और समुदाय पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल रहे हैं। आपके दिमाग में कई सवाल आ रहे होंगे जैसे ‘उन्होंने यह कैसे किया? वो भी एक जिला परिषद स्कूल ने महज दो सालों में?’ ‘कैसे उन्होंने यह अन्तरराष्ट्रीय पहचान हासिल की?’ मैं आपको इनके जवाब देता हूं।

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नए प्रिंसिपल वारे ने जॉइन करने के बाद खुद आगे होने के बजाय लोकेलिटी में रहने वाले बच्चों के माता-पिता को आगे किया। प्रिंसिपल ने उन पर भरोसा जताया, क्योंकि कौन से अभिभावक ऐसे होंगे, जो अपने बच्चों को सफल नहीं देखना चाहते।

प्रिंसिपल ने उनसे इस बारे में बातचीत की कि निजी स्कूलों में ऐसा क्या है, जो अभिभावकों को आकर्षित करता है और इस जिला परिषद स्कूल में क्या और जोड़ा जा सकता है। दोनों ने मिलकर ना सिर्फ आधुनिक लर्निंग टूल्स, कौशल आधारित प्रशिक्षण और चीजों को प्रयोग कर उनके बारे में सीखने जैसे वृहद क्षेत्रों की, बल्कि कंप्यूटिंग, एआई, कम्युनिकेशन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कला-शिल्प जैसे अनिवार्य कौशल भी पहचाने।

फिर हर अभिभावक ने अपनी विशेषज्ञतानुसार अपनी भूमिका तय की। जैसे किसी की इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान है तो उसने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण दिए। दूसरा कम्प्यूटर विशेषज्ञ है तो उसने फ्री ट्रेनिंग की पेशकश की।

जब ऐसे छोटे-बड़े योगदानों को सम्मान मिला तो ये बात जंगल की आग की तरह फैल गई और छोटे से कस्बे में मदद के लिए और लोग आगे आए। जब माता-पिता ने इस प्रक्रिया में हिस्सा लेना शुरू किया और घरों में रात को डिनर के समय परिवार में अपने योगदान पर बातचीत होने लगी, तो स्वाभाविक तौर पर बच्चे और अधिक रुचि लेने लगे।

ऐसी सामूहिक सहभागिता के चलते बच्चों की जिज्ञासा और बढ़ी। चूंकि वे ही ये लाभ पाने वाले थे, इसलिए उन्होंने सोशल मीडिया से सीखी मांगें रखीं। जिस स्कूल ने कभी इतने छात्रों की कल्पना तक नहीं की थी, वह इसरो जैसे संस्थानों के शिविरों में भाग लेने लगा। इससे छात्रों की रुचि और बढ़ी। हर छोटी उपलब्धि से कस्बे का उल्लास बढ़ता जाता।

पर वारे खुद को और अपने स्कूल को किसी और चीज में परखना चाहते थे, यहीं उनकी नजर ‘टी4 एजुकेशन कॉम्पिटीशन’ पर पड़ी। उन्होंने आवेदन किया और अर्जेंटीना की एक टीम के साथ ऑनलाइन साक्षात्कार में अभिभावक शामिल हुए और अभिभावकों ने अंग्रेजी में बात भी की। इस प्रकार ये स्कूल ‘सामुदायिक भागीदारी’ की श्रेणी में चयनित होने वाला देश का पहला और एक मात्र सरकारी स्कूल बना।

जाहिर तौर पर महाराष्ट्र से भी ये दुनिया के शीर्ष 10 में शामिल होने वाला पहला स्कूल था। यह सिर्फ एक अवॉर्ड ही नहीं है, बल्कि इसने दुनिया के नवाचारों वाले श्रेष्ठ स्कूलों के बड़े नेटवर्क का निर्माण भी किया है, जिससे नए विचारों के साथ सर्वश्रेष्ठ करने की उनकी गति भी बढ़ी है। ध्यान रखें कि मूल्यांकन आत्म परीक्षण नहीं है, बल्कि यह सफलता के लिए एक नेटवर्क बनाना है।

फंडा यह है कि यदि आप अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए हर वैश्विक मानदंड पर खुद का मूल्यांकन करते रहेंगे तो क्या पता कि कि आपके सामने कोई ऐसी खिड़की खुल जाए जो आपको ग्लोबल ट्रॉफी दिला दे और अपनी श्रेणी में आपको सर्वश्रेष्ठ का ताज पहना दे!

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