4.81 लाख 50 माह तक कोष से रहा बाहर – Khagaria News h3>
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पंचायती राज विभाग ने वंशावली प्रमाण-पत्र बनवाने की प्रक्रिया को आम लोगों के लिए सरल और सुलभ बना दिया है। अब इस कार्य के लिए कार्यपालक दंडाधिकारी से प्रमाणित शपथ-पत्र की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है। इसके स्थान पर यदि शपथ-पत्र नोटरी पब्लिक से प्रमाणित है, तो वह भी पूरी तरह वैध और स्वीकार्य होगा। इससे पहले पंचायत सचिव केवल कार्यपालक या अनुमंडल दंडाधिकारी से प्रमाणित शपथ-पत्र ही स्वीकार करते थे, जिससे ग्रामीणों को अनुमंडल कार्यालय के कई चक्कर लगाने पड़ते थे। इस प्रक्रिया में समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती थी।
इस संदर्भ में पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार ने स्पष्ट आदेश जारी करते हुए कहा कि शपथ-पत्र एक वैधानिक दस्तावेज होता है, जिसे नोटरी पब्लिक या कार्यपालक दंडाधिकारी दोनों में से किसी के माध्यम से प्रमाणित किया जा सकता है। इसलिए अब दोनों ही प्रकार के शपथ-पत्र पंचायत सचिवों द्वारा स्वीकार किए जाएंगे।
NEWS4SOCIALन्यूज | खगड़िया जिला कृषि कार्यालय द्वारा वर्ष 2017-18 में आहरित सरकारी राशि के समायोजन में एक गंभीर वित्तीय अनियमितता सामने आई है। महालेखाकार (लेखा परीक्षा), बिहार, पटना द्वारा की गई लेखा परीक्षा (ऑडिट) में खुलासा हुआ है कि 10.77 लाख की कुल राशि में से 4.81 लाख की रकम लगभग 50 महीनों तक विभागीय कोष से बाहर रखी गई। इस गंभीर लापरवाही पर अब बिहार सरकार के कृषि विभाग ने जिला कृषि पदाधिकारी से बिंदुवार स्पष्टीकरण मांगा है। महालेखाकार कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, कौशल विकास योजना के अंतर्गत आहरित इस राशि को वर्षों तक समायोजित नहीं किया गया, जो बिहार कोषागार संहिता 2011 के नियम 176, 177 और 194 का सीधा उल्लंघन है। ऑडिट में जो मुख्य अनियमितताएं पाई गईं, वे इस प्रकार हैं। 4.81 लाख की राशि करीब चार साल से अधिक समय तक विभागीय कोष से बाहर पाई गई। यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस धनराशि को कहाँ और क्यों रोका गया, जिससे इसके औचित्य पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। महालेखाकार कार्यालय ने यह भी जानना चाहा है कि यदि इस रोकी गई राशि पर कोई ब्याज प्राप्त हुआ हो, तो क्या उसे सरकार के कोष में वापस किया गया? यदि ऐसा नहीं हुआ है, तो इसे एक और बड़ी वित्तीय लापरवाही माना जाएगा। लेखापरीक्षा में यह भी जानकारी नहीं दी गई कि किस अधिकारी के आदेश या किस प्राधिकार के तहत इतनी बड़ी धनराशि को विभागीय कोष से बाहर रखा गया। प्राधिकार का उल्लेख नहीं है।
कृषि विभाग, बिहार के अवर सचिव अमिताभ कुमार रेड्डी ने जिला कृषि पदाधिकारी को निर्देश दिया है कि वे सभी अभिलेखों को महालेखाकार को प्रस्तुत करते हुए तत्काल स्पष्टीकरण दें। साथ ही, संयुक्त निदेशक (शष्य) को भी निर्देशित किया गया है कि वे इस पूरे मामले की निगरानी करें। ताकि आगे की कार्रवाई सुनिश्चित हो सके। यह मामला जिला कृषि कार्यालय में वित्तीय अनुशासन की कमी और सरकारी धन के प्रबंधन में बरती गई लापरवाही को उजागर करता है।
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पंचायती राज विभाग ने वंशावली प्रमाण-पत्र बनवाने की प्रक्रिया को आम लोगों के लिए सरल और सुलभ बना दिया है। अब इस कार्य के लिए कार्यपालक दंडाधिकारी से प्रमाणित शपथ-पत्र की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है। इसके स्थान पर यदि शपथ-पत्र नोटरी पब्लिक से प्रमाणित है, तो वह भी पूरी तरह वैध और स्वीकार्य होगा। इससे पहले पंचायत सचिव केवल कार्यपालक या अनुमंडल दंडाधिकारी से प्रमाणित शपथ-पत्र ही स्वीकार करते थे, जिससे ग्रामीणों को अनुमंडल कार्यालय के कई चक्कर लगाने पड़ते थे। इस प्रक्रिया में समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती थी।
इस संदर्भ में पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार ने स्पष्ट आदेश जारी करते हुए कहा कि शपथ-पत्र एक वैधानिक दस्तावेज होता है, जिसे नोटरी पब्लिक या कार्यपालक दंडाधिकारी दोनों में से किसी के माध्यम से प्रमाणित किया जा सकता है। इसलिए अब दोनों ही प्रकार के शपथ-पत्र पंचायत सचिवों द्वारा स्वीकार किए जाएंगे।
NEWS4SOCIALन्यूज | खगड़िया जिला कृषि कार्यालय द्वारा वर्ष 2017-18 में आहरित सरकारी राशि के समायोजन में एक गंभीर वित्तीय अनियमितता सामने आई है। महालेखाकार (लेखा परीक्षा), बिहार, पटना द्वारा की गई लेखा परीक्षा (ऑडिट) में खुलासा हुआ है कि 10.77 लाख की कुल राशि में से 4.81 लाख की रकम लगभग 50 महीनों तक विभागीय कोष से बाहर रखी गई। इस गंभीर लापरवाही पर अब बिहार सरकार के कृषि विभाग ने जिला कृषि पदाधिकारी से बिंदुवार स्पष्टीकरण मांगा है। महालेखाकार कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, कौशल विकास योजना के अंतर्गत आहरित इस राशि को वर्षों तक समायोजित नहीं किया गया, जो बिहार कोषागार संहिता 2011 के नियम 176, 177 और 194 का सीधा उल्लंघन है। ऑडिट में जो मुख्य अनियमितताएं पाई गईं, वे इस प्रकार हैं। 4.81 लाख की राशि करीब चार साल से अधिक समय तक विभागीय कोष से बाहर पाई गई। यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस धनराशि को कहाँ और क्यों रोका गया, जिससे इसके औचित्य पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। महालेखाकार कार्यालय ने यह भी जानना चाहा है कि यदि इस रोकी गई राशि पर कोई ब्याज प्राप्त हुआ हो, तो क्या उसे सरकार के कोष में वापस किया गया? यदि ऐसा नहीं हुआ है, तो इसे एक और बड़ी वित्तीय लापरवाही माना जाएगा। लेखापरीक्षा में यह भी जानकारी नहीं दी गई कि किस अधिकारी के आदेश या किस प्राधिकार के तहत इतनी बड़ी धनराशि को विभागीय कोष से बाहर रखा गया। प्राधिकार का उल्लेख नहीं है।
कृषि विभाग, बिहार के अवर सचिव अमिताभ कुमार रेड्डी ने जिला कृषि पदाधिकारी को निर्देश दिया है कि वे सभी अभिलेखों को महालेखाकार को प्रस्तुत करते हुए तत्काल स्पष्टीकरण दें। साथ ही, संयुक्त निदेशक (शष्य) को भी निर्देशित किया गया है कि वे इस पूरे मामले की निगरानी करें। ताकि आगे की कार्रवाई सुनिश्चित हो सके। यह मामला जिला कृषि कार्यालय में वित्तीय अनुशासन की कमी और सरकारी धन के प्रबंधन में बरती गई लापरवाही को उजागर करता है।
