‘लखनऊ मेयर सुषमा खर्कवाल ने कानून की धज्जियां उड़ाईं’: ललित तिवारी बोले- BJP में शामिल होने का ऑफर लेकिन उसूल नहीं बदलूंगा – Lucknow News h3>
लखनऊ में फैजुल्लागंज-73 वार्ड की पार्षदी को लेकर चल रहे विवाद में हाईकोर्ट ने बड़ा एक्शन लिया है। कोर्ट ने सपा नेता ललित किशोर तिवारी को पार्षद पद की शपथ नहीं दिलाए जाने पर मेयर सुषमा खर्कवाल के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार फ्रीज कर दिए हैं। ललित तिवारी ने भाजपा पार्षद प्रदीप शुक्ला पर दूसरी शादी और संपत्ति छिपाने का आरोप लगाते हुए कोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने प्रदीप शुक्ला का निर्वाचन रद्द कर ललित तिवारी को निर्वाचित पार्षद घोषित किया था। 5 माह बाद भी उन्हें शपथ नहीं दिलाया गया था। दैनिक NEWS4SOCIALसे बातचीत में ललित तिवारी ने पूरे मामले, कोर्ट की कार्रवाई और राजनीतिक दबाव को लेकर खुलकर बात की। पढ़िए बातचीत के अंश… सवाल: पूरा मामला क्या है? मेयर, डीएम और नगर आयुक्त शपथ क्यों नहीं करा रहे थे ? जवाब: 19 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने विपक्षी प्रदीप शुक्ला का निर्वाचन शून्य घोषित किया गया था। मुझे निर्वाचित घोषित किया गया था। प्रावधान यह है कि जिस दिन आदेश पारित होगा, उसके अगले दिन से यह आदेश प्रभावी रहेगा। मतलब 20 दिसंबर 2025 से मैं पार्षद हूं और मेरी शपथ हो जानी चाहिए थी। यह काम महापौर ने नहीं किया। मैंने जजमेंट की कॉपी के साथ प्रार्थना पत्र दिया था। मैं 6 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से उनसे मिला भी था। उन्होंने मेरी शपथ नहीं कराई। शासन ने भी 4 फरवरी 2026 को सीधे पत्र लिखकर जिलाधिकारी के माध्यम से मेयर को लिखा था कि आप इनकी शपथ करा दें, पर उन्होंने शपथ नहीं कराई। जिनका निर्वाचन शून्य घोषित हो गया, लगातार उनसे वह पार्षद का काम ले रहीं। उनको मीटिंगों में शामिल करवा रही थीं और वह सारे वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग कर रहे थे। वह न्यायालय के आदेशों की धज्जियां उड़ा रही थीं। उससे क्षुब्ध होकर मैंने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। सवाल: इससे पहले कोर्ट की तरफ से क्या आदेश आए थे? जवाब: न्यायालय ने सुनवाई करते हुए सबसे पहले 25 मार्च 2026 को आदेश पारित किया था, जिसमें साफ-साफ कह दिया था कि जो विधिक व्यवस्था है, उसका पालन करने के लिए मेयर बाध्य हैं। उसी के अनुरूप उनको शपथ करा देनी होगी। बावजूद इसके मेयर ने हमारी शपथ नहीं कराई और यह बताती रहीं कि अपील लंबित है, इसलिए स्टे है। जबकि ऐसा नहीं है, अपील में ना तो कोई स्टे है, यहां तक कि वह अभी तक एडमिट भी नहीं हुई है। क्योंकि उसमें उन्होंने इतना झूठ बोला है कि उस झूठ का जवाब वह न्यायालय को नहीं दे पाईं। वे बराबर उस अपील को बढ़वा रही थी। सवाल: 13 मई के कोर्ट आदेश के बाद क्या हुआ? जवाब: 13 मई को यह आदेश हुआ था कि अगर 7 दिनों के अंदर शपथ नहीं करवाते हैं, तो मेयर, डीएम और नगर आयुक्त अपीयर करेंगे। उन्होंने उसका अनुपालन नहीं किया, बल्कि इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में एसएलपी दाखिल कर दी। 20 मई को सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी एसएलपी को खारिज कर दिया और बहुत तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘आप इस तरीके से कानून का मजाक नहीं बना सकते हैं।’ उनकी तरफ से सॉलिसिटर जनरल भी अपीयर हुए थे, लेकिन न्यायालय ने उनकी बातों को नहीं माना। हमारी तरफ से वरिष्ठ एडवोकेट गौरव मेहरोत्रा ने तर्क दिया था और न्यायालय ने उससे संतुष्ट होकर दूसरे पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया था। उसके बाद आज यह मुकदमा सुनवाई के लिए लगा था। मेयर और डीएम को निर्देश था, लेकिन किसी ने मेरी शपथ नहीं कराई। इस पर न्यायालय ने आज न्याय कक्ष में यह टिप्पणी की है कि ‘यह संवैधानिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है और मेयर ऐसा नहीं कर सकती हैं, वह डेमोक्रेटिक सेटअप को सबवर्ट (subvert) नहीं कर सकती हैं।’ कोर्ट ने यह फाइंडिंग रिकॉर्ड की है और उनके वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकारों को सीज कर दिया है कि जब आप ओथ (शपथ) कराएंगी, उसी के साथ ही ये बहाल होंगे। सवाल: डीएम और नगर आयुक्त भी इसमें अपीयर हुए थे, उनके लिए कोर्ट से क्या डायरेक्शन मिला? जवाब: कोर्ट ने कहा है कि जो कोर्ट का आदेश है, इसका कंप्लायंस अगली तारीख तक किसी भी सूरत में होना चाहिए। जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को यह जिम्मेदारी सौंपी है। बताया है कि आप जिस पद पर हैं, वहां पर दलगत आधार पर आपको कार्रवाई नहीं करनी है। जैसा कानून कहता है, उस कानून के तहत, संविधान के तहत और स्टैच्यूचरी प्रोविजन के तहत कार्रवाई करनी है। हमारी तरफ से गौरव मेहरोत्रा, नदीम मुर्तजा और उत्सव मिश्रा ने अपने तर्क कोर्ट के सामने रखे थे। सवाल: इस पूरे संघर्ष और कानूनी लड़ाई का सफर कैसा रहा? जवाब: देखिए, यह बहुत संघर्ष के दिन रहे हैं और मैं संघर्ष कर रहा हूं। मैं पार्षद पद के लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए लड़ाई लड़ रहा हूं। सत्य है, वह प्रिवेल करना चाहिए। अगर कोई इस सिस्टम के साथ खिलवाड़ कर रहा है, तो उसके साथ न्यायिक कार्रवाई होनी चाहिए। उसी आधार पर मैं लड़ रहा था और ईश्वर की कृपा से मुझे सफलता मिली। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आगे न्याय होगा।
सवाल: आज कोर्ट ने फिर शपथ दिलाने को कहा है, तो क्या विपक्षियों के पास अब भी कहीं और जाने का कोई ऑप्शन बचा है? जवाब: नहीं, ऑप्शन कोई नहीं है, ऑप्शन तो पहले दिन से ही नहीं है। मेयर जानबूझकर न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। यह विषय सिर्फ ओथ (शपथ) का नहीं है, विषय है न्याय के प्रति सम्मान का और न्यायालय के आदेशों के सम्मान का। अगर हम लोग न्याय का अनुपालन नहीं करेंगे तो समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी। लखनऊ हमारे प्रदेश की राजधानी है, यहां का संदेश पूरे देश और प्रदेश में जाता है। सवाल: आपने सपा से पार्षदी का चुनाव लड़ा था। कोर्ट ने आप को पार्षद निवार्चित किया। आपके साथ भेदभाव हुआ? जवाब: बिल्कुल, हम समाजवादी पार्टी से निर्वाचित पार्षद हैं। इस वजह से मेयर मेरी शपथ नहीं करा रही हैं। हम संविधान और कानून को मानने वाले हैं। कानून के रास्ते पर चल रहे हैं। मैं खुद एक प्रैक्टिसनर लॉयर (वकील) हूं। कानून में जो व्यवस्थाएं दी हैं, उन्हीं का उपयोग करके मैंने यह मुकदमा दाखिल किया था। सवाल: आपको भाजपा में शामिल होने का भी प्रस्ताव आया क्या? जवाब: देखिए, मेरे पास कई फोन आए और कई लोगों ने मुझसे मिलकर भी कहा, लेकिन उनको मैंने साफ बता दिया कि मैं अपनी निष्ठा बदलता नहीं हूं। मैं समाजवादी पार्टी से लड़ा था। समाजवादी पार्टी का निर्वाचित पार्षद हूं। सवाल: किन लोगों का फोन आया था? क्या वे जिला स्तर के नेता थे या प्रदेश? जवाब: (हंसते हुए) यह बात यहीं तक… इस पर मेरा कोई कमेंट नहीं है। जानिए कब कब क्या हुआ
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