Advertising
<

हाईकोर्ट बोला-दस्तावेज पेश न करने पर केस खारिज करना गलत: प्रोडक्शन व डिस्कवरी के कानूनी अंतर से बहाल हुआ 23 साल पुराना मुकदमा – Jodhpur News

1
हाईकोर्ट बोला-दस्तावेज पेश न करने पर केस खारिज करना गलत:  प्रोडक्शन व डिस्कवरी के कानूनी अंतर से बहाल हुआ 23 साल पुराना मुकदमा – Jodhpur News

हाईकोर्ट बोला-दस्तावेज पेश न करने पर केस खारिज करना गलत: प्रोडक्शन व डिस्कवरी के कानूनी अंतर से बहाल हुआ 23 साल पुराना मुकदमा – Jodhpur News


राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक रिपोर्टेबल फैसले में स्पष्ट किया है कि दस्तावेज पेश करने के आदेश की पालना न होने पर किसी भी दीवानी मुकदमे को खारिज नहीं किया जा सकता। जस्टिस संदीप शाह की कोर्ट ने हनुमानगढ़ के भाद्रा निवासी ओमप्रकाश व अन्य की अपील पर सुनवाई करते हुए वहां के ट्रायल कोर्ट के 3 सितंबर 2008 का मुकदमा खारिज करने का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ‘डिस्कवरी ऑफ डॉक्यूमेंट्स’ और ‘प्रोडक्शन ऑफ डॉक्युमेंट्स’ कानूनन दो अलग प्रक्रियाएं हैं। 23 साल पुराना है जमीन से जुड़ा विवाद दरअसल, अपीलकर्ता स्व. ओमप्रकाश, ललिता देवी, दीपक कुमार आदि ने भाद्रा निवासी बलवंत, भूपसिंह और अन्य के खिलाफ साल 2003 में 6.30 लाख रुपए में तय हुए जमीन सौदे की पालना को लेकर मुकदमा दर्ज कराया था। प्रतिवादियों के वकील ने तर्क दिया था कि उन्होंने जमीन बेचने का करार नहीं किया, बल्कि वादी से केवल 1.10 लाख रुपए का कर्ज लिया था और वादी धोखाधड़ी कर रहे हैं। बचाव पक्ष के वकील ने ट्रायल कोर्ट में प्रार्थना पत्र लगाकर वादी से 1999 से 2001 तक के मूल बही-खाते पेश करने की मांग की। 23 मार्च 2006 को भाद्रा कोर्ट ने वादी को खाते पेश करने का आदेश दिया। वादी ने बताया- मूल खाते उनके पिता के पास गांव नेठराणा में हैं। वे केवल अपने पास मौजूद दस्तावेज ही पेश कर सकते हैं। कोर्ट के आदेश की पूर्ण पालना न होने पर, एडीजे कोर्ट ने 3 सितंबर 2008 को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 21(1) के तहत वादी का पूरा मुकदमा ही खारिज कर दिया था। वादी ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। प्रोडक्शन और डिस्कवरी कानूनन दो अलग अवधारणाएं हाईकोर्ट ने नियमों की व्याख्या करते हुए अपने फैसले में लिखा- ‘डिस्कवरी ऑफ डॉक्यूमेंट्स’ और ‘प्रोडक्शन ऑफ डॉक्युमेंट्स’ कानूनन दो अलग अवधारणाएं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश 11 नियम 21(1) के तहत मुकदमा खारिज करने या बचाव खत्म करने जैसी दंडात्मक कार्रवाई केवल नियम 11(प्रश्नावली), नियम 12(दस्तावेजों की खोज) या नियम 15(निरीक्षण) के उल्लंघन पर ही की जा सकती है। नियम 14 (दस्तावेजों को पेश करना) इसके दायरे से पूरी तरह बाहर है। कोर्ट ने कहा कि किसी का दावा खारिज करने का नियम केवल ‘दुर्लभतम मामलों’ में इस्तेमाल होना चाहिए, जहां पक्षकार की अदालत के आदेश की अवहेलना करने की जानबूझकर की गई कोशिश साबित हो। 2008 की स्थिति से दोबारा शुरू होगा ट्रायल हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह 3 सितंबर 2008 के स्तर से ही इस मामले की सुनवाई दोबारा शुरू करे। चूंकि यह मुकदमा 2003 का है, इसलिए कोर्ट ने ट्रायल जल्द पूरा करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी चाहें तो साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के तहत ‘सेकेंडरी एविडेंस’ पेश करने या ‘विपरीत निष्कर्ष’ निकालने के लिए कानूनन उचित आवेदन ट्रायल कोर्ट में कर सकते हैं।

राजस्थान की और समाचार देखने के लिए यहाँ क्लिक करे – Rajasthan News