हसीना को गए एक साल बीता, बांग्लादेश को क्या मिला: आंदोलन करने वाले बोले- जुल्म खत्म, लेकिन जो सोचा वो नहीं हुआ h3>
‘हसीना की तानाशाही के अंत के बाद हमें नई सरकार से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन वो खरी नहीं उतरी। पिछली सरकार में हमने उगाही से लेकर टेंडर में हेराफेरी तक सारी धांधलियां देखीं। अब इस सरकार में भी यही सब शुरू हो चुका है।‘
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बांग्लादेश की ढाका यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले मोहम्मद शराफत अमीन सरकार के कामकाज से भी खुश नहीं हैं। शेख हसीना सरकार के तख्तापलट को एक साल पूरा हो रहा है। देश में डॉ. मोहम्मद यूनुस की लीडरशिप में अंतरिम सरकार कामकाज संभाल रही है। हालांकि, अमीन के मुताबिक, आंदोलन के बाद जैसा सोचा था वो नहीं हुआ।
बांग्लादेश में जॉब में 30% कोटा सिस्टम को लेकर पिछले साल जुलाई में छात्र आंदोलन हुए थे। प्रदर्शन हिंसक होने के बाद 5 अगस्त 2024 को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा था। देश में अभी अंतरिम सरकार है। 2026 की शुरुआत में यहां नए सिरे से चुनाव होने वाले हैं।
बीते एक साल में बांग्लादेश में क्या बदला? जिस बदलाव की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ था, क्या वो पूरी हुई? इसे जानने के लिए हमने आंदोलन का चेहरा रहे स्टूडेंट लीडर्स से बात करने की कोशिश की, लेकिन वो राजी नहीं हुए। लिहाजा हमने आंदोलन का हिस्सा रहे स्टूडेंट्स और अंतरिम सरकार समेत पॉलिटिकल पार्टियों से बात की। हम बांग्लादेश में उन जगहों पर भी गए, जो तख्तापलट और विद्रोह का प्रतीक बनकर उभरीं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
सबसे पहले बात प्रदर्शनकारी स्टूडेंट्स की… बोले- डर-दमन की राजनीति खत्म हुई, अंतरिम सरकार पश्चिम की गुलामी में ढाका यूनिवर्सिटी में फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट रसेल एक साल पहले हुए छात्र आंदोलन का हिस्सा थे। उन्होंने सड़कों पर उतरकर शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन किया। हालांकि, वो अब भी वैसा बदलाव महसूस नहीं कर पा रहे हैं, जैसा उन्होंने सोचा था। रसेल कहते हैं,
बदलाव की बात करें तो पिछले एक साल में बांग्लादेश में हम डर और दमन की राजनीति से बाहर निकल पाए हैं। लोगों में सरकार को लेकर जो खौफ था, वो कम हुआ है। जुल्म और भेदभाव भी अब कम हो गया है।
’अब चिंता करने वाली बात ये है कि अंतरिम सरकार पश्चिम की गुलामी करती दिख रही है। UNHRC के दफ्तर सभी कमजोर देशों में हैं। हमारे देश में इसे क्यों मंजूरी दी गई? जिन सलाहकारों को नियुक्त किया गया है, वे पश्चिमी गुलामी में हैं। डॉ यूनुस के साथ काम करने वाले स्टूडेंट लीडर भी अब उतने प्रभावी नहीं रहे, जितने वो पहले हुआ करते थे।’
वे कहते हैं, ‘अब कम से इतना जरूर हुआ है कि ईमानदार राजनीति करने की कोशिश की जा रही है। इसे अंतरिम सरकार की उपलब्धि कह सकते हैं। पहले जिस तरह सरकार के संरक्षण में हत्याएं होती थीं, अब वो सब नहीं हो रहा है।’
‘हमने जो सोचा था वो हासिल नहीं हुआ’ ढाका यूनिवर्सिटी के बॉटनी डिपार्टमेंट में पढ़ने वाले मोहम्मद शराफत अमीन भी अंतरिम सरकार के कामकाज से बहुत खुश नहीं है।
वे कहते हैं, ‘तानाशाही के पतन के बाद नई सरकार उम्मीद की किरण की तरह आई, लेकिन हमारी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। पिछली सरकार के दौरान हमने उगाही से लेकर टेंडर में हेराफेरी तक सारी धांधली देखी। हमें उम्मीद थी कि अंतरिम सरकार के दौर में ये सब खत्म हो जाएगा। शुरुआत में जरूर इस पर लगाम लगी लेकिन अब सब फिर हो रहा है।’
’अखबार के पन्ने पलटते ही उगाही, भ्रष्टाचार, धांधली और रेप की खबरें पहले की तरह ही मिलेंगी।’
यहीं हम मोहम्मद सलाम से मिले। वो बांग्लादेश के उत्तरी जिले रंगपुर के एक गांव के रहने वाले हैं और अब ढाका में काम करते हैं। वे मानते हैं कि निचले स्तर पर करप्शन बढ़ गया है और ज्यादा वसूली होने लगी है।
सलाम कहते हैं, ‘उगाही बढ़ गई है। ऐसा नहीं है कि सरकार इसे कंट्रोल नहीं कर सकती। इसलिए मैं सरकार को दोष देता हूं। मैं तो ये पूछना चाहता हूं कि ये अंतरिम सरकार भला देश कैसे चला सकती है?‘
अब उन जगहों का हाल जानिए, जो तख्तापलट की गवाह बनीं…
सबसे पहले हम ढाका के रामपुरा पहुंचे। ये वही जगह है, जहां 18 जुलाई 2024 को जब BRC यूनिवर्सिटी और ईस्ट वेस्ट यूनिवर्सिटी में छात्र आंदोलन चरम पर था, तब पुलिस ने स्टूडेंट्स पर गोलियां चलाई थीं। घायल स्टूडेंट्स ने सड़क पर ही दम तोड़ दिया था। कई घायल लोग जब इलाज के लिए हॉस्पिटल पहुंचे, तो इलाज करने से मना कर दिया गया।
अब एक साल बाद यहां आम दिनों की तरह चहल-पहल है। यूनिवर्सिटी के गेट पर आने जाने वालों की भीड़ लगी है। एक साल बाद सब सामान्य है।
इसके बाद हम शाहबाग स्क्वेयर गए। ये जुलाई 2024 में छात्र आंदोलन का गढ़ था। स्टूडेंट लीडर्स, हसीना सरकार के खिलाफ यहीं से सारी प्लानिंग करते थे। इस चौक ने हर दिन प्रदर्शन, नारेबाजी, दमन, हिंसा और संघर्ष देखा।
ढाका यूनिवर्सिटी के करीब होने की वजह से प्रदर्शन में यहां स्टूडेंट्स का जमावड़ा होता था। अब जब एक साल बाद यहां आंदोलन की याद में छात्रों का मंच फिर सजा मिला। प्रदर्शन में मारे गए स्टूडेंट्स को श्रद्धांजलि दी गई।
इसके बाद हम गणभवन पहुंचे जो शेख हसीना का ऑफिस हुआ करता था। 5 अगस्त को जब छात्र आंदोलन हिंसक हो चुका था, तब प्रदर्शनकारियों ने गणभवन को टारगेट बनाया। जब सुरक्षाबलों को लगा कि हिंसक भीड़ PMO में दाखिल हो जाएगी, तब आर्मी ने शेख हसीना को देश छोड़़कर जाने की सलाह दी। हसीना के देश छोड़ने की खबर मिलते ही लोग PMO में दाखिल हो गए थे।
अब इस दफ्तर को जुलाई मेमोरियल म्यूजियम में बदला जा रहा है। इसे अगस्त 2024 में हुए सत्ता परिवर्तन के प्रतीक के तौर पर लोगों को दिखाया जाएगा, ताकि लोग यहां आकर शेख हसीना की सत्ता की क्रूरता और दमन की कहानियां जान सकें। दफ्तर के चारों तरफ अब भी सख्त सुरक्षा इंतजाम दिखे।
5 अगस्त 2024 को लोगों और प्रदर्शनकारियों की भीड़ सुरक्षाबलों का घेरा तोड़ते हुए पार्लियामेंट बिल्डिंग में घुस आई थी। लोगों ने बिल्डिंग के सामने पहुंचकर फोटो और सेल्फी ली थी। ये आम लोगों की शेख हसीना को सत्ता से बेदखल करने की तस्वीर बनकर उभरी थी। पार्लियामेंट में प्रदर्शनकारियों के तोड़फोड़ और लूटपाट के निशान अब भी हैं।
जब हम यहां पहुंचे तो पार्लियामेंट हाउस की मरम्मत का काम चल रहा है। बांग्लादेश में 2026 की शुरुआत में चुनाव होने हैं, तब तक इसका काम पूरा किया जाना है।
अब जानिए एक साल के कामकाज पर यूनुस सरकार क्या कह रही… इकोनॉमी पटरी पर लौटी, लॉ एंड ऑर्डर हसीना सरकार से बेहतर बांग्लादेश में 5 अगस्त 2024 को हुए तख्तापलट के बाद सेना के समर्थन से अंतरिम सरकार का गठन हुआ। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस चीफ एडवाइजर बने और एक सलाहकार परिषद बनाई गई, जो कैबिनेट की तरह काम करती है।
इसी में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले स्टूडेंट लीडर नाहिद इस्लाम भी एडवाइजर (मंत्री) बने, लेकिन बाद में इस्तीफा देकर अपनी पार्टी बना ली। अंतरिम सरकार के कामकाज को लेकर हमने डॉ यूनुस के मीडिया सलाहकार शफीकुल आलम से बात की।
सवाल: तख्तापलट के बाद आम लोगों को नई सरकार से काफी उम्मीदें थीं, क्या उस मुताबिक काम हो सका? जवाब: हमने बहुत खस्ताहाल इकोनॉमी के साथ शुरुआत की थी। एक साल पहले अर्थव्यवस्था बेपटरी थी, जो अब फिर पटरी पर लौट आई है। फॉरेन इन्वेस्टर्स बांग्लादेश आ रहे हैं। महंगाई डबल डिजिट से 8% पर आ गई है। फॉरेन रिजर्व अच्छी स्थिति में हैं। पहले हमारे पास फर्टिलाइजर इंपोर्ट करने के लिए डॉलर्स भी नहीं थे।
अब 3 साल में पहली बार बांग्लादेश का पॉजिटिव करंट अकाउंट है। एक्सपोर्ट में 9% का इजाफा हुआ है।
सवाल: बांग्लादेश में अगस्त 2024 के बाद से अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं होती रही हैं, अंतरिम सरकार इसे रोकने क्यों असफल है? जवाब: बांग्लादेश में हिंसा और सांप्रदायिक तनाव को लेकर हम पूरी तरह पारदर्शी हैं। इसीलिए हम भारतीय और फॉरेन जर्नलिस्ट को यहां से रिपोर्ट करने की खुली छूट देते हैं। लोग आएं और आकर जांच करें कि हिंसा के पीछे की वजह क्या है। यहां अल्पसंख्यक संगठन सांप्रदायिक घटनाओं के आरोप लगाते हैं, लेकिन सिर्फ 20 ही ऐसे मामले हुए हैं।
हसीना सरकार के वक्त की तुलना में देखें तो अभी हालात बेहतर हैं। हम शांति बहाल करने में लगे हुए हैं। हम चाहते हैं कि हर किसी के अधिकारों की रक्षा हो। पिछले साल हमने पूरी सुरक्षा में दुर्गा पूजा कार्यक्रम कराया। हमने हिंदुओं के नेशनल हॉलिडे भी तय किए हैं।
सवाल: विदेश नीति के मोर्चे पर बांग्लादेश पिछले एक साल में भारत से दूर और चीन के करीब जाता दिखा है? इसकी क्या वजह है? जवाब: आप बांग्लादेश के चीन की तरफ जाने की बात कर रहे हैं, लेकिन यहां लोग हम पर आरोप लगा रहे हैं कि हम अमेरिका की तरफ झुक रहे हैं। ये सच्चाई है कि हम अपने सभी पड़ोसियों के साथ बेहतर संबंध चाहते हैं। प्रोफेसर यूनुस ने कहा है कि हम भारत के साथ सबसे अच्छे रिश्ते चाहते हैं।
भारत हमारा दोस्त है। दोनों पड़ोसी देश हैं ये सच है, लेकिन हमारे रिश्ते दोनों की साझा गर्मजोशी पर निर्भर करते हैं। चीन आर्थिक रूप से समृद्ध देश है, हम उनके साथ मैन्युफैक्चरिंग पर काम कर रहे हैं। हम बांग्लादेश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
बांग्लादेश छात्र आंदोलन से निकले नाहिद इस्लाम ने अपनी पार्टी बना ली है। उन्होंने 28 फरवरी 2025 को नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) का ऐलान किया।
बांग्लादेश के चुनाव में BNP होगी सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार दूसरी तरफ बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) खुद को एकजुट कर रही है। इनकी रैलियों में अच्छी खासी भीड़ आ रही है। BNP अंतरिम सरकार पर जल्द से जल्द चुनाव कराने का दबाव बना रही है। पूर्व PM खालिदा जिया पार्टी की कमान संभाल रही हैं। फिलहाल खराब सेहत के चलते बेटे तारिक रहमान पार्टी के एक्टिंग चेयरमैन हैं।
तारिक 2018 से ही लंदन में निर्वासित हैं। अब वो चुनाव के साथ बांग्लादेश लौटने की तैयारी कर रहे हैं। BNP भारत विरोधी विदेश नीति के लिए जानी जाती रही है। पूर्व विदेश मंत्री और पार्टी के नेशनल स्टैंडिंग कमेटी मेंबर अब्दुल मोइन खान से सरकार के कामकाज को लेकर कहते हैं, ‘ये अंतरिम सरकार है, पूर्ण सरकार नहीं। जरूरत की वजह से इसका गठन हुआ और ये अस्थायी व्यवस्था है।’
‘इस सरकार पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी कि वो सुधार करें और चुनाव करवाएं। हम उम्मीद करते हैं कि वो जरूरी सुधार करें, जो अभी बाकी है। लोगों को सरकार से काफी ज्यादा उम्मीदें थीं। हालांकि मुझे लगता है कि सरकार ने उस तरह से काम नहीं किया है।’
भारत से संबंधों के सवाल पर मोइन कहते हैं, ‘ये बात सही है कि अंतरिम सरकार ने भारत के साथ संबंधों पर जितना ध्यान देना था , वो नहीं दिया है। भारत सरकार और बांग्लादेश की पूर्व सरकार के बीच जैसे संबंध थे, उसकी वजह से बांग्लादेश के लोगों पर बुरा असर हुआ है।’
अवामी लीग: हमने आजादी की लड़ाई लड़ी, हमें 50% लोगों का सपोर्ट शेख हसीना एक साल से भारत में हैं, उनकी पार्टी अवामी लीग और उनके कार्यकर्ता अब भी बांग्लादेश में हैं। पार्टी के लोग इसे फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कई नेता अब भी अंडरग्राउंड हैं। हमने पार्टी के महासचिव सुजीत रॉय नंदी से बात की।
नंदी मानते हैं कि बांग्लादेश में करीब 50% लोग अवामी लीग का सपोर्ट करते हैं और जमीनी स्तर पर हमारे कार्यकर्ता हैं। हमारी पार्टी ने बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई लड़ी। हमें कोई भी बांग्लादेश से बेदखल नहीं कर सकता। कोई भी ताकत आ जाए, हमारी पार्टी को बैन नहीं कर सकते। आज भी लोग हमारे साथ हैं, हमारी लीडर शेख हसीना के साथ हैं। ……………..
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‘मेरा बेटा रोज की तरह दुकान बंद करके लौट रहा था। न उसकी कोई गलती थी। न ही वो किसी प्रदर्शन में शामिल होने गया था। फिर उसे गोली क्यों मारी?’ बांग्लादेश के गोपालगंज में कपड़ा व्यापारी दिप्तो साहा को खो चुकी उनकी मां पुलिस और सरकार से जवाब मांग रही हैं। 16 जुलाई को गोपालगंज में नेशनल सिटिजन पार्टी यानी NCP की रैली में हिंसा भड़क गई। इसमें जिन 4 लोगों की मौत हुई, दिप्तो साहा भी उनमें से एक हैं। पढ़िए पूरी खबर…
