शेखर गुप्ता का कॉलम: आखिर क्यों चर्चाओं में आ गई है ‘धुरंधर’ h3>
5 घंटे पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
यह अनुमान लगा लेना तो खैर कल्पना की ऊंची उड़ान होगा कि यह कॉलम पढ़ने वाले हर पाठक ने ‘धुरंधर’ और ‘पठान’ देखी होगी, लेकिन मैं मानकर चलता हूं कि उक्त दो फिल्मों से कई लोग वाकिफ जरूर होंगे। बहरहाल, ‘धुरंधर’ भारी विवाद में घिर गई है और यह विवाद केवल सोशल मीडिया पर ही नहीं चल रहा है।
मुख्यधारा वाले मीडिया में इसके आलोचकों से लेकर अखबारों में छपे लेख तक ‘धुरंधर’ को सरकार द्वारा प्रायोजित, प्रोपगंडा, इस्लामोफोबिया से ग्रस्त फिल्म बता रहे हैं। जबकि सियासत, राष्ट्रवाद और धर्म- ध्रुवीकरण वाले इन तीन मुद्दों से ‘पठान’ कतराकर निकल गई थी।
सियासत की बात करें तो हालांकि ‘पठान’ भारत-पाक टकराव के बारे में थी, लेकिन वह सियासत से मुक्त थी। इसमें प्रतिद्वंद्वी खुफिया एजेंसियों के दो अच्छे व्यक्ति मानवता की रक्षा के लिए हाथ मिला लेते हैं। राष्ट्रवाद को इससे दूर रखा गया था।
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केवल इतना ही नहीं था कि इसमें ‘भारत-पाकिस्तान पार्टनर’ बन गए थे, बल्कि शाहरुख खान ने इसमें जिस पात्र की भूमिका निभाई, उसका चरित्र भी अस्पष्ट रखा गया था। उसकी परवरिश अफगानिस्तान के उस गांव के एक परिवार द्वारा की गई थी, जिस पर अमेरिका बम बरसा रहा है। वहीं भारत ऐसे आतंकवादी खतरे का सामना कर रहा था, जिसमें उसकी लगभग पूरी आबादी खत्म हो सकती है।
ऐसे में एक पाकिस्तानी और एक भारतीय जासूस मानवता की रक्षा के लिए हाथ मिला लेते हैं। जाहिर है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक जासूस शाहरुख खान है और दूसरी दीपिका पादुकोण है। और भारत को खतरा एक भारतीय गद्दार एजेंट की ही ओर से है।
यह थीम किसी मॉडल यूएन (एमयूएन) इलीट तबके की कसौटी पर खरी उतर सकती है। फिल्म में धर्म से इतनी दूरी बनाए रखी गई थी कि आज तक हम जान नहीं पाए हैं कि ‘पठान’ का नाम क्या था। फिल्म में कोई किसी धर्म के बारे में कड़वी बात नहीं कहता। आतंकवादी केवल व्यक्तिगत बदला लेना चाहता है।
लेकिन ‘धुरंधर’ ठीक उलट है। यही वजह है कि इसे बॉलीवुड के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फिल्मों में गिना जा रहा है। आइए, ‘धुरंधर’ को भी हम इन तीन मुद्दों की कसौटियों पर कसकर देखें। सियासत के मामले में इसकी स्थायी थीम यह है कि ‘पाकिस्तान की ओर से आने वाले’ आतंकवादी खतरे का जवाब देने के मामले में भारत का इतिहास 2014 के पहले और उसके बाद के दो हिस्सों में बंटा है।
वास्तव में, इसका एक पात्र सान्याल (अजित डोभाल मानिए) कहता है कि ‘दुनिया में जहां कहीं भी आतंकवाद है उसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है’। ‘धुरंधर’ की थीम पूरी तरह से राजनीतिक है। यह मोदी-डोभाल दौर का गुणगान है। इसकी अगली कड़ी आने वाली है, इसलिए मान लें कि आपने ‘अभी तो कुछ भी नहीं देखा’ है।
राष्ट्रवाद इस फिल्म की सबसे प्रबल प्रेरणा है। यह इतनी प्रबल है कि उम्रकैद में बंद या सजा-ए-मौत का सामना कर रहे अपराधी भी पाकिस्तान में आईएसआई के लिए काम कर रहे गिरोहों को प्रशिक्षण देने, घुसपैठ करने के लिए तैयार दिखते हैं।
पाकिस्तान दुश्मन है और भारत भुक्तभोगी है, यह निर्विवाद और स्थायी सच है। फर्क इतना है कि मोदी के भारत ने भुक्तभोगी न बनने का फैसला कर लिया है। और तीसरी कसौटी है धर्म। इसमें तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि फिल्म में सारे हमलावर मुसलमान हैं, जो अपनी आस्था और उसकी बुनियाद पर बने मुल्क की खातिर काम करते हैं। वे भुक्तभोगियों को कायर मानते हैं, जो हिंदू हैं और मोदी दौर से पहले तो और भी ज्यादा डरपोक माने गए थे।
इन तीन प्रमुख मुद्दों पर ये बुनियादी फर्क ‘धुरंधर’ को ‘पठान’ के मुकाबले ज्यादा विवादास्पद और ज्यादा ध्रुवीकरण करने वाली फिल्म बनाते हैं। अगर शाहरुख की फिल्म ने रूढ़िवादियों और उदारवादियों, दोनों को मुंह छिपाने की जगह मुहैया कराई, तो ‘धुरंधर’ ऐसी कोई कृपा नहीं करती। राष्ट्रवादी लोग खुश हो सकते हैं, और उदारवादी लोग यह सवाल खड़ा कर सकते हैं कि आखिर हमारे सिनेमा जगत को क्या हो गया है?
वैसे, मैं यह जानने को उत्सुक हूं कि आईएसआई को ‘धुरंधर’ देखकर निराशा तो नहीं होगी। जो दुनिया की न केवल सबसे आधुनिक, विनाशक, हिंसक और ताकतवर खुफिया एजेंसियों में गिनी जाती है, उसके बारे में यह कहना अपमान ही होगा कि उसे हथियारों और गोली-बम आदि के लिए कराची के कुख्यात ल्यारी इलाके के अंडरवर्ल्ड की जरूरत पड़ेगी।
मैं आपको 1993 के बंबई बम धमाकों की याद दिलाना चाहूंगा। आतंकवाद से मुकाबले के अनुभवी पुलिस अधिकारी एमएन सिंह हमें याद दिलाते रहते हैं कि बम धमाकों के बाद डाले गए छापों में उन्होंने 71 एके-47 राइफलें बरामद की थीं। इनमें 3.5 टन आरडीएक्स भी जोड़ लीजिए, जो मुंबई की गगनचुंबी इमारतों को उड़ा देने के लिए काफी था। और 500 हथगोलों को भी।
यह तब था, जब पूरी महाराष्ट्र पुलिस के पास एक भी एके-47 नहीं थी। तब, पश्चिमी समुद्रतट पर नावों से भी भारी मात्रा में विस्फोटक बरामद किए गए थे। आईएसआई अगर 1993 में इतना सब भेज सकती थी तो जाहिर है कि 26/11 कांड करने के लिए वह कराची के अंडरवर्ल्ड पर निर्भर नहीं हो सकती थी। उसे भारत में जो अंडरवर्ल्ड है, उस पर जरूर भरोसा रहा होगा।
यह ‘धुरंधर’ की राजनीति का सबसे रहस्यपूर्ण पहलू है। आईसी-814 अपहरण, संसद पर हमला और 26/11 जैसे कांडों की साजिश मस्जिदों, मुरीदके तथा बहावलपुर के मदरसों में या किसी बलूच नेता के यहां तो क्या, ल्यारी के किसी गैंगस्टर के ‘अड्डे’ पर भी नहीं रची जाती।
क्या आईएसआई किसी बलूच सरदार पर भरोसा कर सकती है? अगर यह फिल्म मुस्लिम विरोधी भावना को ही भड़काना चाहती थी तो उसे केवल यह दिखाना काफी था कि साजिश जैश या लश्कर के मुख्यालय में रची जा रही है।
बॉलीवुड इतिहास की सबसे राजनीतिक फिल्मों में से एक ‘धुरंधर’ को बॉलीवुड के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फिल्मों में गिना जा रहा है। इसकी स्थायी थीम यह है कि पाकिस्तानी आतंकवादी खतरे का जवाब देने के मामले में भारत का इतिहास 2014 के पहले और उसके बाद के दो हिस्सों में बंटा है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
यह अनुमान लगा लेना तो खैर कल्पना की ऊंची उड़ान होगा कि यह कॉलम पढ़ने वाले हर पाठक ने ‘धुरंधर’ और ‘पठान’ देखी होगी, लेकिन मैं मानकर चलता हूं कि उक्त दो फिल्मों से कई लोग वाकिफ जरूर होंगे। बहरहाल, ‘धुरंधर’ भारी विवाद में घिर गई है और यह विवाद केवल सोशल मीडिया पर ही नहीं चल रहा है।
मुख्यधारा वाले मीडिया में इसके आलोचकों से लेकर अखबारों में छपे लेख तक ‘धुरंधर’ को सरकार द्वारा प्रायोजित, प्रोपगंडा, इस्लामोफोबिया से ग्रस्त फिल्म बता रहे हैं। जबकि सियासत, राष्ट्रवाद और धर्म- ध्रुवीकरण वाले इन तीन मुद्दों से ‘पठान’ कतराकर निकल गई थी।
सियासत की बात करें तो हालांकि ‘पठान’ भारत-पाक टकराव के बारे में थी, लेकिन वह सियासत से मुक्त थी। इसमें प्रतिद्वंद्वी खुफिया एजेंसियों के दो अच्छे व्यक्ति मानवता की रक्षा के लिए हाथ मिला लेते हैं। राष्ट्रवाद को इससे दूर रखा गया था।
केवल इतना ही नहीं था कि इसमें ‘भारत-पाकिस्तान पार्टनर’ बन गए थे, बल्कि शाहरुख खान ने इसमें जिस पात्र की भूमिका निभाई, उसका चरित्र भी अस्पष्ट रखा गया था। उसकी परवरिश अफगानिस्तान के उस गांव के एक परिवार द्वारा की गई थी, जिस पर अमेरिका बम बरसा रहा है। वहीं भारत ऐसे आतंकवादी खतरे का सामना कर रहा था, जिसमें उसकी लगभग पूरी आबादी खत्म हो सकती है।
ऐसे में एक पाकिस्तानी और एक भारतीय जासूस मानवता की रक्षा के लिए हाथ मिला लेते हैं। जाहिर है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक जासूस शाहरुख खान है और दूसरी दीपिका पादुकोण है। और भारत को खतरा एक भारतीय गद्दार एजेंट की ही ओर से है।
यह थीम किसी मॉडल यूएन (एमयूएन) इलीट तबके की कसौटी पर खरी उतर सकती है। फिल्म में धर्म से इतनी दूरी बनाए रखी गई थी कि आज तक हम जान नहीं पाए हैं कि ‘पठान’ का नाम क्या था। फिल्म में कोई किसी धर्म के बारे में कड़वी बात नहीं कहता। आतंकवादी केवल व्यक्तिगत बदला लेना चाहता है।
लेकिन ‘धुरंधर’ ठीक उलट है। यही वजह है कि इसे बॉलीवुड के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फिल्मों में गिना जा रहा है। आइए, ‘धुरंधर’ को भी हम इन तीन मुद्दों की कसौटियों पर कसकर देखें। सियासत के मामले में इसकी स्थायी थीम यह है कि ‘पाकिस्तान की ओर से आने वाले’ आतंकवादी खतरे का जवाब देने के मामले में भारत का इतिहास 2014 के पहले और उसके बाद के दो हिस्सों में बंटा है।
वास्तव में, इसका एक पात्र सान्याल (अजित डोभाल मानिए) कहता है कि ‘दुनिया में जहां कहीं भी आतंकवाद है उसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है’। ‘धुरंधर’ की थीम पूरी तरह से राजनीतिक है। यह मोदी-डोभाल दौर का गुणगान है। इसकी अगली कड़ी आने वाली है, इसलिए मान लें कि आपने ‘अभी तो कुछ भी नहीं देखा’ है।
राष्ट्रवाद इस फिल्म की सबसे प्रबल प्रेरणा है। यह इतनी प्रबल है कि उम्रकैद में बंद या सजा-ए-मौत का सामना कर रहे अपराधी भी पाकिस्तान में आईएसआई के लिए काम कर रहे गिरोहों को प्रशिक्षण देने, घुसपैठ करने के लिए तैयार दिखते हैं।
पाकिस्तान दुश्मन है और भारत भुक्तभोगी है, यह निर्विवाद और स्थायी सच है। फर्क इतना है कि मोदी के भारत ने भुक्तभोगी न बनने का फैसला कर लिया है। और तीसरी कसौटी है धर्म। इसमें तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि फिल्म में सारे हमलावर मुसलमान हैं, जो अपनी आस्था और उसकी बुनियाद पर बने मुल्क की खातिर काम करते हैं। वे भुक्तभोगियों को कायर मानते हैं, जो हिंदू हैं और मोदी दौर से पहले तो और भी ज्यादा डरपोक माने गए थे।
इन तीन प्रमुख मुद्दों पर ये बुनियादी फर्क ‘धुरंधर’ को ‘पठान’ के मुकाबले ज्यादा विवादास्पद और ज्यादा ध्रुवीकरण करने वाली फिल्म बनाते हैं। अगर शाहरुख की फिल्म ने रूढ़िवादियों और उदारवादियों, दोनों को मुंह छिपाने की जगह मुहैया कराई, तो ‘धुरंधर’ ऐसी कोई कृपा नहीं करती। राष्ट्रवादी लोग खुश हो सकते हैं, और उदारवादी लोग यह सवाल खड़ा कर सकते हैं कि आखिर हमारे सिनेमा जगत को क्या हो गया है?
वैसे, मैं यह जानने को उत्सुक हूं कि आईएसआई को ‘धुरंधर’ देखकर निराशा तो नहीं होगी। जो दुनिया की न केवल सबसे आधुनिक, विनाशक, हिंसक और ताकतवर खुफिया एजेंसियों में गिनी जाती है, उसके बारे में यह कहना अपमान ही होगा कि उसे हथियारों और गोली-बम आदि के लिए कराची के कुख्यात ल्यारी इलाके के अंडरवर्ल्ड की जरूरत पड़ेगी।
मैं आपको 1993 के बंबई बम धमाकों की याद दिलाना चाहूंगा। आतंकवाद से मुकाबले के अनुभवी पुलिस अधिकारी एमएन सिंह हमें याद दिलाते रहते हैं कि बम धमाकों के बाद डाले गए छापों में उन्होंने 71 एके-47 राइफलें बरामद की थीं। इनमें 3.5 टन आरडीएक्स भी जोड़ लीजिए, जो मुंबई की गगनचुंबी इमारतों को उड़ा देने के लिए काफी था। और 500 हथगोलों को भी।
यह तब था, जब पूरी महाराष्ट्र पुलिस के पास एक भी एके-47 नहीं थी। तब, पश्चिमी समुद्रतट पर नावों से भी भारी मात्रा में विस्फोटक बरामद किए गए थे। आईएसआई अगर 1993 में इतना सब भेज सकती थी तो जाहिर है कि 26/11 कांड करने के लिए वह कराची के अंडरवर्ल्ड पर निर्भर नहीं हो सकती थी। उसे भारत में जो अंडरवर्ल्ड है, उस पर जरूर भरोसा रहा होगा।
यह ‘धुरंधर’ की राजनीति का सबसे रहस्यपूर्ण पहलू है। आईसी-814 अपहरण, संसद पर हमला और 26/11 जैसे कांडों की साजिश मस्जिदों, मुरीदके तथा बहावलपुर के मदरसों में या किसी बलूच नेता के यहां तो क्या, ल्यारी के किसी गैंगस्टर के ‘अड्डे’ पर भी नहीं रची जाती।
क्या आईएसआई किसी बलूच सरदार पर भरोसा कर सकती है? अगर यह फिल्म मुस्लिम विरोधी भावना को ही भड़काना चाहती थी तो उसे केवल यह दिखाना काफी था कि साजिश जैश या लश्कर के मुख्यालय में रची जा रही है।
बॉलीवुड इतिहास की सबसे राजनीतिक फिल्मों में से एक ‘धुरंधर’ को बॉलीवुड के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फिल्मों में गिना जा रहा है। इसकी स्थायी थीम यह है कि पाकिस्तानी आतंकवादी खतरे का जवाब देने के मामले में भारत का इतिहास 2014 के पहले और उसके बाद के दो हिस्सों में बंटा है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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