लोन शर्त और FD जैसा झांसा देकर फंसा रहे एजेंट: इंश्योरेंस कंपनियों के खिलाफ 1.20 लाख शिकायतें, मिस-सेलिंग का हिस्सा 22.14% हुआ h3>
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11 घंटे पहले
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इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) ने अपनी एनुअल रिपोर्ट (2024-25) में बीमा क्षेत्र में पॉलिसी मिस-सेलिंग पर चिंता जताई है। रेगुलेटर ने कंपनियों को निर्देश दिया कि वे कारणों की पहचान के लिए ‘रूट कॉज एनालिसिस’ (RCA) करें।
मिस-सेलिंग का मतलब ग्राहकों को बिना पूरी जानकारी दिए, नियम-शर्तों को छुपाकर या उनकी जरूरत के उलट गलत पॉलिसी बेचना है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त मंत्रालय ने भी बैंकों और बीमा कंपनियों को चेतावनी दी है कि वे ग्राहकों को गलत पॉलिसी न बेचे।
कुल शिकायतों में से 22% मामले गलत तरीके से पॉलिसी बेचने के
IRDAI की रिपोर्ट के अनुसार, लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के खिलाफ दर्ज होने वाली कुल शिकायतों की संख्या में कोई खास कमी नहीं आई है।
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- FY25 का डेटा: साल 2024-25 में कुल 1,20,429 शिकायतें दर्ज हुईं, जो पिछले साल (1,20,726) के लगभग बराबर हैं।
- UFBP शिकायतें: अनफेयर बिजनेस प्रैक्टिस (UFBP) यानी गलत तरीके से कारोबार करने की शिकायतें 23,335 से बढ़कर 26,667 हो गई हैं।
- हिस्सेदारी बढ़ी: कुल शिकायतों में गलत तरीके से पॉलिसी बेचने के मामलों की हिस्सेदारी 19.33% से बढ़कर अब 22.14% हो गई है।
लोगों को फंसाने के लिए मिस-सेलिंग के 3 बड़े तरीके
बीमा क्षेत्र में मिस-सेलिंग कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब यह खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। कंपनियां और एजेंट अक्सर इन 3 तरीकों से आपको झांसा देते हैं:
- FD जैसा झांसा: एजेंट लाइफ इंश्योरेंस को फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह बेचते हैं। वे कहते हैं कि इसमें बैंक से ज्यादा रिटर्न मिलेगा, जबकि इंश्योरेंस का मुख्य काम सुरक्षा देना है।
- लोन की शर्त: कई बार बैंक होम लोन या पर्सनल लोन देने के बदले जबरन बीमा पॉलिसी दे देते हैं। ये पूरी तरह से गैर-कानूनी है। पॉलिसी लेना है या नहीं बॉरोअर तर कर सकता है।
- गलत वादे: ‘सिर्फ 3 साल प्रीमियम भरिए और जीवन भर पेंशन पाइए’ जैसे लोकलुभावन वादे किए जाते हैं। ये पॉलिसी के कागजों में कहीं नहीं होते।
अगर आपके साथ ‘धोखा’ हुआ है, तो ये है बचने का तरीका
अगर आपको लगता है कि आपको गलत पॉलिसी बेची गई है, तो ये काम कर सकते हैं…
- फ्री-लुक पीरियड: इंश्योरेंस का सबसे बड़ा हथियार ‘फ्री-लुक पीरियड’ है। पॉलिसी बॉन्ड मिलने के 15 से 30 दिनों के भीतर आप इसे बिना किसी कारण के रद्द कर सकते हैं। कंपनी को आपका पूरा पैसा (सिर्फ मेडिकल टेस्ट और स्टांप ड्यूटी काटकर) वापस करना होगा।
- लिखा-पढ़ी पर भरोसा करें: एजेंट के मौखिक वादे की कोई कीमत नहीं है। हमेशा पॉलिसी के ‘बेनिफिट इलस्ट्रेशन’ और नियम-शर्तों को खुद पढ़ें।
- बीमा लोकपाल की मदद लें: अगर बीमा कंपनी आपकी शिकायत नहीं सुनती, तो आप ‘बीमा लोकपाल’ के पास ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
भारत में बीमा की पहुंच अभी भी कम
IRDAI की रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि भारत में इंश्योरेंस की पहुंच दुनिया के औसत 7.3% के मुकाबले मात्र 3.7% है। चिंता की बात यह है कि लाइफ इंश्योरेंस कराने वाले लोगों की संख्या पिछले साल के मुकाबले 2.8% से घटकर 2.7% रह गई है।
कंपनियों को प्रभावी रणनीति बनाने की सलाह
रेगुलेटर ने कंपनियों से कहा है कि वे समय-समय पर इस समस्या की समीक्षा करें। सुझाव दिया- कंपनियों को यह देखना चाहिए कि क्या वे ग्राहक की जरूरत के हिसाब से सही प्रोडक्ट दे रही हैं।
इसके साथ ही डिस्ट्रीब्यूशन चैनल्स (जैसे एजेंट या बैंक) पर नियंत्रण बढ़ाने और शिकायतों के निपटारे के लिए एक ठोस प्लान विकसित करने को कहा गया है।
मिस-सेलिंग की वजह से ग्राहक प्रीमियम नहीं भरते और पॉलिसी लैप्स (बंद) हो जाती है, जिससे बीमा कंपनियों और ग्राहकों दोनों का नुकसान होता है।
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मिस-सेलिंग का मतलब ग्राहकों को बिना पूरी जानकारी दिए, नियम-शर्तों को छुपाकर या उनकी जरूरत के उलट गलत पॉलिसी बेचना है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त मंत्रालय ने भी बैंकों और बीमा कंपनियों को चेतावनी दी है कि वे ग्राहकों को गलत पॉलिसी न बेचे।
कुल शिकायतों में से 22% मामले गलत तरीके से पॉलिसी बेचने के
IRDAI की रिपोर्ट के अनुसार, लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के खिलाफ दर्ज होने वाली कुल शिकायतों की संख्या में कोई खास कमी नहीं आई है।
- FY25 का डेटा: साल 2024-25 में कुल 1,20,429 शिकायतें दर्ज हुईं, जो पिछले साल (1,20,726) के लगभग बराबर हैं।
- UFBP शिकायतें: अनफेयर बिजनेस प्रैक्टिस (UFBP) यानी गलत तरीके से कारोबार करने की शिकायतें 23,335 से बढ़कर 26,667 हो गई हैं।
- हिस्सेदारी बढ़ी: कुल शिकायतों में गलत तरीके से पॉलिसी बेचने के मामलों की हिस्सेदारी 19.33% से बढ़कर अब 22.14% हो गई है।
लोगों को फंसाने के लिए मिस-सेलिंग के 3 बड़े तरीके
बीमा क्षेत्र में मिस-सेलिंग कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब यह खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। कंपनियां और एजेंट अक्सर इन 3 तरीकों से आपको झांसा देते हैं:
- FD जैसा झांसा: एजेंट लाइफ इंश्योरेंस को फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह बेचते हैं। वे कहते हैं कि इसमें बैंक से ज्यादा रिटर्न मिलेगा, जबकि इंश्योरेंस का मुख्य काम सुरक्षा देना है।
- लोन की शर्त: कई बार बैंक होम लोन या पर्सनल लोन देने के बदले जबरन बीमा पॉलिसी दे देते हैं। ये पूरी तरह से गैर-कानूनी है। पॉलिसी लेना है या नहीं बॉरोअर तर कर सकता है।
- गलत वादे: ‘सिर्फ 3 साल प्रीमियम भरिए और जीवन भर पेंशन पाइए’ जैसे लोकलुभावन वादे किए जाते हैं। ये पॉलिसी के कागजों में कहीं नहीं होते।
अगर आपके साथ ‘धोखा’ हुआ है, तो ये है बचने का तरीका
अगर आपको लगता है कि आपको गलत पॉलिसी बेची गई है, तो ये काम कर सकते हैं…
- फ्री-लुक पीरियड: इंश्योरेंस का सबसे बड़ा हथियार ‘फ्री-लुक पीरियड’ है। पॉलिसी बॉन्ड मिलने के 15 से 30 दिनों के भीतर आप इसे बिना किसी कारण के रद्द कर सकते हैं। कंपनी को आपका पूरा पैसा (सिर्फ मेडिकल टेस्ट और स्टांप ड्यूटी काटकर) वापस करना होगा।
- लिखा-पढ़ी पर भरोसा करें: एजेंट के मौखिक वादे की कोई कीमत नहीं है। हमेशा पॉलिसी के ‘बेनिफिट इलस्ट्रेशन’ और नियम-शर्तों को खुद पढ़ें।
- बीमा लोकपाल की मदद लें: अगर बीमा कंपनी आपकी शिकायत नहीं सुनती, तो आप ‘बीमा लोकपाल’ के पास ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
भारत में बीमा की पहुंच अभी भी कम
IRDAI की रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि भारत में इंश्योरेंस की पहुंच दुनिया के औसत 7.3% के मुकाबले मात्र 3.7% है। चिंता की बात यह है कि लाइफ इंश्योरेंस कराने वाले लोगों की संख्या पिछले साल के मुकाबले 2.8% से घटकर 2.7% रह गई है।
कंपनियों को प्रभावी रणनीति बनाने की सलाह
रेगुलेटर ने कंपनियों से कहा है कि वे समय-समय पर इस समस्या की समीक्षा करें। सुझाव दिया- कंपनियों को यह देखना चाहिए कि क्या वे ग्राहक की जरूरत के हिसाब से सही प्रोडक्ट दे रही हैं।
इसके साथ ही डिस्ट्रीब्यूशन चैनल्स (जैसे एजेंट या बैंक) पर नियंत्रण बढ़ाने और शिकायतों के निपटारे के लिए एक ठोस प्लान विकसित करने को कहा गया है।
मिस-सेलिंग की वजह से ग्राहक प्रीमियम नहीं भरते और पॉलिसी लैप्स (बंद) हो जाती है, जिससे बीमा कंपनियों और ग्राहकों दोनों का नुकसान होता है।
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